शनैः शनैः अपनी पहचान खोते जा रहे हैं हमारे परम्परागत थौळ कौथिग, माता श्री राजराजेश्वरी (जलेड) के आंचल में आज 10 गते बैसाख लगता था मखलोगी का प्रसिद्ध धारू का मेला

शनैः शनैः अपनी पहचान खोते जा रहे हैं हमारे परम्परागत थौळ कौथिग, माता श्री राजराजेश्वरी (जलेड) के आंचल में आज 10 गते बैसाख लगता था मखलोगी का प्रसिद्ध धारू का मेला
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उत्तराखण्ड की संस्कृति के द्योतक हमारे परम्परागत थौळ मेले दिनों-दिन अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। संचार क्रांति के इस युग में हम अपने परम्परागत मनोरंजन के साधनों एवं सांस्कृतिक विरासतों को भुलाये जा रहे हैं। आज के दिन याने 10 गते बैसाख को मखलोगी प्रखण्ड अंतर्गत जलेड खण्डकरी स्थित माता श्री राजराजेश्वरी के आंचल में इस क्षेत्र का प्रमुख धारू का मेला लगता था।

अस्सी के दशक तक लगभग यह पौराणिक थौळ अपनी परम्परा पर कायम रह सका और उसके बाद शनैः शनैः अपनी पहचान बिसराता चला गया। धारू के थौल वाला यह स्थान अब बैसाख माह की 10 गते को वीरान रहकर अपनी पहचान खो चुका है।
आज जहां इन्सान दिन में न जाने कितने बार नये वस्त्र पहनकर नित नये फैशन करता आ रहा है वहीं एक समय था, जब वर्षभर में यदि नये कपड़े पहनने का कोई मौका होता था, तो वह अवसर होता था बैसाख माह के थौळ मेले या फिर दीपावली। सालभर में लगभग दो ही अवसरों पर नये वस्त्र बनाये जाने का मौका मिलता था।

केवल शादी ब्याह के अवसरों को छोड़कर। गांवों में वर्तमान की भांति दर्जियों की बहुतायत कमी होती थीं, केवल बाजगी समाज ही कपड़े सिलाई का काम किया करता था, हमारे गांव में स्व. जुठियादास के पास कपड़ों का जमावड़ा लगा रहता था। उनकी माता स्व. सारंगी देवी भी आंगड़े सिलाई का काम किया करती थीं, चूड़ाकर्म संस्कार अथवा विवाहादि मौके पर श्रीमती सारंगी द्वारा दूल्हा दुल्हन के लिए सिरहानी बनाकर दी जाती थी। चूड़ाकर्म के पीले वस्त्र भी श्रीमती सारंगी व उनका बेटा स्व. जुठिया दास एवं स्व.मंगलदास सिलवाकर देते थे। बाद में स्व. मंगलदास वन विभाग में नौकरी लग गए थे। उनकी मृत्यु के बाद अब उनका बेटा दिनेश वन विभाग में सेवारत है।

धारू के मेले के मौके पर वन विभाग में सेवारत स्व. मंगलदास घर आकर अपने भाई स्व. जुठियादास के साथ मेले में ढोल-दमाऊ के साथ मण्डाण, चौथा आदि लगाकर गांववासियों को ले जाया करते थे। रमोलगांव के स्व. गरीबदास दमाऊ बजाने में माहिर थे। उनके दमाऊ की टंकार नाचने वालों को खूब भाती थी। मखलोगी प्रखण्ड में धारू का मशहूर मेला होता था। इस थौळ के मौके पर ही दूरदराज की बेटी-बहूओं, माता-बहनों, बुजुर्गों, भूले-बिसरों का मिलन हो पाता था। लोग महिनों पूर्व से इस थौल की तैयारी में जुट जाते थे।

मेले में पहुंचते ही ग्रामीणों का हूजूम सबसे पहले बाजे गाजे के साथ माता श्री राजराजेश्वरी के दर्शन पूजन के बाद मेले का भ्रमण करते थे।
इस इलाके के विभिन्न गांवों से मेले में परम्परागत ढोल बाजणे गांववासियों के हूजूम के साथ जाते थे। दूर-दूर से छोटे व्यापारी हलवाई आदि मेले में आते थे। मेले में पकोड़ी, जलेबी तथा बकरे की मीट की कछमोळी व भूनी आदि का लोग खूब भरपूर आनन्द लेते थे। बड़े बुजुर्ग व रहीशजादे शुद्ध देशी गुड़ व सीरे से बनी कच्ची शराब का रसास्वादन भी करते थे। ग्रामीण समाज में पक्की स्कॉच का जमाना नहीं हुआ करता था। शादी विवाह के लिए भी दूल्हा-दुल्हन देखने के अवसर भी मेले में मिलते थे। बहुत कम खर्च पर लोग मेले का आनन्द उठाते थे।

राजधानी दिल्ली प्रमुख व्यवसायी एवं ग्राम फैगुल मूल के प्रमुख समाजसेवी बचन सिंह धनोला ने एक संदेश में धारू के थौळ की यादें तरोताजा करते हुए कहा कि आज 10 गते वैशाख बचपन के सबसे लोकप्रिय थोल (धारू का थोल) की आप सबको बधाई दी। बतौर बचन सिंह धनोला ज़ब हम छोटे थे तो धारू का थौल हमारा मुख्य थोल हुआ करता था। जिसका इंतजार हमें बड़ी बेशब्री से रहता था। जैसे जैसे दिंन नजदीक आते थे वैसे वैसे हमारी भूख नींद भी गायब होने लगती थी, और हो भी क्यूँ नहीं, क्योंकि हमें नये कपड़े पहनने को मिलते थे साथ में 5/10 रुपये खर्चे के लिये भी मिल जाते थे। जिनसे हम दुध वाली अईसक्रीम, जलेबी पकौड़ी आदि खाया करते थे। तब हमारी खुशी का ठिकाना नहीं रहता था। तब हम लोग अपने बड़े भाई बहनों के साथ थोल में जाते थे। उस समय खोने का डर बहुत लगता था कहीं हम थौल में खो ना जाये और घर वाले भी डराया करतें थे की जंहाँ भी जाना हाथ पक़ड कर जाना। उस समय भीड़ भी बहुत होती थी दूर दूर गाँवों से लोग थौल देखने आते थे। और लोगों में अलग ही उत्साह देखने को मिलता था। जैसे-जैसे हम बड़े होते गये वैसे वैसे हम अपने रीति रिवाज से भी दूर होते गये। आज धारू का थौल एक कहानी बनके रह गया।

@ बचन सिंह धनोला

कुल मिलाकर संचार क्रांति के इस युग में मनोरंजन के साधनों की कमी नहीं है। एकमात्र मोबाइल ने ही हमारे सभी संसाधनों को किनारे कर दिया है। मनोरंजन, हाथ घड़ी, पहाड़ा, जोड़-घटाना, चिट्ठी-पत्री से लेकर सिनेमाघरों, टीवी-रेडियो आदि-आदि सबको एक मोबाइल ने विलुप्तता की कगार पर पहुंचा दिया है।

अपनी पौराणिक परम्परागत सांस्कृतिक विरासतों के प्रति हमें चिन्तन की आवश्यकता है। इसके लिए समाज के प्रत्येक वर्ग को आगे आना होगा।

  • केदार सिंह चौहान ‘प्रवर’