चंबा प्रखंड के ग्वाड गांव में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ संपन्न

चंबा प्रखंड के ग्वाड गांव में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ संपन्न
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चंबा प्रखंड के ग्वाड गांव में सात दिवसीय श्रीमद् भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ आज विधि विधान के साथ संपन्न हो गया। 01 मार्च से 07 मार्च तक गतिमान इस ज्ञान यज्ञ का आयोजन श्रीमती विमला देवी धर्मपत्नी स्वर्गीय रमेश दत्त उनियाल और उनके परिवार जनों के द्वारा आयोजित किया गया। अपने पुरखों,पति और स्व परिवारजनों की स्मृति में उनके द्वारा यह ज्ञान यज्ञ करवाया गया। संपूर्ण गांव की भागीदारी इस धार्मिक अनुष्ठान में रही। प्रकृति ने भी साथ दिया और सुव्यवस्थित ढंग से प्रसाद वितरण और भोज के रूप में यह धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुआ।

[su_highlight background=”#880e09″ color=”#ffffff”]सरहद का साक्षी @कवि :सोमवारी लाल सकलानी, निशांत[/su_highlight]

व्यास पीठ पर आसीन आदरणीय आचार्य पं0 महेश प्रसाद बहुगुणा जी के द्वारा 07 दिनों तक अनेक रोचक और ज्ञानवर्धक धार्मिक कथाएं सुनाई गई।

सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि कथा पूर्ण रूप से गढ़वाली भाषा में सुनायी गयी। श्रीमदभागवत महापुराण के 18000 श्लोकों का सार- सम्यक रूप से महत्वपूर्ण अंशों को सम्मिलित करते हुए, अनेक टीका और भाष्यों का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए असंख्य कथाएं सुनाई गई। श्रोताओं के द्वारा रुचिपूर्वक श्रवण किया गया। परिवार, घर- गांव और क्षेत्र की खुशहाली के लिए पारब्रह्म परमेश्वर नारायण भगवान श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया गया। कीर्तन मंडली के द्वारा समय-समय पर श्रोताओं के मनोरंजन के लिए धार्मिक भजनों का भी सस्वर गायन किया गया। जिस कारण कथा श्रवण में रोचकता बनी रही।

श्रीमती विमला देवी और उनके पुत्र और पुत्रवधू के अलावा मुख्य आयोजकों मे उनके साथ उनके परिवार जन श्री किशोरी लाल उनियाल, श्री नवीन उनियाल, श्रीमती उर्मिला देवी उनियाल के द्वारा भी दिन-रात यज्ञ में सहभागी रहे। छठवें और सातवें दिन की कथा श्रवण का मुझे भी सौभाग्य प्राप्त हुआ। सबसे ज्यादा प्रभावित मुझे कृष्ण- सुदामा की कथा ने किया। बाल्यावस्था से ही सुनता आया हूं और नरोत्तम दास जी की कविताओं में भी पढ़ता और पढ़ाता आया हूं। करुणा का सागर उमड़ पड़ता है। महाकाव्यों की कथाएं 5000 वर्ष बाद भी लोग रूचि और श्रद्धा के साथ श्रवण करते हैं, जितनी रुचि और श्रद्धा के साथ आदि काल में भी श्रवण करते रहे होंगे। धार्मिक भावनाओं की प्रचुरता के साथ-साथ सांस्कृतिक समन्वय के लिए धार्मिक अनुष्ठान पुनीत कार्य होते हैं।
भागवत करवाना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिए तन मन और धन तीनों की अत्यंत आवश्यकता होती है। लाखों रुपए के साथ-साथ जनशक्ति, परिवार और रिश्तेदारों की सहभागिता का होना भी बहुत जरूरी है। निर्विघ्नं ढंग से यज्ञ संपन्न हो जाए, यह एक बड़ी उपलब्धि होती है। धन की शोभा धर्म से होती है। अच्छे लोगों का धन धार्मिक कार्यों में व्यय होता है। जिसे लंबे समय तक लोग अपनी याददाश्त में भी बताइए रखते हैं।

श्रीमद् भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ कराने का मुझे कभी संयोग नहीं मिला लेकिन ज्ञान यज्ञों में नाते- रिश्तेदारी तथा बंधु -बंधुओं के बीच में सहयोग का भाव अवश्य रहा । सेवानिवृत्ति के बाद वर्ष भर में दो-चार बार तो कथा श्रवण का अवश्य अवसर मिल जाता है।
कोरोना काल में कुछ समय इस प्रकार के धार्मिक अनुष्ठानों में गतिरोध उत्पन्न हुआ लेकिन विगत कुछ माह उसे फिर इन अनुष्ठानों ने अपनी गति पकड़ ली है। आशा है भविष्य में भी इसी प्रकार के अनुष्ठान होते रहेंगे।

नारायण की कृपा बनी रहे। संसार में सुख और शांति स्थापित हो। रोग, भय और महामारी का आतंक समाप्त हो। सब लोग खाएं- कमाएं। इसी में हमारे देश, धर्म और जीवन के अस्तित्व की महिमा निहित है।