आज हरिशयनी एकादशी है, आइए! जानते हैं हरिशयनी या देवशयनी या पद्मा एकादशी के विषयक यह जानकारी

महान पुण्यमयी, स्वर्ग और मोक्ष प्रदायक, सर्व पापहारा है देवशयनी एकादशी
Bhagwan Shri Hari Vishnu
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आज हरि शयनी एकादशी है, इसे पद्मा एकादशी भी कहते हैं। आज के बाद सभी मांगलिक कार्यों को विराम दिया गया है। केवल कृषि कर्म, इसी लिए एक व्यवस्था बनाई गई है, प्रकृति की हरियाली का आनन्द लेने के लिए समाज को कुछ उत्पादन कर उदर पूर्ति के लिए, प्रकृति से कुछ याचना करने के लिए इन दक्षिणायन में मांगलिक कार्यों को विराम देकर अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी आवश्यक था, न जाने कितने धार्मिक और वैज्ञानिक कारण इन तथ्यों में समाविष्ट हैं, जिन्हें हम ढूंढ भी नहीं पा रहे हैं और परम्पराओं का नाम देकर अपनी जिज्ञासाओं को शान्त कर रहे हैं। भारतीय संस्कृति में हर तरफ वैज्ञानिकता छिपी हुई है। अतः इस संस्कृति की थाह नापना हर मानव के वश में नहीं है। आइए जानते हैं हरि शयनी या देव शयनी या पद्मा एकादशी के विषयक यह जानकारी। ”

नमो स्त्वनन्ताय सहस्त्र मूर्तये
सहस्त्रपादाक्षि शिरोरू बाहवे
सहस्त्र नाम्ने पुरुषाय शाश्वते
सहस्त्रकोटि युग धारिणे नम:।

जिनके सहस्त्र रूप हैं, सहस्त्र नाद हैं, सहस्त्र सिर हैं, सहस्त्र नाम हैँ, जो परम पुरुष हैं, जो शाश्वत हैं, जो सहस्त्र कोटि युगों में अनेक रुप धर कर आते हैं, ऐसे श्रीहरि के श्रीचरणों में आप सबकी और से साष्टांग प्रणाम करते हैं। “आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को “– देवशयनी एकादशी या पद्मा एकादशी भी कहते है। यह महान पुण्यमयी, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाली, सब पापों को हरने वाली है, इसका व्रत करना उत्तम माना गया है।

इस दिन जिस भी भक्त ने कमल पुष्प से कमललोचन भगवान श्रीविष्णु का पूजन तथा एकादशी का उत्तम व्रत किया है, उसने तीनों लोकों और त्रिदेव जो सनातन धर्म के देवता हैं का भी पूजन कर लिया यह माना जाता है।

अत: आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक मनुष्य को भली भाँति धर्म का आचरण करना चाहिए। इन दिनों तपस्वी एक स्थान पर रह कर तप करते हैं। भूमण्डल के सभी तीर्थ ब्रज में निवास करते हैं। अतः इस समय केवल ब्रज यात्रा की जा सकती है, इस कारण यत्नपूर्वक इस एकादशी का व्रत करना चाहिए। तपस्वियों को आवास व भोजन से तृप्त करना चाहिए।

एकादशी की रात में जागरण करके शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाले भगवान विष्णु की भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। ऐसा करने वाले पुरुष के अनगिनत पुण्य की गणना करने में चतुर्मुख श्रीब्रह्मा भी असमर्थ हैं। इस एकादशी का व्रत करने से चक्रवर्ती सम्राट मान्धाता के राज्य का दुर्भिक्ष जो तीन वर्षों से चला आ रहा था समाप्त हुआ और मूसलाधार बारिश से राज्य धन धान्य से समृद्ध होकर परिपूर्ण हुआ। सावन में साग, भादों में दही, क्वार में दूध और कार्तिक में दाल का त्याग कर देना चाहिए। जो चौमासे में ब्रह्मचर्य का पालन करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

ब्रह्म वैवर्त पुराण में देवशयनी एकादशी के विशेष माहात्म्य का वर्णन किया गया है।
इस व्रत से प्राणी की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। व्रती के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। यदि व्रती चातुर्मास का पालन समस्त विधियों के अनुसार करे तो व्रती को महान फल प्राप्त होता है। धार्मिक दृष्टि से यह चार माह भगवान विष्णु के “निद्रा काल” माने गए हैं।

शांताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभांङ्गम् ।
लक्ष्मीकांतं कमलनयनं योगिभिर्ध्यान गम्यं
वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ।।

सूर्य के मिथुन राशि में प्रवेश करने पर यह एकादशी आती है। इसी दिन से चातुर्मास व्रत का आरंभ माना जाता है।
इस दिन से भगवान श्री विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं, या सुतल लोक में महाराज बलि के यहां निवास करते हैं, और फिर लगभग चार माह बाद तुला राशि में सूर्य के प्रवेश करने पर उन्हें उठाया जाता है। यह हमारी मान्यता है, वे प्रभु तो कभी सोते ही नहीं हैं।

जिस दिन भगवान को उठाया जाता है उस दिन को देवोत्थानी एकादशी हरिबोधनी एकादशी कहा जाता है। इस मध्य के अंतराल को ही चातुर्मास कहा गया है। (पुराणों में वर्णन आता है कि भगवान विष्णु इस दिन से चार मासपर्यन्त पाताल में राजा बलि के द्वार पर निवास करके कार्तिक शुक्ल एकादशी को लौटते हैं।)

इसी प्रयोजन से इस दिन को ‘देवशयनी’ तथा कार्तिक शुक्ल एकादशी को हरि ‘प्रबोधिनी एकादशी’ कहते हैं।
इस काल में यज्ञोपवीत संस्कार, विवाह, यज्ञ, दीक्षाग्रहण, गृहप्रवेश गोदान, प्रतिष्ठा एवं जितने भी शुभ कर्म हैं, वे सभी त्याज्य होते हैं। भविष्य पुराण, पद्म पुराण तथा श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार हरिशयन को ‘योगनिद्रा’ भी कहा गया है।

*आचार्य हर्षमणि बहुगुणा

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