श्रावण मास देवादिदेव शिवजी को अति प्यारा है, साकार-निराकार रूप में होती है शिव की उपासना
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देवाधिदेव आदिदेव महादेव भगवान भोले शंकर सदाशिव जी और हमारे इईष्ट देवता- कुल देवता- ग्राम देवता को विशेष रूप से सावन के महीने श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है।

सरहद का साक्षी @कवि: सोमवारी लाल सकलानी, निशांत

संपूर्ण विश्व में भगवान शिव को अनेक रूपों में मानव जाति समूह मानते हैं और अपने अपने धर्म और पंथ के अनुसार भगवान शिव की उपासना करते हैं ।

भगवान शिव निराकार हैं, अजर- अमर और अगोचर हैं। मानवीय कल्पनाओं में भगवान शिव को अनेक स्वरूपों में उद्धरित किया गया है। सनातन धर्म में शिव का महत्वपूर्ण स्थान है और त्रिनेत्रधारी शिव -शंकर अकेले महादेव हैं। शिव को साकार-निराकार दोनों रूपों में सृष्टि में पूजा जाता है।

श्रावण मास शिव का मास माना जाता है और करोड़ों की संख्या में शिवोपासक  शिवोपासना करते हैं। करोड़ों की संख्या में कांवड़ मां गंगा के उद्गम स्रोत से पानी लाते हैं, हफ्तों  पैदल यात्रा करके अपने आराध्य देव शिव को अर्पित करते हैं।

देश और विदेश के कोने -कोने में शिव मंदिरों में पूजा अर्चना की जाती है। श्रावण मास में शिव महात्म्य का महत्व है। रुद्राभिषेक और रुद्री पाठ किया जाता है तथा भंडारों का आयोजन किया जाता है।

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सनातन धर्म में उपासना पद्धतियों के अंतर्गत शैव,शाक्त और वैष्णव तीन मुख्य शाखाएं हैं।इसके अलावा अनेक रूपों में (Deities) देवी- देवताओं, कुल देवताओं, ग्राम देवताओं, इईष्ट देवताओं को प्रतीक मानकर भगवान शिव की उपासना की जाती है।

भगवान शंकर को अनेक रूपों में पूजा जाता है। कोई नागराजा के रूप में उपासना करता है तो कोई घंडियाल देवता के रूप में। कोई महासू देवता के रूप में तो कोई वैजनाथ के रूप में। और 12 ज्योतिर्लिंगों का तो भारतीय धर्म और संस्कृति में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। इसके अलावा देश-विदेश के कोने कोने में सावन के महीने में शिवालयों में जलाभिषेक किया जाता है। शिव की पूजा होती है,मन्नत मांगी जाती है। सुख-शांति की कामना की जाती है क्योंकि भोले सबसे सरल और सबसे जल्दी खुश होने वाले देव माने जाते हैं।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम महादेव को अपना आराध्य मानते थे। श्वेतबंध रामेश्वरम् की स्थापना भी भगवान राम ने की थी जो 12 ज्योतिर्लिंगों में एक है तथा भारत के चार धामों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

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यदि हम प्रतीक चिन्हों के रूप में या प्रतीकात्मक माने तो सकल भुवन, प्रकृति और पुरुष पर निर्भर करता है। जहां शिव एक पुरुष है और प्रकृति नारीत्व से सम्मानित है। प्रकृति- पुरुष का यह नाता सृष्टि चक्र को युग -युगांतर से चलाता आ रहा है।  जब तक प्रकृति और पुरुष का अस्तित्व है, तब तक सृष्टि का अस्तित्व है।

सावन माह के पवित्र माह में हम अवश्य भगवान शिव को किसी न किसी रूप में माने, जितना अधिक हो सके शुचिता पूर्वक शिव की उपासना करें। तन.मन और देश के लिए भगवान शिव से मंन्नत मांगे। संपूर्ण हरियाली और खुशहाली के लिए मन्नत मांगे। सुख .शांति और समृद्धि के लिए भगवान शिव से मन्नत मांगे।अवश्य भगवान शिव मनोरथ पूर्ण करने वाले देव हैं।

इसे अनुक्रम में आज श्रावण महीने के प्रथम सोमवार को सपरिवार मृत्युंजय महादेव साबली, टिहरी गढ़वाल में दर्शनार्थ गया। भगवान शिव की उपासना की और शिवलिंग पर जलाभिषेक किया। उसके बाद अपने कर्म क्षेत्र के सर्वोच्च देवता क्षेत्रपाल रथी देवता के मंदिर में मन्नत मांगने गया और सपरिवार वहां भगवान धनसिंह देवता की उपासना की।  मन में अत्यंत प्रसन्नता हुई। सांयकाल व्रत खोलने के बाद भगवान शिव की पूजा अर्चना के साथ प्रसाद ग्रहण करुंगा।

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सनातन संस्कृति को जिंदा रखने के लिए अपनी स्वरचित कविता “जंघेश्वर शिव शंकर प्यारा” और अपने ईष्ट देवता सदा शिव जी के मंदिर (जंघेश्वर महादेव मंदिर )पुजार गांव का चित्र भी शिव भक्तों के लिए अनेक माध्यमों से प्रेषित किया।
ईष्टदेव सदाशिव जी सबका कल्याण करें।

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