कविता: वाह रे पुतिन! कोरोना का डर भगा दिया
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किया तो भला ही था,
परिणाम अच्छा ना मिला।
भाग्य की परछाइयों में,
पुरषार्थ ओझल ही रहा।

दोष देंवे क्यों किसी को,
शायद स्वयं ही दोषी बना।
कार्य तो अच्छा किया था
परिणाम शीफर ही रहा।

मेहनत से था खेत खोदा,
नया कुछ बोने के लिए।
दिनरात मेहनत भली की,
देह दर्द एवज में मिला ।

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लोग अच्छे हैं वहीं जो,
खैरातों से आगे बढ़ते गये।
पुरषार्थ के बल जो जिए हैं,
सदा भाग्य के दुश्मन बने।

सरहद का साक्षी @कवि:सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’

(कवि कुटीर)
सुमन कालोनी चंबा, टिहरी गढ़वाल।

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