महंगाई पर कविता: लंका जैसी हालत है!
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कहानी: शराबी का ठप्पा…!

साथियों की तसल्ली तब होती थी, जब मैं शराब पी लेता था। इसके लिए चाहे उन्हे कितना भी धन खर्च क्यों न करना पड़े ! शुरुआत में वह इसे ‘टीका लगाना’ कहते थे, बाद में सुकून और फिर सामाजिकता का नाम देने लगे थे।

संपूर्ण जीवन काल में तथा प्रौढ़ावस्था तक केवल एक ही व्यक्ति ऐसे थे जो शराब न पीने का सुझाव देते थे। ऐसे भी लोग थे जिन्होंने कभी शराब छुई तक नहीं लेकिन शराब पिलाने के लिए एड़ी- चोंटी का जोर लगा देते थे। वे भले ही कभी ₹5 की चाय न पिला सके लेकिन ₹100 की शराब पिलाने के लिए बहुत उत्सुक रहते थे।

सैजपाल गरीब घर में पैदा हुआ था। घर में खाने के लाले पड़े रहते थे। खाने के लिए परिवार जनों के बीच होड़ मची रहती थी। पेट भर जाने पर भी नियत नहीं भरती थी। स्वान प्रवृत्ति सबके मन में भर चुकी थी। इसलिए बच्चों को भी संस्कारवान शिक्षा सुलभ नहीं थी।

सैजपाल के पिताजी भी घुट्टी लगाने के शौकीन थे। भले ही कोई आर्थिक मदद न करें लेकिन शादी-ब्याह, तीज- त्यौहार में उन्हें भी शराब पिलाकर बहुत बड़ा उपकार समझते थे। सैजपाल और उसके भाई पिता की भाव भंगिमा, नाटकीय अंदाज देखकर बहुत खुश हो जाते थे। वीरू बड़े लोगों द्वारा दिया गया, इसे सम्मान मानता था और दो घूंट दारू के लिए अपने को आजीवन के लिए गिरवी रख देता था। इसका कुछ असर उम्र के साथ-साथ सैजपाल पर भी आने लगा। ‘मां पर पूत पिता का घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़ा-थोड़ा’ वाली कहावत चरितार्थ होने लगी थी। वीरु को तो लोग स्वार्थ बस शराब पिलाते थे लेकिन सैजपाल को उसका नैतिक पतन करने के लिए शराब पिलाने लगे।

सैजपाल की मां बहुत धार्मिक महिला थी। अनपढ़ अवश्य थी लेकिन बेटे के प्रति सजग रहती थी। आखिर उसका बेटा था वह। पैदा किया था उसने। पाला-पोशा था। सैजपाल उसकी बुढ़ापे की औलाद थी। वह चाहती थी कि सैजपाल पढ़-लिख कर नेक इंसान बने। शराब, नशा, धूम्रपान, मांस भक्षण से वह सदैव दूर रहे। यद्दपि गरीबी, भूख,परेशानी, सामाजिक और पारिवारिक प्रताड़ना से वह कुछ कुपित रहती थी और छोटी-छोटी बातों के लिए झगड़ा भी कर देती थी इसके बावजूद भी गांव के लोग उसे अच्छा मानते थे। अच्छा व्यवहार करते थे।

“सैजपाल! बेटा, तू कभी दारू मत पीना! दारु पीने वाले को लोग नफरत करते हैं और बीमारी लग जाती है। पतन हो जाता है। जुआ और शराब से पाप लगता है” सैज को मां ने समझाते हुए कहा।

“हां मां ! तुम ठीक कहती हो। मैंने भी सुना है। गुरु जी ने भी एक बार हमें समझाते हुए ऐसा कहा था। किंतु मां गुरुजी भी तो दिवाली में दारू पीते हैं”, सरल अंदाज में सैजपाल ने मां से कहा।

“बेटा, गुरुजी और मां-बाप की निंदा नहीं करते। वह गलती कर सकते हैं पर बड़े होने के कारण समझदार भी होते हैं। भूल हो गई होगी और तू कभी ऐसी भूल ना करना” सुकमा ने समझाते हुए बेटे से कहा।

मंगसीर के महीने गांव गुलजार हो जाते थे। लोग छांनियों से अपने मवेशियों के साथ गांव उतर आते थे। चार माह के लिए अन्न, सूखी सब्जियां, बर्फ के समय के लिए लकड़ियां, पशुओं के लिए सूखी घास, इकट्ठे करके रखते थे। दिवाली के ठीक एक माह बाद उसी तिथि को रिक्ख बग्वाल भी धूमधाम से इलाके में मनाई जाती थी। कहते हैं कि जामवंत जी भगवान राम से एक माह बाद लंका से वापस लौटे थे। उनके आगमन पर भी धूमधाम से दीपावली मनाई गई क्योंकि वह रीछ थे, इसलिए इस दीपावली का नाम ‘रिक्ख बग्वाल’ पड़ा, ऐसी किवदंती है। गांव के नौकरी -पेशे वाले लोग भी बग्वाल के समय अवश्य घर आते थे।

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एक बार बग्वाल के मौके पर सैजपाल के एक परिजन ने शराब पीनी शुरू की। मां ने पूछा कि वह क्या पी रहा था? बताया कि पकड़ों को पचाने की दवा है। सैजपाल बारह वर्ष का था। उत्सुकतावश परिजन ने उसे भी थोड़ा सी शराब पिलाकर दी। कुछ देर बाद उसे अजीब महसूस होने लगा। फिर वह साथियों के साथ मंडाण देखने चला गया। मंडाण में कई लोगों पर देवता नाचने लगे। सैजपाल भी दारू के नशे में मंडाण नाचने लगा। उसने ढोल को पकड़ लिया। लोगों ने समझा कि उस पर देवता आ गया है। धुपांणा दिया गया। सैजपाल को पूछा तो नशे में कहा, “बटुकनाथ भैरव”। फिर क्या था जागर लगने लगे। सैजपाल खूब नाचा। गांव वालों ने समझा कि अवश्य उस पर भैरव आया होगा क्योंकि वह छोटा बालक था और इस उम्र में कोई उसके शराब पीने की कल्पना भी नहीं कर सकता था। सुकमा और वीरु बहुत खुश थे कि अब उनके घर भैरवनाथ के डर से भूत- प्रेत नहीं आएगें।

रात को 3:00 बजे मंडाण बंद हो गया। सब लोग अपने घरों को चले गये।सैजपाल भी घर आकर सो गया। सुबह उठा तो जी मिचल रहा था। उल्टी आ रही थी। सिर- दर्द से सर फटा जा रहा था। रोज की तरह वह पानी लाने के लिए धारे पर चला गया। रास्ते में उल्टियां करता रहा। जल- स्रोत (धारा) पर पहुंचकर बंटा(गागर) स्रोत के नीचे लगाया। हाथों में असहनीय दर्द हो रहा था। रात को जब उसने दारू देवता के बस में ढोल पकड़ा तो बाजगी ने ढोल पीटने की छड़ी से उसके हाथों पर खूब मारा था। कई दिन तक हाथ दुखते रहे। सैजपाल का यह दु:खद अनुभव था।उसके बाद उसने उम्र दराज होने तक कभी शराब नहीं पी।

सैजपाल स्कूली शिक्षा के बाद उच्च शिक्षा हेतु शहर में पढ़ने गया। एक नई दुनिया थी। घोर किशोरावस्था थी। कई ऐसे साथी मिल गये जो बीड़ी- सिगरेट,भांग,शराब का नशा करते थे। सैजपाल मां की बात और गरीबी के कारण बहुत सतर्क रहता था। बुराइयों से बचने का प्रयास किया। फिर भी शैतान ने पीछा नहीं छोड़ा।

गांव के एक पुराने साथी के विवाह की पैदल बरात थी। चौदह मील पैदल एक तरफ। सुबह से मूसलाधार बारिश लगी थी। बिरादरी की बात थी, इसलिए बरात में जाना जरूरी था। चार मील पैदल चलने के बाद कच्ची शराब के भट्टियां मिलने लगी। अधिकांश बाराती शराब पीकर चल रहे थे। सैजपाल एक फौजी के साथ बातें करता पीछे-पीछे चल रहा था। अचानक फौजी एक झोपड़ी में गया और एक लोटा कच्ची शराब गटक गया। एक ढाबे जैसी दुकान मिली। वहां भी शराब का दौर चल रहा था। फौजी वहां भी एक लोटा पी गया। बस ! फिर क्या था, वह लड़खड़ाने लगा। छुट्टी में घर आया था। उसकी शादी के समय का एक अच्छा सूट था। थ्री पीस सूट। उसे पहना था। सुंदर डील- डॉल वाले शरीर का यह जवान सबसे आकर्षक लग रहा था। पूरी बारात की शोभा था। छ फुट लंबा- चौड़ा, जवान सुंदर नाक-नक्श, शरीर पर रेमंड का सूट, हीरो लग रहा था। लड़खड़ाते हुए अचानक पैर फिसला और रोपाई के लिए तैयार धान की क्यारी में जा गिरा। कीचड़ में डूब गया। शरीर तो शराब से लड़खड़ाया था। उठ न सका।

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“सैजपाल बेटा ! मुझे बाहर निकाल। मुझे मत छोड़ना। बाघ खा जाएगा,” उसने कातर स्वर में कहा। सैजपाल कीचड़ युक्त खेत में गया और लड़खड़ाते हुए फौजी को थामने लगा। उसने सैजपाल को जकड़ कर पकड़ लिया। सैजपाल के वस्त्र कीचड़ से भर गये। फौजी तो कीचड़ से सना हुआ सियार जैसा लग रहा था। बमुश्किल सैजपाल उसे रास्ते पर लाया। फिर उसे थाम कर धीरे धीरे आगे बढ़ने लगा।

बरात गांव के निकट पहुंच गई थी। ढोल- दमोह तक नहीं सुनाई दे रहे थे। कुछ दूर चलकर फौजी नीचे गिर गया। एक दूसरे गांव के लोग भी उसी गांव में कन्या पक्ष की तरफ से समारोह में जा रहे थे। “अरे! यह तो बरात के मेहमान हैं ! कैसे छूट गए?” एक ने कहा।

“शराबी के बच्चे हैं, साले! बहुत पी रखे होंगे। चलो, छोड़ो इन सालों को “, दूसरे ने धीरे से कहा।
“अरे भाई ! चाहे कुछ भी हो लेकिन आज तो यह मेहमान हैं। इन्हे ले चलो। नीचे किसी गांव में टिका देंगे। यहां तो इन्हें बाघ खा जाएगा”, तीसरे व्यक्ति ने कहा। किसी तरह फौजी को तो आदमी ने पकड़ कर एक गांव में पहुंचाया और टिकाया। सैजपाल चुपचाप उन्हीं के साथ चलने लगा। कन्या पक्ष वाले गांव में चिंता बढ़ गई। “कुछ बराती शराब पीकर रास्ते में छूट गए”, उन्होंने सुना। दो- तीन लड़के पेट्रोमैक्स के साथ ढूंढने आ रहे थे। तब पता चला कि शराबी फौजी को संयाणा के घर पर टिका दिया गया है।उसकी हालत ज्यादा खराब थी। वे वापिस हो गए।

रात का अंधकार था। पेट्रोमैक्स की रोशनी में जब गांव वालों ने सैजपाल को देखा तो ठहाके लगने लगे। कीचड़ से सना हुआ, कपड़े भी चूं रहे थे। गालों पर भी कीचड़! बरात गांव में काफी समय पहले पहुंच चुकी थी। गांव के लोग शराबियों को देखने के लिए उत्सुक थे। बेचारा सैजपाल बिना शराब पिए भी आज रजिस्टर्ड शराबी के रूप में चर्चित हो गया। गांव के अधिकांश लोग सैजपाल के रिश्तेदार थे। इस रंगुवा साईं मेहमान को देखने के लिए लोग घरों के ऊपर खड़े हो गए। देखकर खूब ठहाके मारने लगे। सैजपाल, बरात का मेहमान।आज अपनी वेशभूषा पर आत्मग्लानि से भर गया। उसका पक्ष सुनने वाला कोई नहीं था। वह आज निर्लज्ज शराबी के रूप में जाना गया। गांव की लड़कियां देखकर बात कर रही थी और मजे ले रही थी। सैजपाल अकारण की आत्म ग्लानि से चुपचाप आगे बढ रहा था। बिना शराब पिए भी वह शराबी घोषित हो गया। “नेकी का बदला बदी से” शराबी के चक्कर में वह भी बदनाम हो गया।

चुपचाप सोने चला गया। बारिश थम गई थी। सब लोग विवाहोत्सव में लीन थे। सैजपाल को उजाले के समीप जाने में डर लग रहा था। रात भर कमरे से बाहर नहीं आया। शराबी का ताम्रपत्र मिल चुका था। कोई समीप नहीं आया। बुजुर्ग महिलाएं घूर- घूर कर देख रही थी। लड़कियां उपहास कर रही थी। लड़के खिल्ली उड़ा रहे थे। वह भूखा- प्यासा कमरे में पड़ा रहा।
सुबह जब रात खुली तो उठा।अपनी दशा देखकर दंग रह गया। कमीज के कालर कीचड़ से सने थे। जूतों के अंदर तक कीचड़ भरा था। बालों से सूखा कीचड़ झड रहा था। सोचा, “क्या नेक कार्य करने का यही दंड है”। फिर धारे में गया। जहां तक हो सके सफाई की लेकिन मिट्टी के दाग और चमकने लगे। वह रंगवा सियार जैसा लगने लगा।

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अचानक उसे एक अधेड़ महिला का शोर सुनाई दिया, “लड़की का गला कट गया। शराबी का मत्थे मार दी। इससे अच्छा तो लड़की कुंवारी रह जाती तो ठीक था। किस आवारागर्द को पकड़ा दी।” महिला सैजपाल की पत्नि की मौसी थी। “देखो !क्या प्रेत लग रहा है। हमने तो सुना था कि बीड़ी- सिगरेट तक नहीं पीता है। यदि यह जानते तो चाहे लड़की अविवाहित ही रहती पर शराबी को कभी न देते। कैसा गला कटा लड़की का,” महिला ने गुस्से में आकर अपनी सहेली से कहा। वह सैजपाल को घूर कर क्रूर नजर से देख रही थी। सैजपाल गूंगे की तरह चुपचाप सुनता गया। सफाई भी क्या दे सकता था।
तभी उसकी साथी महिला ने कहा,” दीदी तुम यह क्या बोल रही हो? अगर यह लड़का उस शराबी के साथ में न होता,जिसे बरातियों ने रास्ते में छोड़ दिया था तो उसे बाघ मार जाता। यह बेचारा न तो शराबी है,न खराबी। अपने फौजी साथी को बड़ी मुश्किल से धान के कीचड़ युक्त खेत से निकाल कर रास्ते पर लाया। शराबी को संयाणा जी के यहां टिकाया। वहां से यह तो हमारे साथ आए थे। हम भी दावत खाकर अपने घर वापस आ गए थे लेकिन इस बेचारे को तो शराबी समझकर किसी ने पूछा तक नहीं। यह आदमी नहीं बल्कि इंसान है। इंसानियत का फर्ज निभाया। बरात में पौंणें (मेहमान) इसलिए होते हैं कि जाने-अनजाने कोई घटना घट जाए तो उसका सहयोग करें। इसी के लिए तो बराती साथ में ले जाते हैं।यह नहीं कि कि खाएं- पिएं और खिसक जाएं। वैसे भी इनके बारे में कौन नहीं जानता है। बचपन से ही अच्छा लडका है। मेरा मायका भी इनके नजदीक है, उस अधेड़ महिला ने कहा।

“भुली! क्या तू सच बोल रही है? तेरे मुंह में घी- शक्कर। तूने मेरी चिंता मिटा दी। नहीं तो मैं पागल हो जाती। हो सकता था रिश्ता भी टूट जाता और उसका पाप मेरे सिर चढ़ता”, महिला ने शालीनता से कहा। लेकिन इलाके में सैजपाल पर ‘शराबी का ठप्पा’ लग चुका था जो कि वर्षों बाद भी नहीं मिटा।

कहानीकार: सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’

(कवि कुटीर)
सुमन कॉलोनी चंबा, टिहरी गढवाल।

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