चैत्र नवरात्र: भगवती शक्ति की आदि रूपा है देवी कात्यायिनी

शारदीय नवरात्र: परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई थी मां कात्यायनी
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चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहन, कात्यायनी शुभं दद्यादेवी दानवघातिनी।

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्धकृत शेखराम्सिं, हरुढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम्।

नवरात्रो में श्री दुर्गा देवी के नौ स्वरूपों में छठवें दिवस की अधिष्ठात्री देवी-शक्ति माँ भगवती श्री कात्यायनी हैं।

स्कन्दपुराण में उल्लेख है कि परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से मां कात्यायनी उत्पन्न हुयीं थी, जिन्होंने देवी पार्वती द्वारा दिये गये सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था।

माँ श्री कात्यायनी भगवती शक्ति की आदि रूपा है कात्यायनी अमरकोष में पार्वती के लिये यह दूसरा नाम है, शक्तिवाद में इन्हें शक्ति, दुर्गा जिसमे भद्रकाली और चंडिका के नाम से भी पुकारा जाता हैं।

नवरात्रि उत्सव की षष्ठी तिथि अर्थात इस दिवस को माँ श्री कात्यायनी भगवती की पूजा का विधान है। उस दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होता है।

योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का महत्वपूर्ण स्थान है, इस चक्र में स्थित मन-बुद्धि वाला साधक मॉ के श्रीचरणों में अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है, ऐसे साधक जो भगवती के श्रीचरणों में पूर्ण रूप से सर्मपित होते हैं, ऐसे भक्तों को माँ भगवती का दर्शन व उनकी कृपा सहज ही प्राप्त हो जाती है।

हे मानव अपनी उर्जा, उत्साह एंव पौरूष को सर्वदा बचाकर ही उसकी रक्षा करनी चाहिये और सही समय आने पर ही उनका प्रयोग करना चाहिये। वेदान्त का नियम है कि हमें वही मिलता है, जिसके हम हकदार होते हैं।

हे मानव यश सदैव त्याग से मिलता है धोखे से नहीं *कलियुग में रहना है या सतयुग में ! यह आपको तय करना व चुनना है, आपका युग आपके पास व आपके हाथों में ही है।

अत: स्वाध्याय व आत्मचिंतन करते हुये निस्वार्थ भाव व बिना किसी से कोई अपेक्षा किये केवल अपने माता-पिता की सेवा किया करें, आपका सदैव मंगल ही होगा।

ई०/पं०सुन्दर लाल उनियाल (मैथिल ब्राह्मण)
नैतिक शिक्षा व आध्यात्मिक प्रेरक
दिल्ली/इन्दिरापुरम,गा०बाद/देहरादून