कविता: जागो ! जन जागृति आयी है।

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(प्रस्तुत स्वरचित कविता 10 जनवरी 2017 को जागृति सदन “खाडी” टिहरी गढवाल में, नदी बचाओ अभियान के अंतर्गत सुनाई थी। कविता अनुपम मिश्र जी को समर्पित है।)

[su_highlight background=”#091688″ color=”#ffffff”]कवि: सोमवारी लाल सकलानी, निशांत[/su_highlight]

जागो!  जन जागृति आई है, जल संरक्षण पहल भायी है
जागो ! उठो, सुनो-सुनाओ, हेंवल जागर मिलकर गाओ.
जागो ! जन जागृति आई है।
जल स्रोत सब सूख रहे क्यों? हिमनद भी पिघल रहे क्यों?
मौसम परिवर्तन है यह क्यों, ओजोन परत क्षरण आया क्यों?
जागो! जन जागृति आई है।

हेंवल जागर नयी पहल है, जल स्रोतों का यह जीवन है।
पर्वत की घाटी माटी से, इसमें केवल अपना पन है।
जागो ! जन जागृति आई है।
धरती माँ पुकार रही है, वन-वाटिका निहार रही है।
सरिता-कानन भांप रहे हैं, सुन हेंवल जागर जाग रहे हैं।
जागो! जन जागृति आई है।

उठो आज ही साथ चलें हम, कर्म-कुशल जागरूक बने हम।
सुरकंडा पर्वत से लेकर, शिवपुरी तक साथ चलें हम।
जागो ! जन जागृति आई है।
जागो, उठो किसानों जागो, काश्तकार कर्मवीरों जागो
नई सुबह है – नया उजाला, नई क्रांति है-जागृति लाओ
जागो! जन जागृति आई है।

आवाज हिमालय से आई है,नई पहल जागृति भायी है।
हेंवल सरिता के माध्यम से, निर्मल गंगा की ठानी है।
जागो! जन जागृति आई है।
सूख रहे जल स्रोत व् धारे, नदी तटों पर पत्थर गारे।
फिरते हैं जन मारे-मारे, सोचा कैसे इन्हें उबारें।
जागो! जन जागृति आई है।

फिर से गांधी याद है आया,जन जागृति का गीत है भाया।
नई क्रांति का बिगुल बजाया, हेंवल जागर तुम्हें सुनाया।
जागो! जन जागृति आई है।
सौ साल का वक्त गंवाया,तब चम्पारण याद है आया।
अनुपम मिश्र हमें फिर भाया,हेंवल जागर मिलकर गाया।
जागो! जन जागृति आई है।

मातृ शक्ति उठो ! तुम जागो,बंधू बान्धवों साथ निभाओ।
जल स्रोतों पर पेड़ लगाओ, हेंवल जागर सदा सुनाओ।
जागो! जन जागृति आई है।
सरिताएं फिर स्वच्छ बनेगी, निर्मल जल के साथ बहेंगी।
लहरों पर फिर हंसावालियाँ, क्रीडा करती राग भरेंगी
जागो! जन जागृति आई है।

उषा किरण जब घर आएगी,अमृत रस भर नदी बहेगी।
भगीरथों के अथक प्रयास से,नदियाँ फिर से मान भरेंगी।
जागो! जन जागृति आई है।
हेंवल जागर क्रांति दूत है, मानव बसुन्धरा पूत है।
जन जागृति की नयी पहल है,जीवन रक्षा का यह हल है।
जागो! जन जागृति आयी है।