कविता: भूखे थे बेचारे

लघु कविता: चुंग गये चावल सात सराद्
कविता
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(मेरे घर आंगन के पक्षीगण)

[su_highlight background=”#091688″ color=”#ffffff”]सरहद का साक्षी @कवि:सोमवारी लाल सकलानी, निशांत[/su_highlight]

भूखे थे बेचारे परिन्दे, झट से आ गये मेरे द्वारे,
एक नहीं दो दर्जन भर,आ गये पुन परिंदे प्यारे।
चिड़िया गौरैया नाम है इनका,कहते  बच्चे सारे,
मेरे घर आंगन के पक्षी गण, दिव्य अनोखे न्यारे।
भूखे थे बेचारे——
नहीं जमीं पर अन्न का दाना, नहीं खेत खलियानों में,
सब सरकारी सिस्टम में डूबे, खाद्यान्न सुरक्षा वाले हैं।

छोड़ दी है  सबने खेती- बाड़ी,अब सब थैली वाले हैं,

बंजर पड़ गई खेती बाड़ी, कुछ देहरादून  हल्द्वानी हैं।
भूखे थे बेचारे——-
बस केवल वोटों की खातिर, आज किसान हलधर हैं।

घर गांव में नहीं मवेसी, गोदान को  गाय – गोवंश नहीं।

गोवंश रक्षा का नारा,चढ़ गया अब केवल कोरा पारा है,
कर्महीन कथित कृषक के कारण,आज परिंदा मारा है।
भूखे थे बेचारे——
मां ने ऐसा पुण्य कमाया, है अब स्वर्ग लोक से देख रही, उसके प्यारे जीव परिंदे,

नियमित दरवाजे दस्तक देते हैं। मिलता है जब दाना उनको,चुंगकर नृत्य दिखाने लगते हैं,

पानी के डब्बे के ऊपर, वे छपक-छपक  नहाने लगते हैं।
भूखे थे बेचारे——
कर देते हैं घर आंगन पावन,संगीत चहचहाचट भरते हैं,
मिल जाती है शांति मुझे तब, जब तृप्त परिन्दे होते हैं।

चावल दाना लख निगल परिंदे, सैर -सपाटा भी करते हैं,
अपने मधुर स्वरों में पक्षीगण,गीत खुशियों का गाते है।
भूखे थे बेचारे—–