पाला बदल की राजनीति उत्तराखण्ड में हाबी, कहीं कांग्रेस तो कहीं भाजपा को झटके, नेताओं के सरकने को भी बने आचार संहिता

पाला बदल की राजनीति उत्तराखण्ड में हाबी, कहीं कांग्रेस तो कहीं भाजपा को झटके, नेताओं के सरकने को भी बने आचार संहिता
केदार सिंह चौहान 'प्रवर' संपादक
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नईटिहरी (केदार सिंह चौहान ‘प्रवर’): उत्तराखण्ड सियासी समर के दौरान राजनीतिक दलों के नेताओं का पाला बदल खेल अब लगभग समाप्ति की कगार पर है। टिहरी जिले की अहम टिहरी सीट पर जहां कांग्रेस व भाजपा का पार्टी हाईकमान अभी तक टिकट वितरण को लेकर चुप्पी साधे था, वहीं अब इस चुप्पी के बादल छंटने आरम्भ हो गए हैं। उत्तराखण्ड की राजनीति में तो पिछले कुछ दशकों से दल-बदल की राजनीति काफी हाबी है। राजनेता आये दिन पाला बदल कर अपनी स्वार्थसिद्धि की राजनीति करते आये हैं। कहीं हरक सरक रहे हैं तो कहीं ओमगोपाल।

पिछले कई महीनों से चर्चाओं मे ंचल रहे कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने आज सुबह जैसे ही कांग्रेस का दामन छोड़ भाजपा में शरीक हुए तो दूसरी ओर टिहरी विधान सभा सीट से टिकट की दौड़ में लगे स्थानीय विधायक डॉ0 धनसिंह नेगी ने भी पार्टी से नाराजी व्यक्त करते हुए भाजपा को झटका दे कांग्रेस का हाथ थाम लिया।

यू कहा जाय कि पार्टिया तो संस्कारित होती है, मगर यदि पार्टी का कार्यकर्ता एवं नेता संस्कारित न हो तो सियासी दलों के बीच में जनता ही पिसती है। नेता कभी भी किसी पार्टी का हो सकता है, मगर उनकी स्वेच्छाचारिता का खामियाजा तो आम जनता एवं कार्यकर्ता को भी भुगतना पड़ता है। किसी भी पार्टी का समर्पित कार्यकर्ता जी-जान से आम जनमानस के बीच जाकर गर्मी-सर्दी के थपेड़ों को झेलकर कर अपने नेता के लिए कार्य करता है, लेकिन नेता हैं कि अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए पार्टियों को ही त्याग देते हैं और दूसरी जगह जाकर अपनी राजनीतिक भूख मिटाने का प्रयास करते हैं।

कांग्रेस हो या भाजपा अथवा कोई अन्य राजनीतिक दल। वे भले ही अपने संविधान के तहत कार्य करते हों, लेकिन उनमें निहित परिवार के सदस्य पार्टी के संविधान के तहत पार्टिंयां में नहीं रह पाते, ऐसा क्यों?

चुनाव आयोग एवं राजनीतिक दलों के संविधान रक्षकों को इस विषय पर विचार करने की आवश्यकता है, कि ऐन चुनावों के वक्त नेताओं को दल-बदल की राजनीति पर प्रतिबन्ध लग जाना चाहिए। पार्टी ने निष्कासित कर दिया तो दूसरी पार्टी ज्वाइन कर ली। पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो पार्टी बदल ली। राजनीतिक दलों के लिए भी इस प्रकार की आदर्श आचार संहिता बनाया जाना नितान्त आवश्यक है।