फायर सीजन: वनाग्नि (दावानल) और निजात, यथासमय सतर्कता जरूरी

    पहाड़ों में आग से जलते जंगल और आसरे के लिए भटकते जीव-जंतु  


     

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    विगत वर्ष कई दिनों तक सुरकंडा के चारों तरफ जंगल आग से धू-धू करके जलते रहे। जंगल की आग इतनी विकराल रूप धारण किए हुए थी कि स्थानीय लोग जान हथेली पर करके आग को काबू करने के लिए प्रयासरत रहे। जड़धार गांव के आसपास भयंकर आग लगी थी। जिसे स्थानीय लोगों ने बमुश्किल नियंत्रण में किया। वन विभाग की ओर से भी आग बुझाने की कोशिश की गई लेकिन यह ऐसा है जैसे कि भूसे के ढेर पर लट्ठ मारना था।

    वर्षों से गर्मियों के सीजन में छुटपुट आग लगती है लेकिन  कभी-कभी यह विकराल रूप धारण कर देती है और खरबों की संपत्ति को पलक झपकते हुए ही भस्म कर देती है। करोड़ों की संख्या में वन संपदा के अलावा दुर्लभ जड़ी बूटियां, बेशकीमती वनस्पति, पशु पक्षी, कीट पतंग जल करके समाप्त हो जाते हैं।

    विगत वर्ष सुरकंडा पर्वत के दोनों ओर एक तरफ खुरेत -पुजाल्डी तो दूसरी ओर सकलाना के जंगलों में लगी आग के कारण  वन राख हो गए थे।बड़ी संख्या में स्थानीय निवासियों ने सुबह से ही आग बुझाना शुरू किया और हर पल सतर्क रहे। सकलाना रेंज के अधिकारी और कर्मचारी भी मौके पर आए थे लेकिन तब तक जंगल बड़ी मात्रा मे खाक हो गया था।

    मैने स्वयं सकलाना रेंज के वन क्षेत्राधिकारी से संपर्क किया था। उन्होंने त्वरित कार्रवाई करते हुए वनकर्मियो को भेजा लेकिन आग इतनी प्रचंड थी कि वहां तक पुहुचना मुश्किल था। एस. डी. ओ. भी मौके पर थे। स्थानीय लोग जंगल तो नहीं बचा सके लेकिन अपने घर, छानियां बचाने मे सफल रहे थे।

    पृथ्वी के पंचभूत तत्व जीवन के आधार हैं । यही पंचभूत तत्व मानवीय लापरवाही तथा माननीय बुराइयों के कारण जीवन के विनाश का कारण भी हैं । केवल मनुष्य के जीवन का ही नहीं बल्कि प्राणी जगत के विनाश का भी कारण हैं। सृष्टि का विकास आग, हवा, पानी, आकाश और पृथ्वी जैसे तत्वों से हुआ है और इन्ही से महाप्रलय आता है। संपूर्ण सृष्टि के विनाश का प्रतीक है। संसार का अंत या तो पानी से होता है या तो आग से। प्राकृतिक आपदाओं का कारण भी कुछ हद तक मानव है।

    हर समय जो चारों तरफ भयंकर आग लगती है, वह प्राकृतिक नहीं बल्कि मानव जनित है। यह आग स्वयं नहीं लगती है बल्कि लगाई जाती है। आग लापरवाही के कारण नहीं बल्कि मानवीय शरारत और धृष्टता के कारण विकराल रूप धारण करती है।

    सरकार और विभाग का तो कहना ही क्या है ! उनके पास कोई ठोस नीति न होने के कारण केवल आपदा के समय ही हाथ-पांव मारने की  आदत है।

    बसंत आगमन से पूर्व हमेशा अपनी बात तथ्यात्मक रूप से सम्मुख रखता हूं। अफसोस है! बड़े कानो तक बात आज तक कभी नहीं पहुंची है। अपना नैतिक कर्तव्य समझते हुए आज  पुनः प्रत्यास्मरण करा रहा हूं।

    •  गर्मियों का सीजन आने से पूर्व ही सरकार, प्रशासन और विभाग को चाहिए क्या स्थानीय लोगों के साथ मिल बैठकर ग्राम पंचायत स्तर पर बैठक रखी जाए। जानकार लोगों को उस में आमंत्रित किया जाए। सुझाव लिए जाएं और एक ठोस नीति बनाई जाए। इसके लिए बेरोजगार स्थानीय युवाओं को तीन महीने के लिए स्वयं सेवी वन रक्षक रखा जाए और उन्हें उचित मानदेय दिया जाए। प्रत्येक ग्राम पंचायत स्तर पर अगर पांच दस स्वयंसेवी सदस्यों की 03 महीने के लिए नियुक्ति की जाए और जवाबदेही भी सुनिश्चित की जाए तो यह समस्या का समाधान हो सकता है।
    • जंगलात की सड़कों और संपर्क मार्गों का निर्माण किया जाए निर्माण किया जाय ताकि आग  के समय पर कार्यवाही हो सके। फायर ब्रिगेड,पानी की गाड़ी या कर्मचारी लोग भी आग बुझाने शीघ्रातिशीघ्र पहुंचेगे।
    • वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी फायर सीजन पर मौके पर रहे और स्थानीय लोगों से मदद की गुजारिश भी करें। बिना जनसहयोग के यह संभव नही है।
    • पतझड़ सीजन के तुरंत बाद लाइन काट दें ताकि आग लगने की स्थिति में एक छोटे से भू-भाग में ही नुकसान हो, न कि संपूर्ण जंगल जलकर का तबाह हो जाए।
    • यथा समय जन जागरूकता कार्यक्रम भी चलाए जाएं तथा कार्यवाही धरातल पर हो न कि केवल कागजों पर।
    • जागरूक लोग, जड़ धार गांव के निवासियों की तरह ,जंगल को पुत्रवत माने। जंगल को पनपाएं, संरक्षण करें और आग लगने की स्थिति पर एकजुट होकर  जंगल को बचाने का भी कार्य करें न कि तमाशबीन बने रहें।
    • मातृशक्ति करुणामय और अधिक संवेदनशील हैं, भूल कर भी इस समय घास के लालच में आड़े न लगाएं।
    • जंगल में आग लगने पर वन विभाग कर्मचारियों को भी सूचित करें।
    • बुजुर्ग, रोगी और बच्चे जंगल की आग बुझाने का दुस्साहस न करें, इससे काम करने वालों को भी परेशानी होती है और एकाग्रता हटती है।
    • जंगलात भी आधुनिक तकनीक अपनाए। पुराने ढर्रे में बदलाव करे। जागरूक लोगों से सहयोग ले। अखबारों में विज्ञापन प्रकाशित कर देने से फर्क तो पड़ता है किन्तु आग नहीं बुझती है। जन सहयोग, जंगल तक पंहुच, संम्पर्क मार्ग भी जरूरी हैं।इसलिए समयबद्ध कार्य योजना बने और क्रियान्वयन हो।
    • जंगल बचाएं – जीवन बचाएं।

    @कवि:सोमवारी लाल सकलानी, निशांत