वीरान और बंजर पड़े गांवों में क्या लौटेगी कभी रंगत?

वीरान और बंजर पड़े गांवों में क्या लौटेगी कभी रंगत?
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50 वर्ष पूर्व उत्तराखंड के गांव की रंगत ही कुछ और थी। लोग शहरी सभ्यता से दूर रहते थे। उनका एक लोक जीवन था। लोक संस्कृति थी। लोक समाज था। मर्यादा, नैतिकता, कार्यकुशलता और भाईचारा पहाड़ के जीवन के जन्मजात अंग रहे हैं। वे खेतों मे कृषक और से सीमा पर सैनिक के रूप में जग विख्यात रहे हैं। साथ ही अपने ज्ञान, कर्म और कौशल के द्वारा जगद्गुरु भी माने गये हैं।

[su_highlight background=”#091688″ color=”#ffffff”]सरहद का साक्षी @कवि:सोमवारी लाल सकलानी, निशांत[/su_highlight]

आदिकाल में अनेकों ऋषि- मुनियों की तपस्थली उत्तराखंड रहा है। पूरा हिमालयन क्षेत्र अपनी नैसर्गिक सुंदरता, अपनी सदानीरा नदियों, अपनी प्राकृतिक सुषमा, अपनी उतुंग शिखर और गहरी घाटियों के लिए प्रसिद्ध रहा है। आदिकाल से ही ऋषि -मुनि और राजा- महाराजा मोक्ष प्राप्ति के लिए स्वर्ग भूमि में आते रहे। तब यहां न तो संसाधन थे। न साधन थे। न भौतिक सुख- सुविधाएं थी। सर्वत्र आध्यात्म का डेरा था। किंतु फिर भी यहां बसायत थी और यहां गरिमा पूर्ण लोकजीवन था।

वीरान और बंजर पड़े गांवों में क्या लौटेगी कभी रंगत?

आधा शताब्दी पहले धीरे- धीरे लोगों में भौतिकवाद के प्रति उत्सुकता बढ़ने लगी। नकल की प्रवृत्ति बढ़ने लगी और हम अपने मूलभूत संसाधनों से विमुख होते जा गए। मजबूरी के नाते जनसंख्या के भार के कारण कुछ लोगों ने शहरों में पलायन किया और वहीं बस गए। शायद ही उनमें से कोई लौटकर पर्वतीय क्षेत्रों में आया हो। हां ! यदि कोई दुर्भाग्य का मारा रहा हो तो उसने अवश्य अपनी जगह- जमीन पहाड़ में फिर से खोजी और नए ढंग से बसायत की।

मजबूरी में घर बार छोड़ना अलग बात है और संपन्नता के कारण घर बार छोड़कर चले जाना दूसरी बात है। व्यक्ति की संपन्नता के कारण उसका घर गांव गुलजार होना चाहिए, न कि एक बंजर भूमि के रूप में तब्दील होना चाहिए।

पर्वतीय क्षेत्रों में सड़कों का निर्माण होने के कारण यह माना गया था कि उत्तराखंड में विकास द्रुतगति से होगा। लोगों को यही संसाधन उपलब्ध होंगे। जीवन स्तर सुधरेगा। गांव में मूलभूत सुविधाओं के कारण कर्म- कौशल का विकास होगा। लेकिन यह बात कोरी कल्पना के रह गई। लोगों ने सड़कों के नजदीक सुविधा भोगी होने के कारण घर बनाने शुरू किए। आपसी भाईचारा न होने के कारण या उसमें कमी आने के कारण भी लोगों ने अपने   पृथक- पृथक निवास स्थल बना लिए।  कुछ लोग शहरों की ओर चले गए और वहीं पर निवास करने लगे। धीरे- धीरे पर्वतीय गांव बंजर होते गए और इस बुराई का अनुकरण अन्य लोग भी करने लगे। सैकड़ों परिवारों वाले गांव वीरान हो गए। उत्तराखंड बनने के बाद तो यह स्थिति और भी खराब हो गई। लोगों का जीवन स्तर सुधरा और लोगों ने घर- गांव की तरफ ध्यान देना एक प्रकार से बंद ही कर दिया।

कृषि का आधार पशुधन है। पशुधन के कारण खेती, उद्योग- धंधे, कुटीर उद्योग तथा साल भर की दिनचर्या व्यवस्थित रहती है। लोगों ने पशुधन से मुख मोड़ लिया। गोबर की जगह रासायनिक खादों का प्रयोग करना शुरू किया। कीटनाशकों का प्रयोग होने लगा। परंपरागत बीजों के स्थान पर संकर बीजों का प्रयोग करना शुरू किया। पांच सात साल तो स्थिति अच्छी रही लेकिन उसके बाद ही खलियान किसी कार्य के नहीं रहे। पूरी धरती उसर हो गई और लोगों ने उन खेतों में फसल बोना ही बंद कर दिया।

विगत एक दशक से तो उत्तराखंड के गांव में एक और बुराई व्याप्त हो चुकी है। पैसे वाले लोगों ने अपने पारंपरिक खेतों में खेती की जगह होटल स्थापित कर लिए हैं। औने- पौने दामों पर खेती की जमीन बेचकर बड़े-बड़े होटल और रेस्तरां खड़े हो चुके हैं। चंबा- मसूरी राजमार्ग में स्थित फल पट्टी में आज यह बुराई देखी जा सकती है।

गांव आज केवल कवि की कल्पना तक सीमित रह चुके हैं या उन असहाय लोगों के लिए हैं जिनके आर्थिक संसाधन अत्यंत न्यून हैं। जिन्होंने मनरेगा को ही अपनी नियति मान लिया है।

40- 50 वर्ष पूर्व पर्वतीय क्षेत्रों के लोग अत्यंत मेहनती होते थे। मातृशक्ति घर -गांव, खेती-बाड़ी के रीढ़ होती थी। प्रत्येक कार्य व्यवस्थित रूप से किया जाता था। पारिवारिक योजनाएं बनती थी और उसी के अनुसार दिनचर्या संपन्न होती थी। तत्कालीन कुछ सामाजिक बुराइयों को छोड़ दिया जाए तो उस समय का ग्रामीण जीवन एक वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित था। एक नियोजित विकास का दर्पण था। स्थान और परिस्थितियों के अनुकूल विकास का एक मॉडल था। लेकिन आज यह स्थिति बिल्कुल विपरीत है। कागजों पर सभी लोग किसान हैं लेकिन किसी के पास न बैल हैं, न हल है। बंजर खेत हैं।  खेत- खलियानों की जगह झाड़ झांकर है। जंगली पशुओं का एकाधिकार होता जा रहा है। आंशिक रूप से जो किसान खेती कर भी रहे हैं, वे बंदरों और सुअरों के आतंक से परेशान हैं। धीरे-धीरे अब वे भी खेती से विमुख होते जा रहे हैं।

कल मैंने चंबा के समीपस्थ गांवों का भ्रमण किया। चंबा प्रखंड के एक बड़े गांव सौड़ तथा छोटे गांव डुंगल़ी में गया। कभी गुलजार रहने वाले ये दोनों गांव आज अपनी दशा पर रो रहे हैं। हां! दीपक- बाती करने के लिए कुछ लोग आज भी गांव में हैं। कुछ लोगों ने अब गांव में सोलर प्लांट लगा लिए हैं। होम स्टे योजना के तहत कुछ नव निर्माण कर लिए हैं लेकिन यह भी केवल भौतिक संसाधनों के लिए हैं। न कि पर्वतीय परिस्थिति के अनुकूल कर्म- कौशल के साधन है।

अपेक्षा की जाती है कि पहाड़ों के लोग एक दिन  अपने बंजर खेतों की ओर लौट आएंगे। अपने खंडर घरों की मरम्मत करेंगे। अपनी आस्था से जुड़े हुए इन पैतृक गांव को संवारेंगे और उस ग्रामीण संस्कृति को जिंदा रखेंगे जिसके अस्तित्व पर आज हम टिके हुए हैं।