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वैदिक परम्पराओं व सनातन धर्म व संस्कृति की जागरूकता के लिए धर्म में निष्ठा होनी आवश्यक है: चंद्रमणि बहुगुणा

वैदिक परम्पराओं व सनातन धर्म व संस्कृति की जागरूकता के लिए धर्म में निष्ठा होनी आवश्यक है: चंद्रमणि बहुगुणा

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[su_highlight background=”#880930″ color=”#ffffff”]प्रस्तुति: हर्षमणि बहुगुणा [/su_highlight]

*न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूय: ।*
*अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे* ।।

प्रात:स्मरणीय श्री महेश्वरानंद बहुगुणा जी, प्रात:स्मरणीय श्री तारा दत्त बहुगुणा जी, प्रात: स्मरणीय पूज्य पिताश्री श्री चन्द्र मणि बहुगुणा जी को विनम्र श्रद्धांजलि समर्पित करते हुए कोटि-कोटि नमन करता हूं।”
“” *पितृपक्ष में आज प्रात:स्मरणीय पूज्य पिताश्री की श्राद्ध तिथि है, इस पार्वण श्राद्ध तिथि में तीन पीढ़ियों का स्मरण हो जाता है अतः प्रात: स्मरणीय पूज्य पितृचरणों में कोटि-कोटि नमन करते हुए पूर्वजों के ‘उत्तर दायित्वों’ का यथा सम्भव निर्वहन करने का प्रयास कर रहा हूं, करता आ रहा हूं। यद्यपि यह जन इस योग्य नहीं था पर यदा – कदा आपका कथन (प्रेरणा) याद आती है और उस मार्ग पर चलने का प्रयास करने की चेष्टा करता हूं । यही कारण है कि आने वाली पीढ़ी का भविष्य भी दांव पर लगा दिया, आप यूं ही मजाक में या वास्तविक रूप से (आन्तरिक भावना से ओत-प्रोत हो कर) कहा करते थे या शिक्षा देते थे कि – मानव जीवन का कोई भरोसा नहीं है। इस संसार में जो आया है वह अवश्य जाएगा, समाज के दृष्टिकोण से न सही! पर वैदिक परम्पराओं व सनातन धर्म व संस्कृति की जागरूकता के लिए धर्म में निष्ठा होनी आवश्यक है।

आपने ज्ञान अर्जित कर – चालाकी के मार्ग से विरत रहने की सलाह दी, यही कहा करते थे कि ‘बड़े भाग मानुष तन पावा’ । अतः कर्तव्य पर ध्यान केन्द्रित कर ‘कर्तव्य ही पूजा है’ । यथार्थ जीवन जीना श्रेयस्कर है । साधारण जीवन जीना चाहिए, “सादा जीवन उच्च विचार” भविष्य चाहे कितना भी सुनहरा व स्वप्न भरा क्यों न हो, अनिश्चित व अजन्मा ही है। अतः वर्तमान में जीना श्रेष्ठ है, भूत मृत है । इसलिए जीवन तो सहज व स्वाभाविक ही होना चाहिए, नैतिक मूल्यों को बरकरार रखना आवश्यक है। जीवन सम्यक् , सन्तुलित व संयमित होना चाहिए “उसके पास है, मेरे पास नहीं” की धारणा का त्याग करना होगा। एकान्त में रहना सीखो, क्योंकि भीड़ बहिर्मुखी बनाती है और व्यक्ति दूसरे की गलतियों को देखता है , जबकि अकेले में व्यक्ति अन्तर्मुखी बनता है, आत्म निरीक्षण, आत्म विश्लेषण व आत्म मूल्यांकन करता है, जो श्रेयस्कर भी है, फिर संसार में सन्मित्र मिलें या न मिलें, इस लिए अच्छी पुस्तकों का अध्ययन व सत्संगति आवश्यक है क्योंकि इस ज़हर रूपी संसार वृक्ष में दो ही फल मीठे हैं– ‘अच्छे मित्र व अच्छे लोगों की संगति’, मनुस्मृति में भी तो यही बताया है कि –

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*बुद्धिवृद्धिकराण्याशु धन्यानि च हितानि च ।*
*नित्यं शास्त्राण्यवेक्षेत निगमांश्चैव वैदिकान् ।।*

” *और जीवन सामंजस्य में भावना से अधिक विवेक की आवश्यकता है । ” ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर “। तभी तो कहा है कि —*
*”आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन: ।* “
*अच्छा कोई कहे या न कहे पर अन्तरात्मा से सदैव अच्छा कार्य करना चाहिए । किसी श्रेय की कामना से नहीं। ” मन के हारे हार है मन के जीते जीत ” । मनुष्य शरीर ईश्वर की उत्कृष्ट रचना है , यह मानव के लिए अनुपम व अनोखा उपहार है। प्रभु की इस भेंट को सहेज कर रखना। यथासंभव भलाई करना किसी का अहित न करना क्योंकि हित का प्रतिफल अच्छा ही मिलेगा। यह सारी प्रेरणा मिली — कर्तव्य, वर्तमान में जीना, सहज व स्वाभाविक जीवन, संयमित जीवन, अच्छी पुस्तकों का अध्ययन व सत्संगति, आप पूर्वज हैं, आज पितर हैं जो देवताओं से भी महान कहे जाते हैं , आप सभी अपने वंशजों की रक्षा सुरक्षा करते आ रहे हैं अतः आपसे प्रार्थना करता हूं कि इस तरह का छल – कपट मन में कभी भी न आने पाए, ऐसी कृपा बनाए रखना। क्योंकि निस्वार्थ जीवन अगले जन्म के लिए लाभ दायक है। “कम खाने व गम खाने से” आज तक कोई मरा नहीं, यह भी आपकी ही शिक्षा थी ।

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*यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन: ।*
*स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ।।*

मानव का जीवन कष्ट प्रद है पर किसी का भाग्य परमार्थ में अर्पित होता है तो कोई अपने भाग्य में स्वार्थ लिखा कर लाया है, यहां जितना अधिक कष्टमय जीवन व्यतीत होगा उतना प्रभावी जन्म अगला हो सकेगा यह सुनिश्चित है। एक कुत्ते के जीवन से कुछ सीखा या समझा जा सकता है। आलीशान बंगले में रहता है, लाखों की गाड़ी में घूमता है, पचास रुपए का बिस्किट खाता है, शायद पूर्व जन्म में अर्पित सम्पत्ति है उसकी, पर उस जन्म में कुछ थोड़ी सी भूल हुई होगी, जिससे मानव नहीं श्वान की देह मिली।

अतः जितना दु:ख होगा तो अगला जन्म सुधरेगा। 15- अक्टूबर सन् 1929 को अवतरित आपका बचपन बिना मां के साए में व्यतीत हुआ, केवल और केवल अपने दुर्भाग्य को ही कोस कर जीवन व्यतीत किया पर सत्य एवं ईमानदारी के मार्ग को नहीं छोड़ा संसार असार है यहां की यात्रा कष्टप्रद है। इस कंटका कीर्ण मार्ग पर जो चल सका वही बादशाह है।

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आपने इस मार्ग पर चलते-चलते अनेक पड़ाव देखे पर कभी हार नहीं मानी। आपके तथाकथित अपनों ने भी आपका सहयोग आवश्यक नहीं समझा, पर ईश्वर की कृपा सदैव ईमानदारी पर टिकी हुई थी, ईश्वर सदैव छल कपट से रहित व्यक्ति की सहायता करता है, भले ही मानव को इसे समझने में समय लगता हो। ” जाको राखे साइयां मार सके ना कोई “। आज इस श्राद्ध पक्ष में आपको भावभीनी विनम्र श्रद्धांजलि के साथ कोटि-कोटि नमन व श्रद्धासुमन ही सादर समर्पित कर सकता हूं । सादर प्रणाम – और इस जन के पास है भी क्या ? ? ?* *सबके मंगलमय जीवन की शुभकामनाओं के साथ , शायद –

*नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा: त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।*
*स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनं तव ।।*
इस जन को पूर्ण विश्वास है कि —
*यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर: ।*
*तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्धुवा नीतिर्मतिर्मम ।।*

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