विचारों, आदर्शों और किये गए महान कार्यो के लिए हमेशा जनमानस के हृदय में रहेंगे हिम पुत्र हेमवती नन्दन बहुगुणा

    राजनीतिज्ञ के साथ-साथ सोशल इंजीनियरिंग के विशेषज्ञ भी थे हिमालय पुत्र हेमवती नंदन बहुगुणा
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    हिमालय के वरद पुत्र स्वर्गीय श्री हेमवती नन्दन बहुगुणा जी की जयंती पर शत-शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि। वे अपने विचारों, आदर्शों और किये गए महान कार्यो के लिए हमेशा जनमानस के हृदय में रहेंगे एवं उनके विचार हम सभी को आगे बढ़ने की प्रेरणा देते रहेंगे। आज उनकी जयंती पर उनके जीवन के कुछ रोचक तथ्य साझा करने का प्रयास कर रहा हूँ l

    एक संक्षिप्त परिचय

    श्री हेमवती नंदन बहुगुणा जी का जन्म 25 अप्रैल, 1919 को ग्राम बुघाणी, पौड़ी गढ़वाल में हुआ था l इनके पिता का नाम श्री रेवती नंदन बहुगुणा एवं माता का नाम श्रीमती दीपा देवी था l इनके दो पुत्र व एक पुत्री हैं l ज्येष्ठ पुत्र श्री विजय बहुगुणा जो कि पूर्व मुख्यमंत्री उत्तराखंड रह चुके हैं व शेखर बहुगुणा वर्तमान में विधायक हैं एवं पुत्री श्रीमती रीता बहुगुणा जोशी वर्तमान में महिला कल्याण, परिवार कल्याण, मातृत्व और बाल कल्याण और पर्यटन मंत्री, उत्तर प्रदेश हैं एवं उन्हें संयुक्त राष्ट्र की ओर से दक्षिण एशिया की सर्वाधिक प्रतिष्ठित महिलाओं में भी शुमार किया जा चुका है l

    राजनीति में अनेक प्रकार की उठा पटक होती रहती हैं।
    “हेमवती नंदन बहुगुणा जी की प्रारम्भिक शिक्षा गढ़वाल में हुई, आगे की शिक्षा डी.ए.वी. कॉलेज देहरादून और राजकीय विद्यालय इलाहाबाद में सम्पन्न हुई।उन्होंने इलाहाबाद वि.वि. से 1946 में बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।”

    बहुगुणा जी का राजनीतिक जीवन 1942 से प्रारम्भ होता है, जब वे अध्ययन के दौरान जेल गए। इस बीच इन्होंने ‘विद्यार्थी आन्दोलन’ में खुलकर भाग लिया। बहुगुणा जी इलाहाबाद वि.वि. में ‘स्टूडेण्ट’ यूनियन वर्किंग कमेटी’ के सदस्य और फेडरेशन के सेक्रेट्री रहे। कई ट्रेड यूनियनें गठित कीं। इण्डियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस के सेकेट्री और आल इण्डिया डिफेन्स वर्कर्स फेडरेशन के प्रेसीडेण्ट (1953-57) रहे l

    वर्ष 1952 में सर्वप्रथम विधान सभा सदस्य निर्वाचित। पुनः वर्ष 1957 से लगातार 1969 तक और 1974 से 1977 तक उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य रहे l वर्ष 1952 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस समिति तथा वर्ष 1957 से अखिल भारतीय कांग्रेस समिति सदस्य व अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव रहे l

    वर्ष 1957 में डां० संम्पूर्णा नन्द जी के मंत्रिमण्डल में सभासचिव तथा डां० संम्पूर्णानन्द मंत्रिमण्डल में श्रम तथा समाज कल्याण विभाग के पार्लियामेन्टरी सेक्रेटरी के पद पर रहे l वर्ष 1958 में उद्योग विभाग के उपमंत्री, वर्ष 1962 में श्रम विभाग के उपमंत्री,वर्ष 1967 में वित्त तथा परिवहन मंत्री रहे। वर्ष 1971,1977 में लोक सभा सदस्य निर्वाचित हुए तथा दिनांक 2 मई,1971 को केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में संचार राज्य मंत्री के पद पर रहे l
    पहली बार 8 नवम्बर, 1973 से 4 मार्च, 1974 तथा दूसरी बार 5 मार्च, 1974 से 29 नवम्बर, 1975 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे।
    वर्ष 1977 में केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में पेट्रोलियम,रसायन तथा उर्वरक मंत्री व वर्ष 1979 में केन्द्रीय वित्त मंत्री रहे l 1980 में लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुये।
    उनकी मृत्यु 17 मार्च 1989, क्लीवलैंड, ओहियो, संयुक्त राज्य अमेरिका में हुई।
    कहते हैं, ‘उस दौर में उन्हें पूरे उत्तर प्रदेश के लोगों के बारे में इतनी जानकारी थी कि वो हर पंचायत से लेकर ब्लॉक और राज्य तक वो हर नेता को न सिर्फ़ नाम से बल्कि शक्ल से भी जानते थे l वे अपनी पार्टी के नेताओं को ही नहीं, बल्कि विपक्षी पार्टियों के नेताओं को भी ना सिर्फ़ जानते थे, बल्कि हर एक से से अच्छे सम्बन्ध भी रखते थे l

    राजकुमारी अमृत के चुनाव से बहुगुणा जी ने खींची सबकी नज़र

    यद्यपि बहुगुणा जी की राजनीति की शुरुआत इलाहाबाद से हुई थी, जहाँ वो पहले छात्र नेता और फिर मज़दूर नेता हुआ करते थे l लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान तब बनी जब जवाहरलाल नेहरू ने अपने मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री रही राज कुमारी अमृत कौर का चुनाव लड़वाने मंडी भेजा l

    बीएन उनियाल बताते हैं, कि- ‘1952 में पहले संसदीय चुनाव में राज कुमारी अमृत कौर को हिमाचल प्रदेश के मंडी संसदीय सीट से टिकट दिया गया था l वो कभी पहाड़ों पर गई नहीं थी l कुछ दिनों में वो तंग आ गईं और नेहरू को फ़ोन कर उन्होंने कहा, कहाँ भेज दिया तुमने मुझे जवाहर लाल? मेरे लिए बड़ा मुश्किल हो रहा है l किसी को मेरी मदद के लिए यहाँ भेजो तुरंत l पंडितजी ने इलाहाबाद में कभी आनंद भवन में बहुगुणाजी को देखा होगा l

    उन्होंने शास्त्रीजी से कहा, वो इलाहाबाद में जो पहाड़ी लड़का था न! बहुगुणा? वो कहाँ है आज कल? शास्त्रीजी ने कहा, वहीं होगा इलाहाबाद में l नेहरू ने कहा, उसे तुरंत मंडी भेजो, अमृत के चुनाव में काम करने के लिए l कहते हैं, ‘बहुगुणा जी ने इससे पहले कभी मंडी का नाम भी नहीं सुना था’ l लेकिन जवाहरलाल समझते थे कि चाहे यूपी का पहाड़ी हो या हिमाचल का, सब एक जैसे हैं l बहरहाल बहुगुणा वहाँ पहुंचे और उन्होंने दो महीने राज कुमारी अमृत कौर के चुनाव के लिए जम कर काम किया l चुनाव जीतने के बाद दिल्ली लौट कर अमृत कौर ने नेहरू से बहुगुणा की जम कर तारीफ़ की l वहाँ से वो जवाहरलाल की नज़र में आ गए l उसके बाद स्थानीय कांग्रेस में भी उनका क़द बढ़ गया l

    जब बहुगुणा जी ने नेहरू की मीटिंग की बत्ती गुल कराई :-
    मशहूर पत्रकार जनार्दन ठाकुर ने अपनी किताब ‘ऑल द जनता मेन’ में बहुगुणा से जुड़ा एक बहुत मज़ेदार किस्सा लिखा है, ‘1951 में जब जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष बने तो वो इलाहाबाद आए। लाल बहादुर शास्त्री ने बहुगुणा को बुला कर कहा कि वो नेहरू के स्वागत के लिए एक बहुत बड़ी रैली कराएं l

    कहते हैं, ‘बहुगुणा जी ने पुरुषोत्तम लाल टंडन पार्क में लोगों की भीड़ जमा करने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया l जब रैली हुई तो टंडन पार्क लोगों से खचाखच भरा हुआ था l लेकिन बहुगुणा जी को मंच पर नहीं जाने दिया गया l वो भीड़ के पीछे चले गए और चाट खाने लगे l अचानक चारों तरफ़ अंधेरा छा गया l बत्ती चली गई और सब कुछ सुनाई देना बंद हो गया l लोग बेचैन हो उठे और भीड़ के बीच बहुगुणा, बहुगुणा की आवाज़े उठने लगीं l बहुगुणा जी भागते हुए मंच पर पहुंचे l जैसे ही उनके कदम मंच पर पड़े, बत्ती वापस आ गई l लोगों ने नेहरू की उपस्थिति में ही नारा लगाया, ‘बहुगुणा ज़िदाबाद’!’ बहुगुणा जी के आलोचक कहते हैं कि ये सब बहुगुणा जी ने खुद करवाया था l

    आप एक बहुत ही स्वावलंबी राजनेता थे l 1971 में इलाहाबाद से लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद इंदिरा गाँधी ने उन्हें पहले अपने मंत्रिमंडल में संचार राज्यमंत्री बनाया और फिर 1974 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना कर उन्हें लखनऊ भेजा l लेकिन कुछ दिनों के भीतर ही उनके और इंदिरा गाँधी के बीच मतभेद शुरू हो गए l

    ख़ुद बहुगुणा जी ने एक बार बीबीसी से बात करते हुए कहा था, कि ‘मेरे मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही मेरे और इंदिरा गाँधी के बीच एक बुनियादी बात पर झगड़ा हो गया l उनका ख़्याल था कि मैं हर काम उनसे पूछ कर करूंगा l मेरा कहना था कि ‘बैक सीट ड्राइविंग’ संभव नहीं है l’ इतने बड़े प्रदेश को चलाने वाले मुख्यमंत्री को अपना फ़ैसला ख़ुद लेना होगा l मैंने उनसे साफ़ कहा कि मेरे कंधे पर आपका सिर नहीं हो सकता l वह चाहती थीं कि मैं उनके लड़के को लेकर उत्तर प्रदेश में घूमूं, जैसे कि राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के मुख्यमंत्री कर रहे थे l मैंने इंकार कर दिया. मैंने कहा उन्हें अपने पैरों पर चलना होगा l वो काम करें, आगे बढ़ें, लेकिन मेरे कंधों पर ये नहीं हो सकता l

    बहुगुणा शायद उन ऊँचाइयों को नहीं छू पाए जिसकी उनके प्रशंसक या वह ख़ुद उम्मीद करते थे l लेकिन एक बात तय थी कि वो आम राजनेताओं से हट कर एक दूरदर्शी और स्वावलंबी राजनेता थे l आज भी बहुगुणा जी के अनेकों शिष्य उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड की राजनीति में उनकी राजनीतिक सोच व विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं l ऐसे महापुरुष को कोटि-कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि सादर समर्पित।