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बेजोड़-बेमिसाल, स्वच्छता,सुंदरता और आकर्षक, दादरा और नगर हवेली, कलेक्ट्रेट (सिलवासा)

बेजोड़-बेमिसाल, स्वच्छता,सुंदरता और आकर्षक, दादरा और नगर हवेली का कलेक्ट्रेट (सिलवासा)

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लेखक, समाजसेवी, श्री मदन मोहन बिजल्वाण के कलेक्ट्रेट उत्तरकाशी का चित्र देखकर अनायास ही केंद्र शासित प्रदेश दादरा एंड नगर हवेली की राजधानी सिलवासा स्थित कलेक्ट्रेट भवन की याद आ गई। पिछले साल कुछ समय दादरा एंड नगर हवेली की राजधानी सिलवासा में रहा और इस आकर्षक नगर के अधिकांश स्थलों का भ्रमण किया। शहरी क्षेत्र हो या आदि जातीय इलाका या आस-पास के गांव, स्वच्छता आकर्षण गुणवत्ता के बेजोड़ नमूने हैं।

सरहद का साक्षी @कवि:सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’

सबसे अधिक प्रभावित कलेक्टर भवन ने किया। सिंगल स्टोरी यह भवन वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है, जो कि बीते हुए समय की गुणवत्ता का एक उदाहरण है। आज अपने उत्तराखंड में ही अनेकों कंक्रीट के दैत्याकार बहुमंजिला इमारतें बन रही हैं लेकिन आधी शताब्दी पूर्व बनी हुई इमारतों के आगे वह कहीं टिक नहीं सकती हैं।

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पुराने समय के भवन, निर्माण कार्य, हमारे पूर्वजों के महान शोध पर आधारित थे। चाहे गांव के बने हुए मकान हों या शहरों में बनी हुई बिल्डिंग्स, विकास कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए असंख्य निर्माण कार्य,पुराने मठ -मंदिर आज भी हमें पुरातन के नैतिक संस्कारों की याद दिलाते हैं। पहले लोगों के अंदर ईमानदारी थी। उनके अंदर नैतिकता थी। भले ही उस समय भी लोग लाभ लेते थे लेकिन ‘दाल में नमक’ की तरह।

आज कोई भी निर्माण कार्य हो ठेकेदारी की बलि चढ़ गया है। हमारे जनप्रतिनिधि, प्रशासन, इंजीनियर, हमारा समाज खुली आंखों से यह सब देख रहा है लेकिन फिर भी आमूलचूल परिवर्तन की फिलहाल कोई गुंजाइश नहीं है।
गांव और शहरों में असंख्य निर्माण कार्य हो रहे हैं। लाखों- करोड़ों का बजट हर वर्ष लग रहा है लेकिन फिर भी ढाक के तीन पात हैं।

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काश! यदि ऐसे ही भवन और निर्माण कार्य, पुल, सड़कें,नहरें आज भी बनती तो कितना अच्छा होता। पहले ठेकेदार लोग भी नैतिकता में बंधे हुए थे। हमारे टिहरी जनपद के रैका-रमोली के ठेकेदारों द्वारा किए गए कार्य, अंग्रेज के समय के निर्माण कार्य, राजशाही के समय के निर्माण कार्य, आज हमारे लिए केवल दिवास्वप्न बन चुके हैं।  आज के समय बना हुआ कोई भी भवन 50 से 60 वर्ष की आयु पूर्ण  नहीं कर पा रहा है, जबकि पुराने समय के बने हुए भवन और  निर्माण कार्य सैकड़ों वर्षो से स्थिर खड़े हैं।

ऐसी कौन सी विशेषता रही होगी, यह तो हमारे बुद्धिजीवी इंजीनियर्स ही जानते होंगे। हम तो केवल दर्शक हैं और जो जीवन में अनुभव किया है, जो आंखों से देखा है, उसी बात को बयां कर रहे हैं। कार्य छोटे हों या बड़े। किसी भी स्तर पर ही क्यों ना हों, गुणवत्ता, आकर्षण, सुंदरता और वास्तुकला को ध्यान में रखते हुए बनाए जाएं तो प्रगति का एक नया अध्याय अभी भी शुरू हो सकता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक धरोहर के रूप में हम छोड़ सकते हैं।

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(कवि कुटीर)
सुमन कालोनी चंबा, टिहरी गढ़वाल।

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