अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस: केवल रस्म अदायगी और शुभकामनाओं तक ही सीमित ना रहे बल्कि दें महिलाओं को उनका बराबरी का हक

    अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस: केवल रस्म अदायगी और शुभकामनाओं तक ही सीमित ना रहे बल्कि दें महिलाओं को उनका बराबरी का हक


     

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    अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर समय-समय पर कुछ न कुछ लिखता और रचता रहा हूं। अपनी कविताओं के माध्यम से मातृशक्ति को नमन करने के लिए अनेकों रचनाएं भी प्रस्तुत करता रहा हूं। हमारे धर्म संस्कृति और देश में आदिकाल से ही महिलाओं का सम्मान रहा है। यहां तक की जीवन और सृष्टि के अस्तित्व का प्रतीक भी मातृशक्ति को माना गया है।

    [su_highlight background=”#880e09″ color=”#ffffff”]सरहद का साक्षी @कवि:सोमवारी लाल सकलानी, निशांत[/su_highlight]

    हमारी धर्म और संस्कृति में मां सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा के अवतारों को कौन नहीं जानता। हमेशा शक्ति स्वरूपा के रूप में उपासना के क्षेत्र में अभिभूत किया गया है। मैंने भी अपने तीन काव्य  महामाया मां भगवती प्रकृति स्वरूपा अपनी आराध्य देवी को समर्पित किए हैं।
    यह सत्य है कि पुस्तकों में लिखी गई बातें आस्था के प्रतीक होती हैं। आस्था, विश्वास और श्रद्धा जीवन को बल प्रदान करती है।
    कहने- सुनने में सभी चीजें अच्छी लगती है लेकिन जब सम्यक दृष्टि से विचार करता हूं, तो पाता हूं कि सबसे ज्यादा संसार में त्रासदी, दु:ख, पीड़ा महिलाओं को झेलनी पड़ती है और सर्वाधिक शोषण महिलाओं का हुआ है। महिलाएं समय-समय पर अत्याचार, अन्याय भेदभाव और शोषण की शिकार होने के साथ-साथ नारकीय जीवन जीने को भी विवश रही हैं। चाहे वह द्रोपदी हो या पद्मावती।

    युद्ध काल, सांप्रदायिक दंगों और आतंकवाद में  अगर सबसे बड़ी त्रासदी किसी को उठानी पड़ती है तो वह महिलाएं हैं चाहे वह विजेता देश की हों या विजित देश की हों। शांति काल में भी महिलाएं पारिवारिक, सामाजिक हिंसा के शिकार होती रही हैं। एक ओर हम नारी शक्ति को मातृवत मानते हैं और दूसरी तरफ कुरूप संसार में महिलाओं को उपभोग की वस्तु। यही दकियानूसी सोच के कारण कई बार संसार का विनाश में हुआ है। यद्यपि आज महिलाएं हर क्षेत्र में आगे हैं यह किसी से छुपा हुआ नहीं है, लेकिन जो सर्वोच्च दर्जा उनको मिलना चाहिए था वह नहीं मिला।

    सामाजिक क्षेत्र हो या सार्वजनिक जीवन, प्रशासन हो या राजनीति, महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है लेकिन आज भी समाज की सोच इतनी बेहतर नहीं हुई है जितनी होनी चाहिए थी। समाज में महिलाओं को भले ही आदर -सम्मान मिलता है लेकिन जब कभी कभी अमानवीय घटनाएं घटती हैं तो मन दुखी भी हो जाता है। कमोबेश आज भी एक वर्ग महिलाओं को स्त्रीतत्व की बेड़ियों में जकड़ कर रखना चाहता है।

    हमेशा महिलाओं से ही अनुशासित दिमाग और संयमित व्यवहार की आशा की जाती है जबकि पुरुष वर्ग का नजरिया हमेशा ही अहंकारी के रूप में रहता है। कोई भी पुरुष मां के गर्भ से ही उत्पन्न है और सर्वप्रथम वह मातृशक्ति के लिए पुत्रवत् है। लौकिक संसार में वह पति हैऔर सहभागी है और फिर वह एक पिता,दादा-नाना है। यह सब उपलब्धियां उसे महिलाओं के कारण ही हासिल हुई है।

    आदि काल में महिलाओं का सम्मान किया जाता था। मातृ सत्तात्मक समाज की परिकल्पना थी लेकिन तब भी षुरुषों के द्वारा ही नहीं बल्कि महिलाओं के द्वारा भी महिलाओं का भी शोषण किया गया। एक सास अक्सर भूल जाती है कि कभी वह भी बहू थी और अपने अहं में वशीभूत होकर के बहू से भेदभाव भी कर बैठती है। बेटी का भाव केवल दिखावे के लिए उसके मन में आता है यह बात भी जगजाहिर है।

    आज भी दहेज,दुष्कर्म, उत्पीड़न, महिलाओं के शारीरिक और मानसिक शोषण की जितनी घटनाएं विश्व के कोने -कोने में सुनाई देती हैं।इतना शोषण किसी अन्य वर्ग का नहीं होता जितना महिलाओं का होता है। अधिकांश घटनाएं यह तो लोक लाज के कारण या मर्यादा का प्रश्न खड़ा करके दबा दी जाती हैं लेकिन जब पानी सिर के ऊपर से बहने लगता है तो फिर समाज के सामने हकीकत आती है। दुर्भाग्य की बात यह है कि जिस सभ्य समाज की हम परिकल्पना करते हैं वहां महिलाओं को उचित न्याय नही मिलता है,जो लज्जा जनक है।

    यदि हम सभ्यता का विकास करना चाहते हैं तो हमारे समाज में महिलाओं को उचित स्थान दिया जाना चाहिए। एक अच्छे राष्ट्र निर्माण के लिए महिलाओं को भी एक अच्छी माता, पत्नी और पुत्री होना होगा।

    पुरुष और प्रकृति में थोड़ा अंतर है। पुरुष का स्वभाव उग्र, वैचारिक और अहंकारी होता है जबकि महिलाओं में करुणा, दया, धार्मिकता, सहनशीलता और समरसता की भावना निहित होती है। परिवार में महिला सबसे बड़ी शिक्षिका होती है। अगर व्यापक रूप में हम प्रकृति को भी मां के समान समझे तो वह भी वही कार्य करती है जो एक घर में मां करती है। इसलिए मां सरस्वती, दुर्गा, लक्ष्मी हो या प्रकृति माता हो, या जन्म देने वाली माता या पोषण करने वाली माता, नारी शक्ति के रूप में सदैव विद्यमान रही है। हमेशा जगत के कल्याण की भावना उसके हृदय में सर्वोपरि रही है।

    अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हम चाहते हैं कि महिलाओं को आदर और सम्मान के साथ- साथ उन को उनका हक भी मिले। चाहे वह घर परिवार के मामले में हो या सेवा क्षेत्र में हो। सार्वजनिक जीवन में हो या धर्म और संस्कृति में हो। यही बात हमारे पुरातन ग्रंथ  बताते हैं और यही बात हमारे उपनिषदों के सार में भी संरक्षित है।

    अनेकों धार्मिक और सामाजिक अनुष्ठानों में शरीक होने का अवसर मिलता है। वहां भी सहयोग के रूप में महिलाओं की भूमिका सर्वोपरि होती है। घर में भी महिलाएं सुबह से देर रात तक अपने कार्यों में निमग्न रहती हैं। पूरे परिवार की व्यवस्था संभालने के साथ-साथ अपने सामाजिक दायित्वों का भी निर्वहन करती है लेकिन उसके किए गए कार्यों का कभी भी सही आकलन नहीं किया जाता है, जबकि यह होना चाहिए।

    मातृशक्ति में हर एक मानवीय गुणों के साथ साथ वह शक्ति की प्रतीक है। हम उसे किसी रूप में लें, एक स्वस्थ समाज की परिकल्पना हम तभी कर सकते हैं, जब हम महिलाओं को उनका बराबर का हक दें। स्त्रीत्व की बेड़ियों से उन्हें मुक्त करें। चाहे वह हिंदू समाज हो या मुस्लिम समाज, या कोई अन्य संप्रदाय क्यों न हो। महिलाओं की आजादी, उनकी भागीदारी, उनकी शक्ति और उनकी भागीदारी को सदा समझना चाहिए। इसी में विश्व का कल्याण निहित है और यही मैं महिला अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाने की प्रसंगिकता समझता हूं। अन्यथा प्रत्येक बातें केवल रस्मअदायी होंगी। एक रस्म मानकर हम आगे नहीं बढ़ सकते हैं। हमारे युगपुरुष स्वामी विवेकानंद हों, राजा राममोहन राय या महात्मा गांधी, या देश के कोई अन्य नायक ही क्यों न हुए हों उन्होंने हमेशा महिला सशक्तिकरण पर जोर दिया है जो कि समीचीन है। पारदर्शिता के साथ आज भी  जो कमियां हमें महसूस होती है, उन्हें दूर किया जाए और मातृसत्तात्मक समाज के पुनःर्स्थापना की जाए।