श्रीरुद्राष्टकम्: नमामीशमीशान निर्वाणरूपं …!


 

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श्रीरुद्राष्टकम्: नमामीशमीशान निर्वाणरूपं …!

श्रीरुद्राष्टकम्: नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेहं

हे ईशान! मैं मुक्तिस्वरूप, समर्थ, सर्वव्यापक, ब्रह्म, वेदस्वरुप, निजस्व रूप में स्थित, निर्गुण, निर्विकल्प, निरीह, अनन्त ज्ञानमय और आकाश के समान प्रभु को प्रणाम करता हूँ।

*निराकारमोङ्करमूलं तुरीयं*
*गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशं*
*करालं महाकाल कालं कृपालं*
*गुणागार संसारपारं नतोहं*

जिनका कोई आकार नहीं हेै जो निराकार है,ॐकाररुप आदिकारण है, तुरीय हैं, वाणी, बुद्धि और इन्द्रियों के पथ से परे हैं कैलासनाथ हैं, पापियों के लिये कराल और भक्तों के लिये दयालु हैं जो महाकाल के भी काल हैं, गुणों के आगार और संसार से तारने वाले हैं, मैं उन भगवान को नमस्कार करता हूँ।

*तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं*
*मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं*
*स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गङ्गा*
*लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुज़ंगा*

जो हिमालय के समान श्वेतवर्ण, गम्भीर और करोड़ों कामदेव के समान कान्तिवान शरीर वाले हैं, जिनके मस्तक पर मनोहर श्रीगंगा जी लहरा रही हैं,भालदेश में बाल चन्द्रमा सुशोभित होते हैं और गले में सर्पों की माला शोभा देती हैं।

*चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं*
*प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालं*
*मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं*
*प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि*

जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं जिनकी नेत्र एवं भृकुटी सुन्दर एवं विशाल हैं जिनका मुख प्रसन्न और कण्ठ नील है, जो बड़े ही दयालु हैं, जो बाघ की खाल का वस्त्र और मुड़ों की माला पहनते हैं ऐसे प्रिय शंकर जो पुरे संसार के नाथ हैं मैं उनका भजन करता हूँ।

*प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं*
*अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं*
*त्रयःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं*
*भजेहं भवानीपतिं भावगम्यं*

जो प्रचण्ड, सर्वश्रेष्ठ, प्रगल्भ, परमेश्वर, पूर्ण, अजन्मा, कोटि सूर्य के समान प्रकाशमान, त्रिभुवन के शूलनाशक और हाथ में त्रिशुल धारण करने वाले हैं,उन भावगम्य भवानी पति का मैं भजन करता हूँ।

*कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी*
*सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी*
*चिदानन्द संदोह मोहापहारी*
*प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी*

हे प्रभो! आप कला रहित, कल्याणकारी ओंर कल्प का अन्त करने वाले हैं। आप सर्वदा सत्पुरुषों को आनन्द देते हैं, आपने त्रिपुरासुर का नाश किया था आप मोहनाशक और आप ही ज्ञानानन्दघन परमेश्वर भी हैं,आप कामदेव के शत्रु हैं, आप मुझ फ्ऱ प्रसन्न हों प्रसन्न हों।

*न यावद् उमानाथ पादारविन्दं*
*भजन्तीह लोके परे वा नराणां*
*न तावत्सुखं शान्ति* *सन्तापनाशं*
*प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं*

मनुष्य जब तक उमाकान्त महादेव जी के चरणार विन्दों का भजन नहीं करते, उन्हें इह लोक या परलोक में कभी सुख और शान्ति की प्राप्ति नही होती और न उनका सन्ताप ही दूर होता है।
हे समस्त भूतों के निवास स्थान भगवान शिव आप मुझ पर प्रसन्न हों।

*न जानामि योगं जपं नैव पूजां*
*नतोहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यं*।
*जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं*
*प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो*

हे प्रभो! हे शम्भो! हे ईश! मैं योग, जप और पूजा कुछ भी नहीं जानता, हे शम्भो! मैं सदा-सर्वदा आपको नमस्कार करता हूँ। जरा, जन्म और दु:ख समूह से सन्तप्त होते हुये मुझ दु:खी की भी समस्त दु:खों से आप रक्षा कीजिये।

देवाधिदेव महादेव आप तथा आपके परिवार को सदा सुखी, स्वस्थ, समृद्ध एवं निरोगी रक्खें तथा आपकी समस्त मनोकामनाए भी शीघ्र पूर्ण कर आपका मंगल करें, श्रीचरणों से नित्य प्रति यही कामना व प्रार्थना करते हैं।

सरहद का साक्षी @ई०/पं०सुन्दर लाल उनियाल

*नैतिक शिक्षा एवं आध्यात्मिक प्रेरक, 
दिल्ली/इन्दिरापुरम,गा०बाद/देहरादून।