अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी । आंचल में है दूध और आंखों में पानी

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    आखिर में यह भी  नहीं रहेगा
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    प्रस्तुति: हर्षमणि बहुगुणा,

    *संसार एक रंग मंच है जहां सबको अभिनय करना पड़ता है । विशेष कर नारी का सम्मान करना श्रेयस्कर है। प्राचीन काल में नारी को पति चुनने का अधिकार था , वे पुरुष के साथ रणक्षेत्र में भी जाती थी, पर समय परिवर्तन के साथ नारियों की स्थति में भी परिवर्तन हुआ।

    समाज की घृणित मानसिकता ने उनका क्षेत्र घर की चारदीवारी में सीमित कर दिया । (भले ही आज उनकी स्थति में आशा तीत परिवर्तन हो चुका है) तभी तो मैथिली शरण गुप्त जी को लिखना पड़ा- क्योंकि वे जानते थे कि मनुस्मृति में लिखा है कि –
    *यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:* ।

    फिर भी उन्होंने लिखा —
    *अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी ।*
    *आंचल में है दूध और आंखों में पानी ।।*
    *आज सावली गांव की कुछ अभिशप्त लेकिन प्रतिष्ठित नारियों ने इस जन का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है । एक ओर हम अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे हैं , तो क्यों न उन्हें भी याद कर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की जाय । ये वे सरस्वतियां हैं जिन्होंने बाल विधवा होने का दंश झेला किन्तु अपने सुचरित्र के बल पर अपना पूरा जीवन ससम्मान व्यतीत किया । गोस्वामीजी ने तो नारी की स्थिति का चित्रण इन शब्दों में किया । चिन्तन ज्ञान का नहीं , समस्या का है व उन नारियों के जीवन का है जिन्होंने सांसारिक विषयों को देखा ही नहीं ।—*
    *कत विथि सृजीं नारि जग माहीं ।*
    *पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं ।।*
    *उनमें से एक आठ वर्ष की अवस्था में जिसका विवाह बडोन गांव के एक सुयोग्य युवक के साथ हुआ था, वह थी – प्रात: स्मरणीय श्री महेश्वरानंद बहुगुणा जी की सुपुत्री, उन्होंने अपनी बड़ी सुपुत्री श्रीमती शान्ता देवी को विवाह बन्धन में बांधा किन्तु वैवाहिक सुख उसके भाग्य में नहीं था । पति अकाल कवलित होने से अपनी ससुराल नहीं गई व उनके पिता श्री ने अपने पास मायके में ही रखा व आत्म सम्मान के साथ अपना जीवन यापन कर लगभग ९५ वर्ष की अवस्था में मायके में ही ब्रह्मलीन हुई । दूसरी देवी श्रीमती कला देवी जिनका विवाह उनियाल गांव के प्रवासी जो मंजगांव में रहते थे श्री विश्वेश्रर दत्त उनियाल जी के साथ पिताश्री श्री विशेश्वर दत्त बहुगुणा जी ने पाणिग्रहण संस्कार करवाया परन्तु श्री उनियाल जी बाहर नौकरी ढूंढने गये व लौट कर नहीं आये । *श्री सत्येश्वर बहुगुणा जी ने अपनी एक मात्र*
    *दुहिता को ग्वाड़ के उनियाल जी को दिया किन्तु विधि के विधान से उन्हें भी पति का स्नेह प्राप्त नहीं* *हो सका* , *वह भी अपने मायके में ही गुज़र बसर कर दिवंगत हुई । श्री हरि नन्द बहुगुणा जी की सुपुत्री का पाणिग्रहण संस्कार भी ग्वाड़ के उनियाल जी से किया गया परन्तु पति के साथ जीवन यापन का आनन्द नहीं मिल पाया* । *श्री कृष्ण बहुगुणा जी की सुपुत्री श्रीमती बिन्दु देवी भी गृहस्थी के सुख दु:ख से वंचित रही । श्री खिमा नन्द बहुगुणा जी की पुत्री श्रीमती दिप्पी (देवी प्रसाद बहुगुणा जी की बहिन) भी* *ससुराल में बिना पति के कैसे रह सकती थी । श्रीमती प्रभा सुपुत्री स्व०श्री महानन्द बहुगुणा जी भी तो सकलानी परिवार की वहू थी पर क्रूर काल के मजाक ने मायके में रहने हेतु बिवस किया । स्व० श्री इन्द्र दत्त बहुगुणा जी की बहिन भी तो भाग्य को सर्वोपरि मानते हुए अपने भाइयों के पास ही रही । श्रीमती शकुन्तला देवी उनियाल का पाणिग्रहण उनके पिता श्री ने उनियाल गांव निवासी श्री जीवानन्द उनियाल जी के साथ किया, किन्तु विधि के लेख को मिटाना असम्भव है और तीन वर्ष बाद उनको भी वैधव्य का वरण करना पड़ा व लौट कर पिताश्री के घर पर ही रही वह तो उनके जेठ स्व० श्री रामचन्द्र* *उनियाल जी ने अपने पटवारी भाई की विधवा को बहुत प्रयास के बाद पेन्शन दिलवाई , अभी जीवन के अन्तिम पड़ाव पर हैं । श्री राम प्रकाश बहुगुणा जी ने नैचोली के उनियाल जी के साथ अपनी लाडली श्रीमती तारा देवी का पाणिग्रहण करवाया किन्तु वह भी वहां नहीं रह पाई । ईश्वर कृपा से भाई श्री गिरिजा प्रसाद* *बहुगुणा जी ने अपनी सूझबूझ से उन्हें सुशिक्षित व संस्कारवान बनाकर स्वास्थ्य विभाग में! आजीविका दिला कर नारी के सम्मान को बरकरार रखने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया*। *आज सेवा निवृत्ति के बाद ऋषिकेश में अपना अवशेष जीवन परमार्थ के साथ व्यतीत कर रही है*
    *और अब इसी अभिशाप का दंश श्रीमती संगीता जो स्वाड़ी में बड़ी खुशी के साथ विदा की थी पति के अकाल कवलित होने से क्षेलनें को बिवश है । सब ईश्वर की इच्छा पर ही निर्भर करता है , भगवान सामर्थ्य प्रदान करने की कृपा करेंगे। ॐ शान्ति ।* “”‘
    “” *मैं ऐसी विभूतियों को कोटि-कोटि नमन करता हूं जो दिवंगत हो गयी है उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं तथा समाज से यह अपेक्षा भी करता हूं कि इन नारियों से कुछ ना कुछ अवश्य ग्रहण करने का प्रयास करें, वास्तव में —* “”
    *जाके पैर न फटी बिवाई , सो का जाने पीर पराई ।*
    “‘ *आज की मतलबी दुनिया सरस्वती के इस नारी अवतार को सम्यक् दृष्टि से कहां देख पा रही है । शायद दुर्वासा के शाप का फल सरस्वती आज भी झेल रही है । शाप था कि ‘ तुम धरती पर मानवी बन कर जन्म लोगी ‘ । आज हम पुत्रियों को यह सोच कर विदा करते हैं कि यह कन्या — ” अर्थो हि कन्या परकीय एव ” । शायद इसलिए भी कि सभी लोग अपनी वस्तु को सुन्दर समझते हैं पर सुन्दर रख नहीं पाते हैं। ” सर्व कान्तमात्मने पश्यति ” ।* “‘
    ” *इन श्रद्धासुमनों को अर्पित करते हुए मेरी सभी बहिनों व माताओं से प्रार्थना है कि मनुष्य के जीवन का आदर्श सीमित नहीं है, अतः केवल परिवार के प्रति ही नहीं अपितु विश्व के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन करते हुए उन्हें आगे बढ़ाने का काम करें , इसी में सबकी भलाई है , आप सब कुछ हैं, समर्थ वान भी हैं अतः अपना दायित्व बखूबी निभायेंगी।* ”
    *वरं स्वधर्मो विगुणो न पारक्य: स्वानुष्ठित: ।*