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कवि: सोमवारी लाल सकलानी 'निशांत'

स्व. सुमित्रानंदन पंत जी की जयंती पर स्मरणार्थ- कवि: सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’

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“वियोगी होगा पहला कवि/आह से उपजा होगा गान।
      निकल कर आंखों से चुपचाप/बही होगी कविता अनजान।”

प्रकृति के सुकुमार चितेरे कवि सुमित्रानंदन पंत जी की जयंती के अवसर पर उनको श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। पंत जी का प्रकृति चित्रण सजीव, सारगर्भित और अनूठा है। उन्होंने प्रकृति के विविध रूपों का चित्रण किया। कुदरत के रम्य और उद्दीपन दोनों रूप उनकी कविताओं में निहित हैं।प्रकृति के प्रति उन्हें अनन्य प्रेम था। प्रकृति के विविध रूप,जैसे-
आलंबन,उद्दीपन,अलंकार,मानवीकरण ,प्रतीकात्मक, रहस्य, पृष्ठभूमि आदि विभिन्न रूपों में प्रकृति का सजीव और स्वाभाविक अंकन किया है।

पंत जी  की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनकी रचनाएं सुकुमार और सुकोमल कल्पनाओं से ओतप्रोत हैं। प्रकृति चित्रण रीतिकालीन कवियों ने भी किया था, लेकिन पंत जी के प्रकृति चित्रण और रीतिकालीन कवियों के प्रकृति चित्रण में जमीन- आसमान का फर्क है।

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पंत जी का प्रकृति चित्रण चंद्र कुंवर वर्त्वाल, अंग्रेजी कवि विलियम वर्ड्सवर्थ,पी. वी. शैली,जान कीट्स से मिलता- जुलता है।विलियम वर्ड्सवर्थ को छोड़कर अन्य की रचनाएं दुखांत अधिक हैं। उदाहरण के तौर पर पंत जी ने अपनी कविताओं में प्रकृति के स्वरूप को नारी सौंदर्य से उत्कृष्ट माना। पंत जी की कविताओं में कबीर जैसा रहस्यवाद न होकर स्वच्छंदतावाद स्पष्ट है। छायावादी कवि होने के नाते उनकी कविताएं प्रकृति वादी और प्रगतिवादी भी हैं। इंजन में पंक्तियां स्वच्छंदतावाद का बेमिसाल उदाहरण है।

“छोड़ द्रूमों की मृदु छाया ,तोड़ प्रकृति से भी माया ।
   बाले तेरे बाल जाल में, कैसे उलझा दूं लोचन।
   भूल अभी से इस जग को।”

पंत जी ने केवल प्रकृति का ही चित्रण नहीं किया बल्कि सौंदर्य का यथार्थवादी दर्शन भी करवाया है ।

“युग युग  के मृत आदर्शों के ताज मनोहर।
    मानव के मोहांध  हृदय में किए हुए घर।
    भूल गए हम जीवन का संदेश अनश्वर,
     मृतकों के हैं मृतक जीवों का है ईश्वर।”

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पंत जी के काव्य की कोमलता अनूठी है। एक उदहारण-

“फिर परियों से बच्चों ले हम/ शुभग सीप के पंख पसार/
समुद  तैरते शुचि ज्योत्सना में /पकड़ इंदु के कर सुकुमार।”

पंत जी का का प्रकृतिवाद कुछ हद तक अंग्रेजी कवि पीवी शैली से मेल खाता है।

जैसे -Teach me halfthy gladness.
                      That the brain must know.
                      Such harmonious madness
                      From my lips would flow.

अत : एक कवि होने के नाते मै उन्हे स्मरण करते हुए चार पंक्तियां –

“बाल रूप में प्रकृति को जिसने पाया / कूर्मांचल का रूप मनोहर जिसको भाया।
प्रकृति को विविध रूप दिए हैं जिसने/ उस कवि को मैं निशांत श्रद्धांजलि अर्पित करता।
स्वाभाविक अंकन किया प्रकृति का जिसने/ रहस्य प्रतीक सजीव वर्णन किया है जिसने ।
रूप मनोहर उद्दीपन से आत्म विभोर कर /आलंबन अलंकार कोमल कल्पनाएं की जिसने।
लोकायतन महाकाव्य प्रकृतिक निरीक्षण भर/ सौंदर्य स्वर्ग आनंद भरा है जिसने।
आत्मा को उद्वेलित कर सौंदर्य भरा है /महाकवि की जयंती पर निशांत नमन करता है।

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कवि: सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’

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