कवि निशांत की दो कवितायेँ : बात्सल्य बढ़ सुख नहीं कोई, देखो जी ! यह भी इक तारा

कविता : सिद्ध गुरु माणिकनाथ नायक
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बात्सल्य बढ़ सुख नहीं कोई 

यह तो नन्ही जान हमारी, खुशियों का दीप जलाए
घर आंगन – भीतर बाहर , चंदा- सूरज  दिखलाए।
भोर समय में जग जाती, दिन दिग- दर्शन करवाए।
खग- कुल का करतब देखे, ध्यान- मग्न बन जाए।

मन कितना भी मायूस हो,  यह नित उल्लास जगाती।
प्रति पल देखूं भोली छवि मैं, मै भी भोला बन जाऊं।
भूख प्यास हर देती है यह,  कुदरत का रूप सुहाती।
नन्ही परी यह प्राणवायु सम, निशांत भाव भर आती।

भूल बुढ़ापा मै जाता हूं ,नटखट भोला चंचलपन लख।
हृदय प्रसन्न,मन मुदित हो जाता, तुम्हें देख – देख कर।
बात्सल्य  बढ़ सुख नहीं कोई, निर्मल शुचि पावन रस।
तुम्हे देख कर नन्ही दुनिया, रह नहीं सकता अपने बस।

 

देखो जी ! यह भी इक तारा।

देखो जी ! यह भी इक तारा,
सौरमंडल का जलता तारा।
उगता है यह धार के ऊपर,
छिप जाता है धार के पीछे।
      देखो जी ! यह भी इक तारा—
देता यह सबको जीवन सारा,
इसके बिना जग जीवन मारा।
ब्रह्मांड में यह नहीं होता तारा,
तो चढ़ता कैसे धरती का पारा।
      देखो जी ! यह भी इक तारा—
इसको सूरज कहो या तारा,
इस पर जीवन चरखा सारा।
लाख करोड़ों अरबों नभ तारे,
सम्मुख इसके निस्तेज हैं सारे।
         देखो जी ! यह भी इक तारा—
यह पर्वत के कोने पर उगता,
पर्वत के ही पीछे यह छिपता।
यह सागर  तट पर भी उगता,
संध्या सागर मे ही यह डुबता।
         देखो जी ! यह भी इक तारा—
यह क्षितिज पर प्रतिदिन आता,
छिपता सूरज  नभ को भाता।
पर्वत पेड़ों की परछायी ऊपर
बाल सूर्य बिम्ब कोटि बनाता,
          देखो जी ! यह भी इक तारा—
मेरे घर आंगन आने से पहले,
यह सुरकुट पर्वत रंग जमाता।
स्वर्ण -किरण संग हौले -हौले,
निशांत -द्वार पर दस्तक देता।
        देखो जी ! यह भी इक तारा—

[su_highlight background=”#091688″ color=”#ffffff”]*कवि :सोमवारी लाल सकलानी, निशांत[/su_highlight]