अपनों के जाने का दर्द, असह्य और पीड़ादायक

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    अपनों के जाने का दर्द, असह्य और पीड़ादायक
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    “देहस्मिनं यथा देह कौमार्य यौवनं जरा,
    तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति:।”

    श्रीमद्भागवत गीता के इस श्लोक के द्वारा कुछ शांतुना तो मिलती है लेकिन एक लौकिक प्राणी  होने के नाते अपनों के जाने का दुख लंबे समय तक पीड़ादायक रहता है।
    जिन व्यक्तियों के साथ हमारा संपर्क रहा हो,घुले -मिले रहे हों, मित्र और रिश्तेदार रहे हों, सहपाठी और रोल मॉडल रहे हों, समाज के एक अच्छे इंसान रहे हों, उनके देहावसान पर अनायास ही आंखों से आंसू टपक जाते हैं।
    कल सोशल मीडिया से द्वारा ज्ञात हुआ कि हमारे नाते के जीजा जी परम आदरणीय स्वर्गीय शिव स्वरूप उनियाल जी,ग्राम-बंगोली(मखलोगी)टिहरी गढ़वाल, हाल निवास-देहरादून, के देहावसान हो चुका है। मन में पीड़ा का सागर उमड़ रहा है।
    शास्त्र बहुत पढ़े हैं लेकिन मानवीय कमजोरियों पर काबू पाना भी हंसी खेल नहीं होता। स्वर्गीय श्री शिव स्वरूप उनियाल जी का विवाह संस्कार सन 1974 में मेरे गांव की   बड़ी दीदी (माया) के साथ हुआ था। सन 1974 में जब पुजारगांव स्थिति, हमारे ईष्ट देव सदाशिव जी के मंदिर  का निर्माण हुआ था, तो वह समय स्वर्गीय शिव स्वरूप उनियाल जी दीदी के साथ जात में जंघेश्वर महादेव आए थे।
    मैं उस समय 13 साल का था। कक्षा 8 के पढ़ाई के बाद विद्यालय छोड़ दिया था। इसलिए गांव- समाज में भी एक उपेक्षित बालक था। स्वर्गीय शिव स्वरूप उनियाल जी ग्रेजुएट थे। बहुत ही सुंदर, आकर्षक होने के साथ-साथ एक बुद्धिमान व्यक्ति भी थे।
    दीदी मुझसे बहुत प्यार करती थी। इसलिए उनका स्नेह होना भी स्वाभाविक ही था। चार वर्ष बाद जब मैंने पुन: विद्यालय में प्रवेश लिया और  ग्रेजुएट हो गया तो डीएवी कॉलेज देहरादून में एम.ए. अंग्रेजी के छात्र के रुप में प्रवेश लिया। संजोग की बात है स्वर्गीय शिवस्वरूप उनियाल जी भी उस समय डीएवी कालेज में भूगोल विषय से एम.ए. कर रहे थे क्योंकि भूगोल की परीक्षा विज्ञान के विषयों की तरह व्यक्तिगत परीक्षार्थी के रूप में उत्तीर्ण नहीं की जा सकती है।
    वह देहरादून की लब्ध प्रतिष्ठित संस्थान आईआईपी (इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पेट्रोलियम) में लाइब्रेरियन के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने आगरा और देश के विभिन्न शहरों में, राष्ट्रीय संस्थान में कार्यरत होने के नाते अपनी सेवाएं दी।
    जब मैं परास्नातक कक्षाओं का छात्र था तो उनके घर सैय्यद मोहल्ला में मेरा अक्सर जाना -आना होता था। वह सेवारत थे। अच्छे आर्थिक स्थिति। अच्छी जान पहचान के साथ-साथ अपने नाते रिश्तेदारों के प्रति भी स्नेह रहता था। कुछ समय बाद उनके निजी साले भी उनके साथ उच्च शिक्षा ग्रहण करने हेतु, रहते थे। जो एमकॉम कर रहे थे मेरे छोटे भाई होने के नाते उनसे मिलना भी एक सुखद एहसास था।
    दुर्भाग्य से एक बार जब उनका एक्सीडेंट हुआ और वह मृत्यु के मुंह से बाल -बाल बचे। लंबे इलाज करने के बाद वह शारीरिक रूप से इतने सुदृढ़ नहीं रहे लेकिन मानसिक रूप से काफी समृद्ध थे। स्व. शिव स्वरूप उनियाल जी से सोशल मीडिया के द्वारा संपर्क होता रहता था। जानकारियां हासिल होती थी।मेरी कविताओं से वे काफी प्रभावित रहते थे और उत्साहवर्धन के लिए हमेशा टिप्पणी भी करते थे।
    सेवानिवृत्त होने के बाद अनेकों बार मांगलिक कार्यों, सामाजिक अनुष्ठानों में, गांव में उनसे जब मिलन हुआ तो अत्यंत प्रसन्नता का भाव मन में भर जाता था। हार्दिक खुशी होती थी। एक अपनत्व का भाव पुनर्जीवित हो जाता था।
    यद्यपि मैं उनका निजी साला नहीं था लेकिन वह मुझे अपने निजी साले से भी कम नहीं समझते थे। वही प्यार, वही स्नेह, वही आदर और वही सत्कार, उनके द्वारा समय-समय पर मिलता रहा।
    आज जब उनके असामयिक मृत्यु का समाचार प्राप्त हुआ, तो मन की पीड़ा को काबू मे करते हुए, मैं विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वह उन्हें अपने श्री चरणों में स्थान दे। दुख की इस घड़ी में उनके परिवार को संबल दे, ताकि वह दुख की इस घड़ी से उबर सकें। ओम शांति:।

    [su_highlight background=”#880e09″ color=”#ffffff”]सरहद का साक्षी @कवि सोमवारी लाल सकलानी, निशांत।[/su_highlight]