कविता:  कुदरत के मर्म को समझो!

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खुशी है! ठंड चली गई-
निष्क्रियता-प्रकृति और देह से,
अरुणोदय के साथ विलुप्त हो गई।
बर्फीली हवाएं थम गई।
कंबल- रजाई संदूक चले गए।
कोट स्वाटर अलमारी की शोभा बढ़ाने लगे।

देह और कुदरत का ताप!
अचानक बढ़ गया।
और होली की प्रतीक्षा करने लगा।
अचानक क्षेत्र गर्म हो गए !
जीव जंतु वन वनस्पति,
सक्रिय हो गए।

लेकिन पुरातन मन पीड़ा-
घनीभूत हो गई।
भविष्य का डर,
खुश्क पहाड़ों की तरह,
मन को अधीर करने लगे।

संसार में हलचल हुई,
जमी बर्फ पिघल गई।
और पहाड़ नंगे हो गये!
पहाड़ की बर्फ और शीतलता,थाम लो!
शीत जाने की खुशियां मना लो!
लेकिन पहाड़ के शीतलता न गंवाओ।

याद रखना,पहाड़ यदि गर्म हुए!
तो फिर कहीं भी शीतलता नहीं रहेगी।
इसलिए कहता हूं- भाई !
समझ लो !
शीत – शीतलता का अंतर,
और प्रकृति के मर्म को समझो !

[su_highlight background=”#880e09″ color=”#ffffff”]कवि:सोमवारी लाल सकलानी,निशांत[/su_highlight]