हिंदी कविता, वक्त: मछलियों की तलाश में, हम दूर बहुत चले आये!

पलायन पर कविता
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मछलियों की तलाश में, हम दूर बहुत चले आये!

   @कवि:सोमवारी लाल सकलानी, निशांत

मछलियों की तलाश में, हम दूर बहुत चले हैं आए!
चौरासी दिन सागर भटके,  कुछ भी हाथ ना आए।
खारे जल के बीच भोर से,संध्या तक समय गंवाए।
मछलियों की तलाश में, हम दूर  बहुत  चले आए!

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जीवन भर सागर में भटके, यश भी खूब  कमाए,
वक्त के कटु परिवर्तन में, हम कुछ समझ ना पाए।
शक्ति क्षीण हो गई तन की, अब कैसे नाव चलाएं !
मछलियों की तलाश में, हम दूर बहुत चले हैं आए।

हमने यौवनं को पुकारा, लेकिन साथी कोई ना आए।
साथ छोड़ दिया है सब ने, कोई  समीप  नहीं  आए।
यौवन में सब साथ थे फिरते, हैं केवल भाग्य  सहारे,
मछलियों की तलाश में, हम दूर बहुत चले हैं आए।

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हम चले अकेले दूर सागर में, केवल अनुभव सहारे।
पकड़ी बड़ी-बड़ी मछलियां, नौका पर  कौन चढ़ाएं।
रखी नाव में कुछ मछलियां, शेष सार्क निगल खाए,
मछलियों की तलाश में, हम दूर बहुत चले हैं आए।

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जब तक पहुंचे मंजिल तट पर, कुछ भी बचा न पाए,
चबा -चबा कर सार्क मछलियां, रात अंधेरी सब खाए।
हमने पुकारा यौवन को, लेकिन साथ कोई नहीं आए,
मछलियों की तलाश में, हम दूर बहुत चले हैं आए।

     (कवि कुटीर)
    सुमन कॉलोनी चंबा, टिहरी गढ़वाल।