त्र्यम्बकेश्वर मृत्युञ्जय महादेव सावली

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त्र्यम्बकेश्वर मृत्युञ्जय महादेव सावली

त्र्यम्बकेश्वर मृत्युञ्जय महादेव सावली

त्र्यम्बकेश्वर मृत्युञ्जय महादेव एवं आशुतोष हैं, उनका चरित्र बहुत उदात्त एवं अनुकम्पा युक्त है। भोलेनाथ साधुता से परिपूर्ण ज्ञान और वैराग्य की प्रथम पाठशाला हैं। भगवान भोलेनाथ को विविध नामों से अभिहित किया जाता है।

स्तुति प्रार्थना महामृत्युञ्जय महादेव की

हस्ताभ्यां कलशद्वयामृतरसैराप्लावयन्तं शिरो,
द्वाभ्यां तौ दधतं मृगाक्षवलये द्वाभ्यां वहन्तंपरम् ।
अङ्कन्यस्तकरद्वयामृतघटं कैलासकान्तं शिवं,
स्वच्छाम्भोजगतं नवेन्दुमुकुटं देवं त्रिनेत्रं भजे।।
हस्ताम्भोजयुगस्थकुम्भयुगलादुद्धृत्य तोयं शिर:,
सिञ्चन्तं करयोर्युगेन दधतं स्वाङ्के सकुम्भौ करौ।
अक्षस्रङ्मृगहस्तमम्बुजगतं मूर्धस्थचन्द्रस्रव-,
त्पीयूषार्द्रतनुं भजे सगिरिजं त्र्यक्षं च मृत्युञ्जयम्।।
भगवान भोलेनाथ

मृत्युञ्जय एवं आशुतोष तो हर मानव की जुवां पर निरन्तर रहता है। भगवान शङ्कर की मूर्ति उतनी महत्वपूर्ण नहीं जितना उनका विशिष्ट रूप लिङ्ग के रूप में है। यह सभी लिङ्ग रूप विविध रूपों में प्रकट हुए हैं यह सर्व विदित है- जैसे ज्योतिर्लिङ्ग, स्वयम्भूलिङ्ग, नर्वदेश्वर लिङ्ग, धातु से निर्मित लिङ्ग, रत्न से निर्मित लिङ्ग, पार्थिव लिङ्ग आदि हैं। इन सभी रूपों की उपासना भक्तों द्वारा की जाती है।

यह भी सत्य है कि परब्रह्मस्वरूप परमात्मा की स्तुति का गान किस व्यक्ति से सम्भव है। फिर भी यथा सम्भव यथाशक्ति हर मानव भगवान भूत-भावन की अर्चना अवश्य करता है। देवों के देव महादेव कण कण में विद्यमान हैं और अपने भक्तों पर कृपा बरसाने वाले हरिहर हैं, योगीश्वर भगवान शिव की महिमा अनन्त है, अनादि है क्योंकि प्रभो! गौरीशंकर सदैव सब वस्तुओं से युक्त परिपूर्ण हैं।

भारतीय इतिहास इस बात का साक्षी है कि शिव महिमा को जानना सब के विषय की बात नहीं है, तभी तो तत्वज्ञ भीष्म पितामह ने शिव महिमा को जानने के लिए भगवान श्रीकृष्ण से अनुनय-विनय की और श्रीकृष्ण ने भी यही कहा कि शिव तत्व को जानने में ब्रह्मा, बड़े बड़े महर्षि, इन्द्र आदि देवता भी समर्थ नहीं हैं। फिर भी अनादि अनन्त के विषयक जानने का लघु प्रयास तो किया जा सकता है। वैदिक ऋचाएं, उपनिषद, स्मृति और पुराणों में भगवान भोलेनाथ को सर्वोपरि माना है।

संसार में जब कुछ भी नहीं था, ब्रह्मा और विष्णु आवाक खड़े थे तभी एक स्थूण का प्रकटीकरण आश्चर्य उत्पन्न करने वाली घटना थी, जिसके ओर छोर को जानने के लिए ब्रह्मा और विष्णु निकल पड़े, जब कोई अता-पता नहीं चला तो ब्रह्मा के मन में कुछ कपट आ गया और केतकी पुष्प को साक्षी बता कर यह कह दिया कि हमें उस विराट स्थूण का एक छोर मिल गया, भगवान विष्णु ने तो सत्य का सहारा लेकर यही कहा कि मुझे कुछ पता नहीं लगा और भगवान महेश के कोप का भाजन बनना पड़ा ब्रह्मा और केतकी को?

उन्हें अभिशप्त किया कि ब्रह्मा जी आपके असत्य भाषण से आप विश्व में अपनी पूजा से रहित रहेंगे व केतकी पुष्प भी भोलेनाथ की अर्चना में काम नहीं आएगा, अनुनय-विनय करने पर ब्रह्मा जी को एक मात्र पुष्कर में पूजा अर्चना हेतु एक मात्र मन्दिर का स्थान मिला। इन सभी प्रसंगों से स्नेहिल पाठक विज्ञ हैं।
अब सावली शिवालय महादेव की ओर रुख करते हैं।

सावली गांव की स्थापना

सन् 1567 में (सम्बत 1624) में प्रयाग देवाचार्य के सुपुत्र पण्डित श्री महाशर्मा जी ने सावली गांव की स्थापना की थी जो आज उनकी कृपा से पुष्पित व पल्लवित हो रहा है। इस पर ‘सिद्ध शक्तिपीठ मां पुण्यासिणी’ पुस्तक में किंचित प्रकाश डाला था।

उन्हीं ज्योतिषवराय के अथक प्रयास व आशीर्वाद से सावली गांव आज तीस वर्ग मील से अधिक भू भाग में अपने फलीभूत हो रहा है और स्थान, आजीविका और शिक्षा दीक्षा के लिए भारत देश के प्रत्येक कोने में अपने पैर जमा कर बैठे हैं।

गांव की ओर दृष्टि पात करने से, जन श्रुतियों से पुराने बुजुर्गो के अनुभवों से, थोड़ा बहुत सामान्य अनुभवों से व अपने बड़े गुरु भाईयों से यह ज्ञात हुआ है कि जैसे-जैसे आबादी बढ़ी तो पेट की क्षुधा मिटाने के लिए स्वाभिमानी प्रवृत्ति के कारण गांव के अगल- बगल अनाज उत्पादन हेतु खेत बनाए गए और आजीविका का मुख्य साधन कृषि कर्म बनाया।

अपनी विद्वत्ता से ज्योतिष, कर्मकाण्ड, वैद्यकीय जड़ी बूटियों से व शोध विषयों पर मजबूत पकड़ तो बनाई ही थी, फिर भी समाज को कर्म की शिक्षा देने के लिए कृषि आवश्यक है, अतः खेतों को बनाना आवश्यक था।

इतनी सटीक ज्योतिष विद्या थी कि उन ज्योतिर्विदों की परख करने (अच्छे लोगों से ईर्ष्या अधिक लोग करते हैं) कतिपय महानुभाव आए व गांव के औजी से सामान्य बोल चाल कर उनके औजी के प्रश्न बैल के चलते चलते मूत्र विसर्जन से बनी इस लाइन को क्या कहते हैं? (वक्ररेखा) नहीं बता पाए और वही से वापस लौट गए, वापस मुड़ने के कारण उस स्थान का नाम ‘मुड़िया गांव’ पड़ा।

घट (पनचक्की घ्राट) जाने के रास्ते ‘घटबाट’ के पास जहां दो नदियों का संगम है (पहाड़ी खाले) वहां (आगे कुछ प्रकाश डालने का प्रयास करूंगा) के ऊपर खेत बनाए, ठीक नासिक की तरह, पहले सूखे खेत थे धीरे-धीरे पानी की प्रचुरता से धान की खेती हेतु खेत तैयार किए, एक खेत के मध्य में एक पत्थर था।

उसे हटाने उखाड़ने का पूरा प्रयास किया पर न तो पत्थर टूटा न ओर छोर का पता ही चल पाया, हां ऊपर से थोड़ा अवश्य टूटा था पर जब नहीं टूटा तो काफी समय तक सीमा (ओडा) का काम किया पर उक्त खेत एक ही सज्जन का होने से सीमांकन का सहारा भी नहीं बन सका, बुद्धि जीवियों की अपनी विशेषता तो होती ही है, समझ गए कि यह पत्थर साधारण पत्थर नहीं अपितु स्वयंभू शिवलिङ्ग है।

अतः खेत जुताई के समय, रोपाई में, धान कटाई में वहां पर रोट प्रसाद चढ़ाने का क्रम प्रारम्भ हो गया, और शिवरात्रि, श्रावण मास में, वैकुण्ठ चतुर्दशी को पूजा अर्चन और यह क्रम अविरलता से चलता रहा, उस क्षेत्र का नाम आज भी महादेव (माद्यों) के नाम से जाना जाता है।

धीरे-धीरे कुछ पत्थर एकत्रित कर मण्डप, फिर चार दीवारी, फिर पत्थरों की स्लेट से छत, शनै: शनै: एक दो कमरे, अच्छा मन्दिर और धीरे-धीरे उन्नति की ओर अग्रसर व आज एक भव्य मन्दिर, सन् 1974 में असामयिक आकस्मिकता विपत्ति के कारण (यद्यपि मेरे खेत तो वहां हैं नहीं! अतः पहले कभी जाना नहीं हो पाया) पर अपनी चाची जी के साथ धान रोपाई हेतु खेत तैयार करने वहां जाना पड़ा व उनके बाद कई बार गया।

तब उस मन्दिर की विशेषता को निकट से समझने का समय मिला। इसको परिसर के रूप में विकसित करने का प्रयास करने वाले विभूतियों को साधुवाद एवं बहुत बहुत शुभकामनाएं। आज श्रेय सबको है, पर विशेष उनको! जिन्होंने प्रेरणा प्रदान की।

एक लाख रुपए की धनराशि देकर नव जीर्णोद्धार का श्री गणेश किया श्री रामचन्द्र सकलानी ने और उस पर चिन्तन व मनन कर तन मन धन से अपना योगदान दिया श्री राकेश भट्ट ने उनके इस पुनीत कृत्य की सराहना नहीं कर सकता हूं और उनकी इस असीमित उदारता को शब्दों में बांध कर सीमित भी नहीं करना चाहता हूं।

मन्दिर समिति के अध्यक्ष श्री सोहनलाल, अरुण, गिरीश आदि सभी लोगों के श्रम से आज इस मन्दिर में भव्यता के दर्शन हो रहे हैं और होते रहेंगे। श्री संजय बहुगुणा की उदारता भगवान शिव सदैव इसी तरह बनाए रखें। इस त्र्यम्बकेश्वर मृत्युञ्जय महादेव मंदिर सावली में सदैव अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु मनोकामना पूर्ति करने वाले भक्त लाभार्थियों का तांता लगा रहता है।

नाम से क्या? यह मृत्युञ्जय महादेव केवल मृत्यु को जीतने वाला ही नहीं अपितु दो तीन दिन अभिषेक करने से मानव की मन मुराद पूरी करने वाला अनुपम व अद्भुत स्वयं-भू शिवालय है, त्रिनेत्र धारी त्र्यम्बकेश्वर मृत्युञ्जय महादेव हैं। बिना रात्रि जागरण कर, सबकी गोद भरने वाला है। अन्य शिवालयों में रात्रि जागरण के बाद मन की मुराद पूरी होती है, पर यहां महादेव की कृपा हाथ जोड़ने से ही पूरी हो जाती है, यह अतिशयोक्ति नहीं अपितु वास्तविकता है।

वर्ष 2000 में दिखोलगांव निवासी श्री राजेन्द्र सिंह रावत ने कांवड़ लाकर जलाभिषेक किया। अब प्रति वर्ष श्रावण व फाल्गुन में कांवड़ियों द्वारा जलाभिषेक किया जाता है।

*ज्योतिषाचार्य श्री हर्षमणि बहुगुणा 

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