भ्रमित न हों! मलमास याने श्रावण अधिकमास शिव सानिध्य को प्राप्त करने का शुभ समय है।

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पति की कामना करने वाली कन्या को विशेषरूप से करना चाहिए यह व्रत, सौ गुना फलदायी है शिवा चतुर्थी का व्रत

भ्रमित न हों! मलमास याने श्रावण अधिकमास शिव सानिध्य को प्राप्त करने का शुभ समय है।

अधिकमास, मलिन मास, मलमास या पुरुषोत्तम मास, कारण और औचित्य, करणीय कर्म

इस वर्ष श्रावण मास अधिकमास के रूप में है, अधिकमास को मलिन मास, मलमास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। इस विषय पर हर तीसरे वर्ष एक बहस छिड़ जाती है जो किसी न किसी रूप में स्वाभाविक भी है। सामान्य जन मानस इस गूढ़ रहस्य की तह तक नहीं पहुंच सकता जिससे भ्रम की स्थिति बन सकती है। फिर ‘मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना’ की बात सही हो जाती है, आज का युग विज्ञापन का युग है, सब कुछ विज्ञापन के कारण बिक जाता है या विश्वसनीय लगता है।

अतः वास्तविकता को समझना आवश्यक है। शायद सौर मास व चान्द्र मास को अधिकांश लोग समझ गए होंगे, इस पर कुछ दिन पहले 6 जुलाई को सरहद का साक्षी, डिजिटल मीडिया के माध्यम से प्रकाश डालने की चेष्टा की थी, आज अधिक मास पर कुछ कहने की अभिलाषा जागृत हुई है।

सन् 2020 में सत्रह सितम्बर को कुछ लिखा था तब आश्विन में अधिकमास था, इस बार श्रावण में अधिकमास है, इस पर कुछ पुरुषों के साथ अधिकांश महिलाओं की जिज्ञासाएं हैं कि श्रावण में शिवालयों में जल नहीं चढ़ाया जाएगा, या चढ़ाया जाएगा, जो एक भ्रम है। अतः इसका निवारण आवश्यक है। अधिक मास हर तीसरे वर्ष होता है कारण सौरमास व चान्द्र मास के दिनों का सन्तुलन बन जाय।

सामान्यतया सौर मास तीन सौ साढे पैंसठ दिन का व चान्द्र मास तीन सौ चौवन दिन का, तीन साल के अन्तराल में यह सीमा सामान्य हो जाती है। अधिकमास वह होता है जिस सौर मास में दो अमावस्या होती हैं, इस वर्ष श्रावण मास में दो अमावस्या है अतः एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या तक एक चान्द्र मास अधिकमास है, जैसे-

यस्मिन् मासे न संक्रान्ति: संक्रान्तिद्वयमेव वा ।
मलमास: स विज्ञेयो मासे त्रिंशत्तमे भवेत् ।।

(और यदि किसी महीने अमावस्या ही न हो तो वह महीना क्षय मास कहलाता है। चार पांच वर्ष बाद सम्भवतः सम्वत 2084 / 85 में यह स्थिति आएगी।)

इस अधिकमास में शुभ कार्य यथा गृह वास्तु, गृह प्रवेश, विवाह, चौल कर्म, उपनयन, मूर्ति प्रतिष्ठा आदि नहीं होते हैं, लेकिन दान, धर्म-कर्म, पुराण कथा, पूजा पाठ आदि नैमित्तिक कर्म पुण्य अर्जन हेतु अधिक से अधिक किए जा सकते हैं और करने भी चाहिए।

अधिक मास की महिमा

वन्दे कृष्णं गुणातीतं गोविन्दमेकमक्षरम् ।
अव्यक्तमव्ययं व्यक्तं गोपवेशविधायिनम् ।।

सबसे पहले प्राचीन काल में अधिक मास की उत्पत्ति हुई, उस मास में सूर्य की संक्रान्ति न होने के कारण (एक माह में दो अमावस्या होने से) वह मलिन मास या मल मास कहलाया। चूंकि उसका कोई स्वामी नहीं था, अतः देव पितर पूजन हेतु अर्ह नहीं माना गया व निन्दनीय हुआ, फलस्वरूप दु:खी होकर चिन्ताग्रस्त, धैर्य च्युत हो गया पर ईश्वर कृपा से विष्णु लोक चला गया।

भगवान विष्णु को दण्डवत् प्रणाम कर भगवान से प्रार्थना करते हुए कहने लगा कि भगवन् मैं ‘मलमास’ संसार के लोगों से निन्दित व तिरस्कृत हूं। अतः मेरी रक्षा करो। ‘मां पाहि प्रभो’ भगवान विष्णु ने द्रवित होकर कहा कि हे अधिमास इस वैकुण्ठ लोक को पाकर तुम्हें दु:खी नहीं होना चाहिए, मैं कुछ चिन्तन करता हूं।
इस पर मलिमास ने कहा — प्रभो!

न मे नाम न मे स्वामी न हि कश्चिनममाश्रय: ।
तस्मान्निराकृता: सर्वे साधिदेवै: सुकर्मण: ।।

भगवान विष्णु ने विचार कर कहा —

वत्सागच्छ मया सार्धं गोलोकं योगि दुर्लभम् ।
यत्रास्ते भगवान् कृष्ण: पुरुषोत्तम ईश्वर:।।

भगवान विष्णु ने श्री कृष्ण से निवेदन किया कि हे मुरलीधर! यह अधिमास सूर्यसंक्रमण से रहित होकर मलिन हो गया है, पुण्य कर्म के अयोग्य इसका कोई स्वामी नहीं है। अतः इसके कष्ट का निवारण आप के अतिरिक्त और कोई नहीं कर सकता है अतः इसके दु:ख का निवारण कीजिए। गोप वल्लभ भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि प्रभो जिस पर आपकी कृपा हो जाती है उसे किसी प्रकार का कष्ट नहीं हो सकता। अतः मैं इसे अपने समतुल्य करता हूं।

अहमेते यथालोके प्रथित: पुरुषोत्तम: ।
तथायमपि लोकेषु प्रथित: पुरुषोत्तम: ।।

आज के बाद यह पुरुषोत्तम मास के नाम से जाना जाएगा, और इसका स्वामी मैं रहूंगा। परम धाम को प्राप्त करने के लिए जो भी मानव इस महीने व्रत, पूजा, अनुष्ठान, स्नान, दान करेगा उसे गो लोक अर्थात् मेरा लोक मिलेगा। अतः मोक्ष कामना वालों को विधिवत् इस महीने पूजा अर्चना करनी चाहिए।

विधिवत् सेवते यस्तु पुरुषोत्तममादरात् ।
कुलं स्वकीयमुद्धृत्य मामेवैष्यत्यसंशयम् ।।

अतः यह निर्विवाद सत्य है कि जो भी व्यक्ति अधिक मास में श्रद्धा भक्ति के साथ व्रत उपवास आदि शुभ कर्म करता है वह अपने सम्पूर्ण परिवार के साथ भगवान श्रीकृष्ण का सानिध्य प्राप्त करता है। अतः इस भ्रम को दूर करना आवश्यक है कि इस मलमास में दान, जप, तप, पूजा पाठ नहीं करना चाहिए।

यह निर्विवाद सत्य है कि ईश्वर कृपा प्राप्ति का सुगम साधन है, – ‘मलमास’ और श्रावण में अधिक मास होना शिव के सानिध्य को प्राप्त करने का शुभ समय है। कृपया भ्रमित न हों, ईश्वर अर्चना में संलग्न रहें।

मलमास पर विशेष करणीय कर्म

इस वर्ष श्रावण मास मलमास है, संक्रांति के दिन अमावस्या है और संयोग से संक्रांति के दिन सोमवार भी है । जब एक सौर मास में दो अमावस्या होती है तो वह महीना मलमास होता है। मलमास में भगवान शंकर की उपासना का विशेष माहात्म्य है, भगवान शिव की अशिव रूप की वन्दना करते हुए भक्त जन मलमास भर शिव लिंग पर जल, बेलपत्र, धतूरा तथा पत्र पुष्प चढ़ाते हैं। व्रत लिया जाता है, पाठ, पूजा, कथा, मलमास की कथा, श्रीमद्भागवत पुराण कथा, शिव पुराण कथा, दान हवन सभी कृत्य किए जाते हैं। कृपया भ्रमित न हों।

यदि सोमवार को अमावस्या हो तो उसका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है । इस दिन का व्रत और भी पुण्य दायक है, ऐसा दिन पर्वों में सर्व श्रेष्ठ माना जाता है, इह दिन का स्नान, ध्यान, दान हजार गाय दान के बराबर है। इस दिन पीपल वृक्ष की १०८ परिक्रमा तथा विष्णु पूजन भी श्रेयस्कर है।

श्रावण में मलमास होने पर विशेष पूजा अर्चना करें, औरों को भी यह संदेश देकर पुण्य के भागी बनें।
ॐ नमः शिवाय।

*आचार्य हर्षमणि बहुगुणा

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