Datya Kothar: पौराणिक वास्तुकला की अनूठी मिशाल, 250 साल पुराना मुखमाल गांव का डाट्या कोठार

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Datya Kothar: पौराणिक वास्तुकला की अनूठी मिशाल, 250 साल पुराना मुखमाल गांव का डाट्या कोठार

Datya Kothar: इस तश्वीर में जो आप देख पा रहे हैं वह किसी महल या आलीशान भवन का मुख्यद्वार नहीं अपितु पौराणिक वास्तुकला की एक अनूठी मिशाल है 250 साल पुराना मुखमाल गांव का डाट्या कोठार (Datya Kothar)। प्रतापनगर विकास खंड के पट्टी उपली रमोली मद्दे मुखमाल गांव में लगभग ढाई सौ वर्ष पुराना यह डाट्या कोठार अपनी पहाड़ी शैली के लिए लोगों के आकर्षण का केंद्र बना रहता है।

कोठार याने गोदाम जिसमें अनाज रखा जाता है। अन्न के भंडारण का वह साधन जिसमें धान, गेंहू, कोदू, झंगोरा, चौलाई या दालें सालों तक रखी जा सकती है। कोठार में रखे हुए इन धनधान्य के खराब होने की संभावना न के बराबर होती है। कोठार को पहाड़ी कोल्ड स्टोर के नाम से जाना जाता है, जिसमें धान, गेंहू, कोदू, झंगोरा, चौलाई या दालें सुरक्षित रखी जाती है।

पौराणिक वास्तुकला की अनूठी मिशाल, 250 साल पुराना मुखमाल गांव का डाट्या कोठार (Datya Kothar)
डाट्या कोठार

कोठार अथवा कुठार जो कि मुख्यतः देवदार, बांझ, रयाल की लकड़ी के बने होते हैं और ये सिर्फ भंडार ही नहीं अपितु हमारी संस्कृति के अभिन्न अंग भी रहे हैं। इस भंडार में हमारे बुजुर्गों ने कई पीढ़ियों तक अपने अनाजों और जरूरत के सारे साजो-सामान रखे हैं। ये दिखने में जितने आकर्षक होते हैं उतने ही फायदेमंद भी। पहाड़ों में पुराने समय में लोग सिर्फ खेती किसानी को ही बढ़ावा देते थे और उसी खेती किसानी के जरिए उनकी आमदनी भी होती थी।

वस्तु विनिमय का जमाना भी था तो लोग बाज़ार और नौकरी को ज्यादा महत्व नहीं देते थे। पहले के समय लोग खेती किसानी से अन्न जैसे धान, गेहूं, मंडवा (कोदा), झंगोरा, कौणी, चिणा, मक्का, जौ या दालें जैसे कि राजमा, उड़द, तोर, रंयास, गहथ, लोबिया, नवरंगी या किसी भी प्रकार की फसलें उगाते थे सबको रखने की एकमात्र जगह थी कोठार, जो कि मुख्य घर से अलग ही होता था।

जो दूर से दिखने में एक आलीशान भवन जैसा ही लगता है। बाहर से दिखने पर लगेगा कि छोटा-सा है पर इसके अंदर जाकर ही पता चलता है कि भंडारण की जितनी क्षमता इसमें होती है। शायद ही किसी स्टोर रूम की होती होगी। हर अन्न के लिए अलग अलग खाने (सांचे) बने होते थे, उसका माप दूण (दोण) या बोरी के हिसाब से होता था और जब बात इसके बाहरी सजावट की की जाय तो रवांई-जौनपुर में स्थापत्य कला के ये बेजोड़ नमूने हैं। इसके आगे के खंभों पर बारीकी से नक्काशी दारा बेल बूटे की आकृतियां बनी हुई होती है जो इसकी सुंदरता में चार चांद लगा देते हैं।

दरवाजा छोटा-सा होता है, ताला खोलने के लिए एक लंबी छड़नुमा आकर की चाबी होती है और इसका ताला खोलना हर किसी की बस की बात नहीं होती है। ताला बड़ी तरकीब के साथ खोलना होता है। कोठार/कुठार के दरवाजे से मुख्‍य घर से एक सांगल/चेन बंधी रहती थी और उसके बीच-बीच में घंटियां भी बंधी रहती थी ताकि यदि कोई चोर चोरी करने के इरादे से कुठार में घुसने की कोशिश भी करेगा तो घर के लोगों को पता चल जाता था कि चोरी होने वाली है।

सुरक्षा व्यवस्था का भी यह अजूबा नमूना था। अनोखी ही थी सुरक्षा की यह तरकीब। यानी कि आज के सीसीटीवी कैमरे चोर को पकड़ने में उतने मददगार साबित नहीं हो पा रहे हैं जितनी हमारे बुजुर्गों की तरकीब कामयाब रही है। भंडारण का जो तरीका हमारे बुजुर्गों ने ईजाद किया है वो आज के बड़े से बड़े इंजीनियर भी नहीं कर पाए हैं। लकड़ी के इस भंडार में किसी भी अन्न में कभी न तो कीड़े पड़ने की संभावना रही है न कोई फफूंद, इस कुठार में हमारी लोक संस्कृति भी दिखती है।

पहाड़ों में लोग पुराने समय से ही खेती किसानी से अपना गुजर बसर करते थे और खेती बाड़ी से ही वे सम्पन्न भी थे। लोगों में ईर्ष्या नाम की चीज दूर-दूर तक नहीं थी। अगर प्रतिस्पर्धा थी तो वो खेती-बाड़ी और पशुपालन को लेकर थी जिस परिवार की जितनी ज्यादा जमीन उसका उतना बड़ा रुतबा और ओहदा होता था।

जिस परिवार के पास कुठार होता था, उस घर को सर्वगुण सम्पन्न माना जाता था। लोग नाते रिश्ते भी जमीन जायदाद और अन्न धन को देखकर करते थे। समय बदला और समय के साथ साथ लोगो की सोच और काम करने के तरीको में बदलाव हुए और साथ ही रहन-सहन में भी बदलाव हुए।

लोगों ने कुठार की जगह घर बनाते समय एक स्टोर रूम बनाना शुरू कर दिया, क्योंकि खेती में अब कोदा, झंगोरा, कोणी, धान, गेंहू की जगह टमाटर, बीन्स, शिमला मिर्च, राई, मुली, गोभी, मटर, आलू आदि नगदी फसलों ने ले ली है तो हमारे लिए कुठार होना जरूरी नहीं है। घरों में रखे परम्परागत कोठार लोगों ने आज की आधुनिकता के चलते या तो जला दिए हैं या फिर उन्हें कबाड़ में सड़ा-गला अथवा कबाड़ में बेच डाला है।

जिला कांग्रेस कमेटी टिहरी गढ़वाल के अध्यक्ष राकेश राणा ने कहा कि आज कोठार अपने अस्तित्व ही नहीं अपने नाम और अस्तित्व की लड़ाई भी नहीं लड पा रहा है, क्योंकि 90 फीसदी कोठार अब विलुप्ति की कतार पर है। यदि इसका संरक्षण होम स्टे और पर्यटन के क्षेत्र में किया जाय तो संभवतः इसका बचाव हो सकता है।

फ़ोटो साभारः- राकेश राणा
स्थान: मुखमाल गाँव उपली रमोली प्रतापनगर टिहरी गढ़वाल
साभार लेखः- हैरी नेगी नई टिहरी।

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