करवाचौथ का व्रत कैसे रखते हैं? कितने वर्षों तक करना चाहिए करक चतुर्थी व्रत?
कैसे रखते हैं करवाचौथ का व्रत। कार्तिक कृष्ण पक्ष चतुर्थी तिथि को (करक चतुर्थी व्रत) करवाचौथ का व्रत किया जाता है, व्रती प्रात:काल स्नानादि से निवृत होकर वस्त्राभूषणों से विभूषित हो कर गणेश जी का भक्ति पूर्वक पूजन करके पवित्र चित्त से पकवान से दस करवे भर कर गजानन के सम्मुख समर्पण मन ही मन प्रार्थना करे कि- ‘करुणा सिन्धु कपर्दि गणेश आप मुझ पर प्रसन्न हों’ । सुवासिनी स्त्रियों व ब्राह्मणों को आदर पूर्वक बांट दें।
@आचार्य हर्षमणि बहुगुणा
समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले गणेश का स्मरण, चिन्तन व नाम जप करते हुए रात्रि चन्द्रोदय पर चन्द्रमा को विधि पूर्वक अर्क प्रदान करें। व्रत पूर्ति के लिए स्वयं मिष्टान्न भोजन करना चाहिए। इस व्रत को कम से कम बारह या सोलह बर्षों तक करना चाहिए तदनन्तर इसका उद्यापन करें, इसके बाद स्त्री चाहे तो इसे छोड़ सकती है या सुख सौभाग्य के लिए जीवनपर्यंत ले सकती है।
स्त्रियों के लिए इसके समान सौभाग्य प्रदान करने वाला अन्य कोई व्रत नहीं है। आज कल कुछ परम्परायें बदलती हुई दिखाई देती हैं, कहां से आई कहा नहीं जा सकता पर चन्द्रोदय पर छलनी से चांद देख कर तब अर्क प्रदान करना, सम्भवतः जिस लड़की वीरावती के भाइयों ने बहिन वीरावती को नकली चन्द्रमा दिखाया था, से लिया गया हो या व्रत की महिमा को मण्डित करने का उद्देश्य हो, पर यह शास्त्र सम्मत नहीं है।
इस व्रत में मात्र चन्द्रमा की ही पूजा नहीं होती अपितु शिव पार्वती और स्वामी कार्तिकेय की पूजा अर्चना का विधान भी है, क्योंकि मां पार्वती ने घोर तपस्या करने के बाद भगवान शंकर को प्राप्त कर अखण्ड सौभाग्य पाया वैसे ही व्रती को भी मिले । वैसे भी गौरी पूजन का कुमारी कन्याओं व विवाहिता स्त्रियों के लिए विशेष माहात्म्य है।
चन्द्रमा की किरणें शीतलता प्रदान करने वाली है छान कर उनका सेवन उसके महत्व को कम ही किया जाता है हां पेड़ की पत्तियों के मध्य से चन्द्रमा दिखाना विशेष कल्पनाएं अपना ताना बाना बुनती हैं। करवा चौथ का त्योहार भारतीय संस्कृति के उस पवित्र बन्धन का प्रतीक है जो पति-पत्नी के बीच होता है, भारतीय संस्कृति में पति को परमेश्वर की संज्ञा दी गई है।
करवाचौथ पति-पत्नी दोनों के लिए नव प्रणय निवेदन और एक दूसरे के प्रति अपार प्रेम, त्याग एवं उत्सर्ग की चेतना लेकर आता है, नारियां भगवान रजनीश से अपने अखण्ड सुहाग की प्रार्थना करती हैं। दिन भर व्रत लेकर ईश्वर के समझ यह प्रण भी लेती हैं कि वह मन, कर्म व वचन से पति के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना रखेंगी।
