वक्त, उसी का अच्छा आता है जो परमार्थ के साथ व्यंग्य वाण से आहत नहीं करता

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    प्रेम ही है जो मानव को अन्दर से पवित्र करता है

    प्रेम हमें ईश्वर से जोड़ता है। औरों से प्रेम हो न हो पर ईश्वर से अवश्य होना चाहिए, ईश्वर से प्रार्थना है कि वो हमारे दिलों में प्यार प्रेम विकसित करें जिससे हमारा जीवन सार्थक बन सके।

    [su_highlight background=”#880e09″ color=”#ffffff”]सरहद का साक्षी @आचार्य हर्षमणि बहुगुणा[/su_highlight]

    प्रेम ही है जो मानव को अन्दर से पवित्र करता है, वह तो पशु पक्षियों की आंखों में देखा व पढ़ा जा सकता है तो फिर मनुष्य की आंखों में क्यों नहीं? मनुष्य तो भगवान की सर्वोत्कृष्ट संरचना है ‌। यदि छोटे बच्चे की आंखों में देखते हैं तो बीज रूप और स्वाभाविक प्यार के अतिरिक्त और कुछ नहीं दिखाई देता है।

    ‘जहां हमने जन्म लिया, वहां इस धरती से प्यार है’

    इसका अभिप्राय ईश्वर के प्रति प्यार है। वैसे भी जननी और जन्मभूमि से सभी प्यार करतें हैं। यह सत्य है कि प्यार का रास्ता सीधे परमात्मा तक जाता है। पर प्रेम निश्छल होना चाहिए, निश्छल प्रेम आंखों से झलकता हुआ दिखाई देता है, मन को मन की आंखों से देखा जा सकता है, कपटी धृतराष्ट्र को पहचानना आवश्यक है यदि पहचाना जा सके तो उससे बचना चाहिए। तो आइए निश्छल, निस्वार्थ प्रेम कर ईश्वर को रिझाने का प्रयास करें।

    ध्यान रखने की बात यह है कि ‘अच्छा वक्त उसी का आता है, जो किसी का बुरा नहीं सोचता। व्यंग्य वाण से आहत नहीं करता।

    चित्त अशुद्धि का प्रधान कारक है अभिमान

    “‘चित्त की अशुद्धि के अनेक कारण हैं, उनमें एक प्रधान कारण अभिमान भी है। इसका कारण मानव जिस व्यक्ति में उस गुण का अभाव (अपने से कम) देखता है तो उसे तुच्छ समझकर उससे घृणा करता है और जिसमें अपने से ज्यादा देखता है उससे ईर्ष्या।

    अतः घृणा व ईर्ष्या से चित्त खराब हो जाता है। गुणों के अहंकार के कारण उसे अपने दोष नहीं दिखाई देते। गुणों का अहंकार बहुत बड़ा दोष है। उसके रहने से हम अन्य अवगुणों का नाश नहीं कर सकते । अच्छाई का अभिमान बुराई की जड़। कतिपय विद्वत् वर्ग असत्य वक्तव्य यह सोच कर दे देते हैं कि किसी को कुछ पता ही नहीं है, और शुद्ध चित्त वाले शान्ति से सुन कर नाहक कोलाहल से बचने का प्रयास करते है। अभिमानी सन्त से पश्चाताप करने वाला पापी अच्छा है।

    जो व्यक्ति यह समझता है कि मैं सच बोलता हूं, तो शायद उसमें कहीं-न-कहीं झूठ छिपा है। सच बोलने वाले का जीवन तो साधक जीवन बन जाता है, अतः ऐसा व्यक्ति अपने अन्दर कोई विशेषता समझता ही नहीं है। लोग कहते हैं कि मैं भगवान को मानता हूं, मैं ईमानदार हूं, मैं कर्ता हूं , भक्त हूं, मैं स्पष्ट वक्ता हूं, आदि-आदि। बस यहीं से दोष उत्पन्न होने शुरू हो जाते हैं, इसलिए अच्छे संस्कारों से युक्त सुयोग्य व्यक्ति को अपने दोषों को देखते रहना चाहिए। किसी पर भी टिप्पणी करना सरल है, परन्तु उसे मूल रूप से समाप्त करने की कोशिश करना दुष्कर है। समस्यायें अनेक, उनको दूर करने के उपायों को खोजना नितान्त आवश्यक है। सारे झगड़े ही समाप्त। इस प्रयास की ओर अग्रसर हो तो आनन्द ही आनन्द होगा। ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे‘ आईए अपने मन के मैल (दोषों) को दूर करने का संकल्प अवश्य करें।

    जरा हटके-

    अब पहाड़ में भी हम सुरक्षित नहीं हैं, कभी बाघ का आतंक तो कभी चोरों का खतरा

    आश्चर्य चकित न हों, यह सत्य है, आज जब पानी के लिए फक्वा पानी में गया तो अपना पानी का पात्र धारे के पास छोड़ कर कुछ दूर घूमने निकला, लौट कर आया तो पात्र नदारद, कुछ दिनों से बाघ का इधर मंडराना भी भयभीत कर रहा है।

    कुछ लोगों ने बताया कि जल्दी से घर चले जाओ! इधर बाघ घूम रहे हैं। मुझे भी ज्ञात हुआ कि श्याम को जब मन्दिर से लौटता हूं तो बाघ का आवागमन महसूस हुआ। वह तो सौभाग्य है कि मुलाकात नहीं हो पाई, अन्यथा गजा पसर की तरह हादसा हो गया होता। इस पर कुछ न कुछ सकारात्मक कार्यवाही अपेक्षित है।