महान पुण्यमयी, स्वर्ग और मोक्ष प्रदायक, सर्व पापहारा है देवशयनी एकादशी

महान पुण्यमयी, स्वर्ग और मोक्ष प्रदायक, सर्व पापहारा है देवशयनी एकादशी
Bhagwan Shri Hari Vishnu
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नमो स्तवन अनन्ताय सहस्त्र मूर्तये।
सहस्त्रपादाक्षि शिरोरू बाहवे।।
सहस्त्र नाम्ने पुरुषाय शाश्वते।
सहस्त्रकोटि युग धारिणे नम:।।

जिनके सहस्त्र रूप हैं, सहस्त्र नाद हैं, सहस्त्र सिर हैं, सहस्त्र नाम हैँ, जो परम पुरुष हैं, जो शाश्वत हैं, जो सहस्त्र कोटि युगों युगों में अनेक रुप धर कर आते है, ऐसे श्रीहरि के श्रीचरणों में हम आप सबकी और से साष्टांग प्रणाम करते हैं।

आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही देवशयनी एकादशी तथा पद्मनाभा भी कहते है। यह महान पुण्यमयी, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाली, सब पापों को हरने वाली है तथा इसका व्रत करना भी उत्तम माना गया है।

इस दिन जिन भी भक्तों ने कमल पुष्प से कमललोचन भगवान श्रीविष्णु का पूजन तथा एकादशी का उत्तम व्रत किया है, उन्होंने तीनों लोकों और तीनों सनातन देवताओं का भी पूजन कर लिया।

अत: आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक मनुष्य को भली भाँति धर्म का आचरण करना चाहिए। इस कारण यत्नपूर्वक इस एकादशी का व्रत करना चाहिए।

एकादशी की रात में जागरण करके शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान विष्णु की भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। ऐसा करने वाले पुरुष के पुण्य की गणना करने में चतुर्मुख श्रीब्रह्मा जी भी असमर्थ हैं।

सावन में साग, भादों में दही, क्वार में दूध और कार्तिक में दाल का त्याग कर देना चाहिए। जो चौमसे में ब्रह्मचर्य का पालन करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

ब्रह्म वैवर्त पुराण में देवशयनी एकादशी के विशेष माहात्म्य का वर्णन किया गया है।

इस व्रत से प्राणी की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। व्रती के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। यदि व्रती चातुर्मास का पालन समस्त विधियों के अनुसार करे तो व्रती को महाफल प्राप्त होता है।

शांताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभांङ्गम्
लक्ष्मीकांतं कमलनयनं योगिभिर्ध्यान गम्यं
वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्

सूर्य के मिथुन राशि में प्रवेश करने पर यह एकादशी कहलाती है। इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ माना जाता है।

इस दिन से भगवान श्री हरि विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं और फिर लगभग चार माह बाद तुला राशि में सूर्य में प्रवेश करने पर उन्हें उठाया जाता है।

जिस दिन भगवान को उठाया जाता है उस दिन को देवोत्थानी एकादशी कहा जाता है। इस मध्य के अंतराल को ही चातुर्मास कहा गया है।

पुराणों में वर्णन आता है कि भगवान विष्णु इस दिन से चार मासपर्यन्त (चातुर्मास) पाताल में राजा बलि के द्वार पर निवास करके कार्तिक शुक्ल एकादशी को लौटते हैं।

इसी प्रयोजन से इस दिन को ‘देवशयनी’ तथा कार्तिक शुक्ल एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी कहते हैं।

इस काल में यज्ञोपवीत संस्कार, विवाह, यज्ञ, दीक्षाग्रहण, गृहप्रवेश गोदान, प्रतिष्ठा एवं जितने भी शुभ कर्म है, वे सभी त्याज्य होते हैं। भविष्य पुराण, पद्म पुराण तथा श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार हरिशयन को योगनिद्रा कहा गया है।

*ई०/पं०सुन्दर लाल उनियाल
नैतिक शिक्षा व आध्यात्मिक प्रेरक
दिल्ली/इन्दिरापुरम,गा०बाद/देहरादून

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