शाश्वत सत्य: पूर्ण समर्पण ही विश्वास है

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सम्पूर्ण विश्वास

एक बार दो बहुमंज़िली इमारतों के बीच बंधी हुई एक तार पर लंबा सा बाँस पकड़े एक नट (कलाकार) चल रहा था, उसने अपने कन्धे पर अपना बेटा बैठा रखा था।

[su_highlight background=”#870e23″ color=”#f6f6f5″]सरहद का साक्षी @ हर्षमणि बहुगुणा[/su_highlight]

सैंकड़ों, हज़ारों लोग दम साधे देख रहे थे।
सधे कदमों से, तेज हवा से जूझते हुए अपनी और अपने बेटे की ज़िंदगी दाँव पर लगा कर उस कलाकार ने दूरी पूरी कर ली।
भीड़ आह्लाद से उछल पड़ी, तालियाँ, सीटियाँ बजने लगी।
लोग उस कलाकार की फोटो खींच रहे थे, उसके साथ सेल्फी ले रहे थे। उससे हाथ मिला रहे थे, और वो कलाकार माइक पर आया, भीड़ को बोला –
क्या आपको विश्वास है कि मैं यह कार्य दोबारा भी कर सकता हूँ।
भीड़ चिल्लाई हाँ हाँ, – तुम कर सकते हो।
उसने पूछा, क्या आपको विश्वास है।
भीड़ चिल्लाई हां – हां पूरा विश्वास है, हम तो शर्त भी लगा सकते हैं कि तुम सफलता पूर्वक इसे दोहरा भी सकते हो?
कलाकार बोला, पूरा पूरा विश्वास है! ना?
भीड़ बोली, हाँ – हाँ! पूरा भरोसा है ।

कलाकार बोला, ठीक है, कोई मुझे अपना बच्चा दे दे, मैं उसे अपने कंधे पर बैठा कर रस्सी पर चलूँगा।
खामोशी, शांति, सन्नाटा एक चुप्पी फैल गयी।

कलाकार बोला! — डर गए…! अभी तो आपको विश्वास था कि मैं कर सकता हूँ। असल में आप का यह विश्वास (believe) है, मुझमें विश्वास (trust) नहीं है।
दोनों विश्वासों में फर्क है।

यही कहना है ईश्वर हैं! ये तो विश्वास है! परन्तु ईश्वर में सम्पूर्ण विश्वास नहीं है।
“जब हम ईश्वर पर भरोसा करते हैं तो पूर्ण रूप से करना चाहिए हमारा विश्वास ही पूर्ण समर्पण के साथ होना चाहिए। जैसे हम किसी के विवाह संस्कार में शामिल नहीं हो सकते हैं! फिर विचार करते हैं कि शगुन (कुछ आशीर्वाद शुभकामनाएं) भेज देना चाहिए! किसी के हाथ दे देते हैं, फिर उससे शायद यह नहीं पूछते कि दिया या नहीं? क्योंकि हमारा विश्वास है कि हमनें किसी विश्वास पात्र के पास ही भेजा है। फिर यदि आशंकित हैं तो हम उस व्यक्ति की नियत पर ही शक कर रहे हैं। अतः हमें ईश्वर के प्रति ऑख बन्द कर विश्वास करना चाहिए। ईश्वर है, यह शाश्वत सत्य है, केवल बोलने मात्र तक नहीं! पूर्ण समर्पण ही विश्वास है।