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श्रीरामनवमी: नवरात्र में श्री दुर्गा देवी के नौ स्वरूपों में नवमी दिवस की अधिष्ठात्री देवी हैं शक्ति माँ सिद्धिदात्री

सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाला है मॉ भगवती सिद्धिदात्री

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[su_highlight background=”#091688″ color=”#ffffff”]सरहद का साक्षी @*इं०/पं०सुन्दर लाल उनियाल[/su_highlight]

कंचनाभा शंखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो। स्मेरमुखी शिवपत्नी सिद्धिदात्री नमोस्तुते।।
भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी। भव सागर तारिणी सिद्धिदात्री नमोस्तुते।।

या देवी सर्वभूतेषु मां सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

[su_dropcap size=”2″]शा[/su_dropcap]रदीय नवरात्रो में श्री दुर्गा देवी के नौ स्वरूपों में आज नवमी दिवस की अधिष्ठात्री देवी-शक्ति माँ सिद्धिदात्री हैं।

माता से याचना प्रार्थना करें कि :-

हे मां ! आप सर्वत्र विराजमान है और सिद्धिदात्री के रूप में प्रसिद्ध अम्बे मैं सपरिवार सभी की ओर से आपके श्रीचरणों में सादर प्रणाम करता हूँ।

हे मां ! भगवती सिद्धिदात्री आप मुझे अपनी कृपा का पात्र बनाने की कृपा करे और मेरे सभी कष्टो का निवारण कर मुझे इस भव सागर से पार लगा दो।

नौवे दिन यानि नवमीं तिथि को मां के सिद्धिदात्री स्वरूप का पूजन और आराधना की जाती है। मॉ भगवती का यह स्वरूप सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाला है।

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देवी पुराण के अनुसार इन्हीं सिद्धियों को देवाधिदेव महादेव ने मॉ भगवती से प्राप्त किया था, जिससे महादेव का आधा शरीर देवी का हुआ और वे अर्धनारीश्वर कहलाये।

मॉ भगवती सिद्धिदात्री अपने भक्तों साधकों को सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं, जो साधक विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ भगवती की साधना करते हैं, उन साधकों को मॉ की कृपा से सहज में ही सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में उनके लिये कुछ भी अगम्य नहीं रह जाता है।

मॉ भगवती चार भुजाओं वाली हैं और इनका वाहन सिंह है, ये कमल के पुष्प पर भी आसीन होती हैं।

जो भी भक्त-साधक मां की उपासना सही ढंग से पूर्ण कर लेते हैं, उनकी लौकिक तथा पारलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है।

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भगवती का नित्यप्रति स्मरण, ध्यान, पूजन हमें संसार की असारता का बोध कराते हुये वास्तविक परम शांन्तिदायक अमृत पद की ओर ले जाने वाला है।

हे मानव प्रत्येक मनुष्य- साधक को सर्वप्रथम नित्य अपने माता-पिता अथवा किसी भी भगवदीय श्री विग्रह के दर्शन अवश्य करने चाहिये और उनके सम्मुख अपनी मानसिक श्रद्धा के पुष्प अर्पित करने चाहिये।

नित्य प्रति यह करने से आपका अपने माता-पिता के साथ-साथ ईश्वर तथा अन्य के प्रति विश्वास व आदर भाव बढ़ता है और सही मायने में यह नवरात्रो में मॉ की पूजा-आराधना के समान ही नही अपितु उससे भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण साबित होती हैं।

हे मानव चित्तशुद्धि के लिये केवल दो बातों की विशेष आवश्यकता है। विवेक और ध्यान केवल आत्मा-अनात्मा का विवेक होने पर भी यदि ध्यान के द्वारा उसकी पुष्टि नहीं की जायेगी तो वह स्थिर नहीं रह सकता,इसलिये नित्यप्रति अपने चित्त की परीक्षा लेते रहें, इससे आपका कल्याण ही होगा।

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मानव स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही शत्रु भी है। यदि मनुष्य स्वयं सरल-समान हो जाये तो वह स्वयं ही श्रेष्ठ बन जायेगा, क्योंकि सहनशीलता व आपके अच्छे कर्म ही आपको पुरुष से महापुरुष बनाते है।

*नैतिक शिक्षा व आध्यात्मिक प्रेरक, दिल्ली/इन्दिरापुरम, गा०बाद/देहरादून

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