गुरु की महिमा असीम, अनंत और सर्वोच्च है, आज भी राष्ट्राध्यक्ष, शासनाध्यक्ष तक गुरु के सम्मुख शीश नवाते हैं!

    गुरु की महिमा असीम, अनंत और सर्वोच्च है, आज भी राष्ट्राध्यक्ष, शासनाध्यक्ष तक गुरु के सम्मुख शीश नवाते हैं!
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    आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को मनाए जाने वाली “गुरु पूर्णिमा” के अवसर पर यथायोग्य सेवा और शुभाशीष। गुरु पूर्णिमा का आदिकाल से विशिष्ट महत्त्व रहा है। भगवान शिव से लेकर महात्मा गौतम बुद्ध, शंकराचार्य से आधुनिक शिक्षक तक अतीत के गौरव को याद दिलाने वाले गुरु हैं।

    सरहद का साक्षी @ कवि : सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’  

    गुरुकुल में पढ़ाने वाले गुरुजनों, ऋषि-मुनियों, ज्ञान बांटने वाले विशेषज्ञों और मनीषियों को इस अवसर पर शत-शत नमन।
    महात्मा कबीर ने कहा था, “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागो पाय/ बलिहारी गुरु आपणे, गोविंद दियो बताए।”

    गुरु की महिमा अनंत होती है। अज्ञानता के अंधकार से बाहर निकालकर जो ज्ञान के आलोक में ले जाता है, वही सद्गुरु है। जो हमें अपने पैरों पर खड़ा होने की शिक्षा देता है, वह सद्गुरु है। जो हमें आदर्शों नैतिकता और हमारे प्राचीन गौरव की याद दिलाता है, वह सद्गुरु है। जो हमें रोजगार के मार्ग बतलाता है, ज्ञान की गहराइयों तक ले जाता है, कर्मों की ओर प्रेरित करता है और नैतिक पतन होने से बचाता है, वह सद्गुरु है।

    भगवान शिव को ज्ञान का देवता भी माना गया है। हमारे धर्म ग्रंथों और पुराणों में  बृहस्पति को देव गुरु माना गया है। महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र तथा असंख्य ऋषि मुनि, गुरुओं की श्रेणी में आते हैं। हिंदू सनातन धर्म और उसकी अन्य धार्मिक शाखाओं- बौद्ध, जैन, सिख, आर्य समाज, ब्रह्म समाज आदि तथा इस्लाम, ईसाई, पारसी धर्मों में  सदियों से  गुरु की महिमा का बखान है।

    ‘बिन गुरु ज्ञान कहां से पाऊं?’ कभी बचपन में पढ़ा था। उम्र के बढ़ने के साथ-साथ इस तथ्य का अनुभव हुआ और इसके महत्व को समझा। लंबे समय तक गुरु धर्म भी निभाया। देश काल परिस्थिति और समय अनुकूल गुरु के द्वारा प्रदान किए गए ज्ञान, विद्या,शिक्षा, मार्गदर्शन का स्वरूप बदलता रहा है लेकिन हमेशा गुरु का पद, हर गुरु के द्वारा दिए गए ज्ञान से सदैव सृष्टि का भला हुआ है।

    प्रकृति हमारी सबसे बड़ी शिक्षिका और गुरु है। माता का स्थान भी सर्वश्रेष्ठ गुरु में से एक है। हमारे घर में दादी- नानी भी हमारी गुरु हैं, भले ही हम उन्हें औपचारिक गुरु का दर्जा ना हो। वक्त के अनुसार हमने विद्यालय की चारदीवारी में शिक्षण देने उन्हें भी गुरु माना है जो कि समसामयिक है।

    अच्छे गुरुओं की कृपा से, पढ़ाई गए छात्र- छात्राएं आज भी शिखर पर हैं और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय क्षितिज में अपने- अपने क्षेत्रों में कीर्तिमान स्थापित किए हुए हैं।

    आज गुरु पूर्णिमा पर्व है, जो कि गुरु की महिमा को याद दिलाता है। गुरुजनों के गौरव और समाज में उनके महत्व को बतलाता है। आज के दिन हम समर्पण भाव से अपने तमाम औपचारिक -अनौपचारिक रूप से मार्गदर्शन करने वाले गुरुओं को नमन करते हैं। उनका सम्मान करते हैं। उनके बताए गए मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं। अपने प्राचीन ऋषि-मुनियों, देव तुल्य गुरुओं और अनेक शाखाओं के महान पुरुषों को भी नमन करते हैं। उनके द्वारा बताए गए मार्ग और शिक्षाओं पर अमल करते हैं।

    वर्तमान समय में जी गुरुओं की वड़ी भूमिका है जो आदिकाल में रही है। शिक्षा प्रदान करने वाले गुरुओं को बिना किसी घमंड और पक्षपात के ज्ञान बांटना चाहिए। धनोपार्जन ध्येय नहीं होना चाहिए। इतिहास में हम पढ़ते हैं कि समय समय पर कपिल,अत्रि, अगस्त्य, याज्ञवल्क्य, पाणिनी, अनेकों धर्माचार्य,आयुर्वेदाचार्य, वैज्ञानिक आविष्कारक और सामाजिक सरोकार रखने वाले मनीषियों का गुरु के रूप में हमें सानिध्य प्राप्त हुआ है। गुरुकुल से लेकर नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालय उसके उदाहरण हैं।

    वर्तमान समय में हमारे देश में ‘नई शिक्षा नीति-2022’ लागू हो गई है जैसा बताया गया है कि शिक्षा समसामयिक होती है केवल मानसिक अठखेलियां खेलने के लिए ज्ञान नहीं होता बल्कि सत, चित और आनंद के साथ- साथ जीविकोपार्जन और उन्नति के मार्ग को प्रशस्त करने वाला ज्ञान समीचीन है।

    मध्य काल में शिक्षा का स्तर गिर चुका था भूख ,गुलामी,अपसंस्कृति आदि के कारण गुरुओं का महत्व घट गया था लेकिन वर्तमान समय में आज भी गुरुओं को वही गौरव हासिल है जो कि आदिकाल में था। जिसका मैं स्वयं  उदाहरण  हूं।

    इसलिए गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर मैं चाहता हूं कि हमारी शिक्षा बालोपयोगी हो, बच्चों के अंतर्मन को छूने वाली हो, उनके अंदर सत्य अहिंसा और प्रेम के भाव को उजागर करने वाली हो, विमर्शस्वरूपिणी विद्या हो, सही और गलत का उन्हें भान कराया जाए, साथ ही प्राचीन इतिहास के ज्ञान और वैज्ञानिक सोच का विकास करना भी गुरु का उद्देश्य होना चाहिए।अपने शिक्षक साथियों से मेरी अपेक्षा है कि वह घंटी के मास्टर ना बनें, बल्कि बच्चों के चौमुंखी विकास, उनके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक ,आध्यात्मिक, भावनात्मक और रचनात्मक विकास के भी साक्षी बनें।

    गुरु का पद सर्वोच्च है। राजा- महाराजा से लेकर वर्तमान समय के राष्ट्राध्यक्ष और शासनाध्यक्ष भी अपने गुरु के सम्मुख शीश नवाते हैं। इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है !

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