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Maheshwaranand Bahuguna was pioneer and agricultural chief
Maheshwaranand Bahuguna

पौरोहित्य व कृषि कर्म प्रधान थे महेश्वरानंद बहुगुणा

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प्रस्तुति: हर्षमणि बहुगुणा

सरहद का साक्षी

रानीचौरी: आज पितृ विसर्जन अमावस्या के पावन दिवस पर एक विशिष्ट व्यक्तित्व को याद करते हुए अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करने का प्रयास भी कर रहा हूं।  देवभूमि की छोटी काशी में प्रात: स्मरणीय श्री महानन्द बहुगुणा जी के घर पर पूज्य व प्रात: स्मरणीय श्री महेश्वरानंद बहुगुणा जी का जन्म सम्वत् १९२९ सन् १८७२ में हुआ।

आपका मुख्य व्यवसाय पौरोहित्य कर्म व कृषि कर्म था, अपने कर्म में पटु व गांव के सम्मानित व्यक्तियों में सम्मिलित थे। धन की लालसा शायद न के बराबर थी इसका पता इस बात से लगाया जा सकता है कि नजदीक की यजमानी दिखोल गांव, थान, चोपडियाली आदि से अपने चचेरे भाई स्व० श्री सुरेन्द्र दत्त बहुगुणा जी के साथ एक ही अभियान था कि अपने गांव की उन्नति हो, अतः यजमानों से नकद दक्षिणा के बदले गांव के हितार्थ भड्डू, कड़ाही, लोटे पानी एकत्रित करने के लिए एक बड़ा तांबे का पात्र (फूच) आदि दान स्वरूप प्राप्त कर गांव की सार्वजनिक सम्पत्ति को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

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यदि गांव में कोई विवाद हो जाय तो उसे सुलझाने में मदद करते थे। सबसे बड़े भाई होने का पूरा दायित्व निभाया। अपने अनुजों स्व० श्री भुवनेश्वर, श्री सुरेशा नन्द, श्री रामचन्द्र बहुगुणा जी की समुचित शिक्षा दीक्षा का निर्वहन, जबकि उस समय न कोई विद्यालय था न औपचारिक शिक्षा की व्यवस्था।

घर पर ही पं० मंगलानन्द जी के पास या अन्य किसी माध्यम से शिक्षित करवाने का प्रयास किया। लम्बा- चौड़ा डील डौल का शरीर, आकर्षक व्यक्तित्व के धनी आपके चार पुत्रों में सबसे बड़े श्री पीताम्वर दत्त बहुगुणा, श्री तारा दत्त बहुगुणा, श्री पूर्णा नन्द बहुगुणा व श्री पुरूषोत्तम दत्त बहुगुणा एवं दो बिटियां थी।

प्रथम तीन पुत्रों को पैतृक व्यवसाय में लगाया तथा सबसे छोटे पुत्र को सुशिक्षित कर डाक्टर बनाया जो अपने समय के ख्यातिप्राप्त डाक्टर थे।

घर पर ही बिना किसी संसाधन के चीर फाड़ कर रोगी के रोग का निदान करते थे। ऐसे महामानव को भी अकाल कवलित होना पड़ा , वह भी आश्विन नवरात्र की विजया दशमी को सन् १९५२ ईसवी में। भव्य अन्तिम यात्रा के साथ ग्राम वासियों सहित थान, दिखोल गांव के यजमानों ने अन्तिम विदाई दी। आपका जाना समूचे क्षेत्र के लिए कष्ट प्रद था, परन्तु विधि के विधान को कौन टाल सकता है।

शायद आपका यह आदर्श कि

“करना चाहते हो तो सेवा करो, जानना चाहते हो तो अपने आप को जानो, मानना चाहते हो तो केवल प्रभू को मानों”

सदैव स्मरण रहेगा। आप यह शक्ति भी हमेंअवश्य प्रदान करने की कृपा करना, यही विनती के साथ प्रार्थना भी है।

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आज के पावन दिवस पर उनका यह प्रपौत्र भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है। यह सब कुछ मन के उद्गारों को व्यक्त करने की प्रेरणा भी उनके विशिष्ट स्नेह या यूं कहा जाय कि कोई विशेष दुर्योग का परिणाम ही हुआ होगा, उसे आप ही जानते है। अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए उन्हें व समस्त पितरों को कोटि-कोटि नमन करता हूं।

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इस प्रार्थना के साथ कि इस उत्तराखंड की काशी पर अपनी कृपा दृष्टि बना कर अवश्य रखेंगे। जिससे हम आपके आदर्शों का पालन करने में समर्थ रह सकें।

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