श्री गायत्री मंत्र के ‘भूर्भुवः स्वः’ में ब्रह्म उपासना का सार है

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श्री गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुवः स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥

भूर्भुवः सुदरिति वा एतास्तिस्रो व्याहृतयः। तासामु ह स्मैता चतुर्थी माहाचमस्यः प्रवेदयते मह इति । तत् ब्रह्म स आत्मा अङ्गान्यन्या देवताः। भूरिति वा अर्थ लोकः। भुव इत्यन्तरिक्षम सुवरित्यसी लोकः। मह इत्यादित्यः आदित्येन वाद सर्वे लोका महीयन्ते। भूरिति वा अग्निः। भुव इति वायुः। सुवरित्यादित्यः मह इति चन्द्रमाः। चन्द्रमसा वाव सर्वाणि ज्योतीष महीयन्ते। भूरिति या ऋचः भुव इति सामानि । सुवरिति यजूंषि। मह इति ब्रह्म ब्रह्मणा वाद सर्वे वेदा महीयन्ते भूरिति वै प्राणः। भुव इत्यपानः। सुवरिति व्यानः। मह इत्यन्नम् अन्नेन वाद सर्वे प्राणा महीयन्ते। ता वा एताश्चतस्रश्चतुर्धा। चतस्रश्चतस्रो व्याहृतयः। जा यो वेद स वेद ब्रह्म सर्येऽस्मै देवा बलिमावहन्ति।

स्रोत: तैत्तिरीयोपनिषद

संकेत प्रस्तुत मंत्र तैत्तिरीयोपनिषद की प्रथम वल्ली के पंचम अनुवाक से लिया गया है, जिसमें ब्रह्म की उपासना के विषय में बताया गया है। मंत्र के द्वारा ‘भूर्भुवः स्वः’ का व्याहृति रूप से विषद वर्णन किया गया है। मंत्रार्थ भूः भुवः और स्वः, ये तीन व्याहृतियां हैं। उनमें से ‘महः’ इस चौथी व्याहृति को महाचमस्य (ऋषि महाचमस का पुत्र) जानता है। वह ‘महः’ ही ब्रह्म है, वही ‘आत्मा’ है। अन्य देवता उसके अंग हैं। ‘भूः’ अर्थात यह व्याहृति पृथ्वीलोक है। ‘भुवः’ अंतरिक्ष लोक है, ‘सुवः’ स्वर्ग लोक है और ‘महः’ आदित्य है। आदित्य से ही समस्त लोक वृद्धि को प्राप्त होते हैं। ‘भूः’ अग्नि है, ‘भुवः’ वायु है, ‘सुवः’ आदित्य है और ‘महः’ चंद्रमा है चंद्रमा से ही संपूर्ण ज्योतियां वृद्धि को प्राप्त होती हैं। ‘भू’ ऋक है, ब्रह्म से ही समस्त वेद वृद्धि को प्राप्त होते हैं। ‘भूः’ प्राण है, ‘भुवः’ अपान है, ‘सुवः’ व्यान है और ‘महः’ अन्न है। अन्न से ही समस्त प्राण वृद्धि को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार ये चार व्याहृतियां हैं और इनमें से प्रत्येक चार-चार प्रकार की हैं। इन्हें जानने वाला ब्रहम को जनता है। संपूर्ण देवगण उसे उपहार समर्पण करते हैं।

मंत्र:- ‘भुवः’ साम है, ‘सुवः’ यजु है और ‘मह’ ब्रह्म है।

तात्पर्य: ‘भूः’, ‘भुवः’, ‘स्वः’ और महः’, ये व्याहृतियां सभी मंत्रों की आदि हैं। इनमें “महः ब्रह्म है, जिस किसी भी मंत्र जाप पाठ से पहले इन व्याहृतियों का उद्गान होता है, वह संपूर्ण शक्तियुक्त और शीघ्र फलदायी होती हैं। देव और पृथ्वी लोक आदि सभी ‘महः’ के अवयव स्वरूप हैं, इसलिए कहा गया है कि आदित्यादि के योग से ही लोकादि महत्ता को प्राप्त होते हैं। पृथ्वी लोक, अग्नि, ऋग्वेद और प्राण, यह पहली व्याहृति ‘भूः’ है। इसी प्रकार अंतरिक्ष लोक, वायु, सामवेद और अपान, यह दूसरी व्याहृति ‘भुवः’ है। द्युलोक, आदित्य, यजुर्वेद और व्यान, यह तीसरी व्याहृति ‘सुवः’ है। आदित्य, चंद्रमा, ब्रहम और अन्न, यह चौथी व्याहृति ‘महः है।

*पं. जयगोविंद शास्त्री

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