प्रयास और सतत अभ्यास के द्वारा मंजिल मिल ही जाती है- कवि सोमवारी लाल सकलानी 'निशांत'
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साहित्यकार एवं कवि सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’ ने अपने अनुभव एवं संस्मरण वर्तमान और भावी पीढ़ी के लिए पेश करते हुए बताया कि जब उन्होंने सन 2014 में पहली बार कार खरीदी तो वे इतने घबराये हुए थे कि जैसे कोई हाई स्कूल का विद्यार्थी परीक्षा देने के लिए जा रहा हो। कॉलेज से लौटते वक्त श्री नवीन रावत ने कहा कि गुरु जी तो अब इस जीवन में कार नहीं ले पाएंगे और न चला पाएंगे क्योंकि मेरी उम्र उस समय 54 वर्ष हो गई थी और मैं कार ड्राइविंग के बारे में एबीसी तक नहीं जानता था।

अचानक एक विचार मेरे मन में आया, आधुनिक तकनीकी के युग में यदि हमें कंप्यूटर, इंटरनेट, कार ड्राइविंग या डिजिटल ज्ञान नहीं है तो हम निरक्षर हैं। तपाक से श्री नवीन को उत्तर दिया,” रावत जी, कल नई टिहरी डीडी मोटर्स में जाकर कार खरीदकर लानी है।”

अगले दिन प्रातः विद्यालय में जाने से पूर्व एसबीआई के बैंक मैनेजर से संपर्क किया और उन्होंने कार लोन देने की सहर्ष स्वीकृति दे दी। उसके बाद डीडी मोटर्स न्यू टिहरी गए। औपचारिकताओं को पूर्ण करने के बाद एक छोटी सी चमचमाती हुई अल्टो 800 एल एक्स आई कार खरीद कर ले लाए। ऑन रोड ₹3,44,000 में वह पड़ी।

लगभग एक हफ्ते तक वह हमारी सार्वजनिक पार्किंग में खड़ी रही लेकिन मुझे कार चलाना नहीं आता था। एक बड़ी समस्या उत्पन्न हो गई। छुट्टी के बाद पार्किंग में ही धीरे-धीरे कार पर हाथ- पांव अजमाने लगा। दो-चार दिन कार को स्टार्ट करने में, एक्सिलेटर, ब्रेक, कलच, स्टेरिंग आदि का ज्ञान प्राप्त किया। फिर धीरे-धीरे आगे पीछे और जजमेंट लिया और उसके बाद क्लच और ब्रेक के सहारे ढलान वाली एक सड़क पर चल दिया।

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गाड़ी पर बैठने का तजुर्बा था। यदा-कदा अपने साथियों से आगे बैठकर कार चलाना देखता रहता था। इसलिए जजमेंट काम आया लेकिन ऊपर लाते वक्त हाथ कांपने लग गये। अभी गेट लगाना गाड़ी को ऊपर उठाना नहीं आता था इसलिए मुसीबत खड़ी हो गई। गाड़ी को मोड़ना भी मुश्किल था।

अचानक दिशेश भूषण सर मिल गए और उन्होंने उस दिन मेरी सहायता की लेकिन जब उन्होंने जाना कि मैं कार के बारे में कुछ नहीं जानता तो उन्होंने भी अपना मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया।

बस ! चुपचाप अकेले लगा रहा। नई चमचमाती कार पर अनेक खरोंचे, डेंट पड़ गये। कई बार ईंटों के ढेर पर,कई बार पेड़- पौधों पर गाड़ी रगड़ खाने लगी। 07 दिन अथक प्रयास करने के बाद मैं बाजार तक गाड़ी ले आया लेकिन तब तक अनेकों डेंट गाड़ी पर पढ़ चुके थे। लोग तरह-तरह की बातें करने लगे। किसी ने कहा नई गाड़ी ठोक दी। किसी ने कहा कि पहले सीख लेते तब गाड़ी खरीदते, किसी ने कहा कि पहले पुरानी गाड़ी से सीखते। ‘खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे’ मै उत्तर देता कि यह जरूरी है क्योंकि से गाड़ी पर नजर नहीं लगती।

प्रयास जारी रहा। जब एक माह हो गया तो मैं एक दिन अनिल शर्मा जी के पास गया और उनसे कहा, “शर्मा जी मुझे 15 दिन कार चलाना सिखा दो। उन्होंने हामी भर दी। ₹2000 शुल्क तय हुआ। शर्मा जी को कहा कि वह मुझे मेरी गाड़ी पर ही चलाना सिखाएंगे। शर्मा जी ने पूछा,” क्या आपको थोड़ा बहुत गाड़ी चलानी आती है?”  मैने हां में उत्तर दिया और धीरे-धीरे चौक- चौराहों से होते हुए गाड़ी आगे निकली। शर्मा जी ने मेरे कानसेफ्ट क्लेयर लिए और 15 दिन के अनुबंध में मात्र 07 दिन गाड़ी सिखाई। मैंने उनका पूर्ण भुगतान किया और उन्हें अपना ड्राइविंग गुरु माना। उसके बाद एयर फोर्स के श्री चंदन सिंह राणा जो कि मेरे मित्र भी हैं, उन्होंने  22 किलोमीटर मेरे साथ कार पर बैठकर मेरी समस्त शंकाओं को दूर किया और कार चलान के अनेक टिप्स बतलाए।

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इसके बाद में नियमित रूप से कार विद्यालय तक ले जाने लगा। लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। यद्यपि कार पर काफी डेंट पढ़ चुके थे। एक दिन विश्वनाथ ऊपर से आ रही थी। मैं घबरा गया। कार को साइड करने लगा लेकिन उसका टायर नाली पर जा कर गिरा।इत्तेफाक से हमारा पुराना ड्राइवर श्री सुरेंद्र रावत अपनी टैक्सी ले कर के आ रहे थे। उन्होंने गाड़ी रोकी और पने पैसेंजरों के साथ मेरी गाड़ी नाली से ऊपर निकाल दी।

यह अनुक्रम चलता रहा और धीरे-धीरे मैं रोज नियमित विद्यालय कार ले जाने लगा। साल भर में मैं काफी कुछ कार ड्राइविंग के बारे में सीख गया। उसके बाद ऋषिकेश, देहरादून और एक बार दिल्ली तक कार ले गया।

जब कोई ड्राइविंग कम जानता है तो एक्सीडेंट होने की संभावना भी कम रहती है। एक्सीडेंट अनजान या अति उत्साहित व्यक्ति ही करता है।

08 बरस तक 72000 किलोमीटर कार अपने हाथ से चलायी और सेवानिवृत्ति के बाद एक दिन अपने पुराने कर्म क्षेत्र में जा रहा था कि अचानक विश्वनाथ गाड़ी ने आगे इतनी धूल उड़ाई कि कुछ दिखाई नहीं दिया। कुछ ध्यान हटा और गाड़ी पैराफिट से जा टकराई। मैं बाल-बाल बच गया।

बस!  मुझे पता लगा कि कोई भी ड्राइवर कभी परफेक्ट नहीं हो सकता। सावधानी, सतर्कता और जानकारी यह व्यक्ति को सफल या परफेक्ट बनाती है। हतोत्साहित होना उतना ही बुरा है, जितना कि अति उत्साहित होना। दो बार ऐसी घटनाएं घटी। एक बार जब मैं अति हतोत्साहित हुआ तो उस दिन भी पहाड़ पर गाड़ी टकराने से बाल-बाल बची और दूसरी बार अति उत्साहित होने के कारण गाड़ी पैराफिट से टकराई। उस दिन भी बाल- बाल बचा। इसलिए व्यक्ति को धीरे -धीरे और एकाग्रता से कोई भी कार्य करना चाहिए। जिससे वह स्वयं भी सुरक्षित रहता है और दूसरों को भी सुरक्षित रखता है।

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अब कार ड्राइविंग करते समय मन में भय नहीं रहता लेकिन एक्सीडेंट होने के बाद मैं सतर्क जरूर रहता हूं। 40 और 60 की स्पीड के बीच अपनी कार ड्राइव करता हूं लेकिन कभी-कभी जब उन छोटे-मोटे एक्सीडेंट की याद आती है तो कुछ मन सिहर जाता है। पानी के बुलबुलों की तरह यह नर्वसता खत्म हो जाती है और नए उत्साह, सतर्कता के साथ में पुनः सड़क पर दौड़ने लगता हूं। अपनी मंजिल को पाने के लिए।

कार ड्राइविंग हो या खेल का मैदान, नदी और स्विमिंग पूल में तैरना हो या कोई नया कार्य हाथ में लेना। घबराहट तो होती ही है लेकिन सतत प्रयास और अभ्यास के द्वारा मंजिल प्राप्त हो जाती है।

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