कुदरत को गुलाम बनाने की कुचेष्टा का परिणाम कयामत है

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    कुदरत को गुलाम बनाने की कुचेष्टा का परिणाम कयामत है
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    कुदरत को गुलाम बनाने की कुचेष्टा का परिणाम कयामत है

    कुदरत को गुलाम बनाने की कुचेष्टा का परिणाम कयामत है। ऋतु चक्र बदलता है। मानसून प्रतिवर्ष आता है। हां, कभी विलंब से तो कभी थोड़ा जल्दी आ जाता है। मानसून सृष्टि के विकास में मील का पत्थर है। शश्य-श्यामला भूमि के लिए एक नियामक है। यदि मानसून रुठ जाए तो विप्लव निश्चित है। होश संभालने के बाद छ: दशकों से मैं मानसून का साक्षी रहा हूं। कभी अधिक बारिश होती है तो कभी न्यूनतम। कभी बादल कहर बरपाते हैं तो कभी रिमझिम बारिश की बौछारें धरती का श्रृंगार करती हैं। यह भौगोलिक घटनाक्रम है और प्रकृति प्रदत्त है।

    @सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’

    मानवीय कुचेष्टाओं के कारण काफी कुछ परिदृश्य बदल चुका है। कुछ दशकों से जब मानसून आता है तो कयामत साथ में लेकर आ रहा है। जहां सावन के झूले पड़ते थे ,क्षेत्र हरीतिमा से अनुरंजित हो जाते थे, नदियों में उफान आने के बावजूद विहंगम दृश्य देखने को मिलता था, वहीं आज मानसून अभिशाप बनता जा रहा है। मूलभूत तत्वों की ओर किसी का ध्यान नहीं। बस! केवल एक ही रट रटाया वाक्य सब के मुंह में है,”जलवायु परिवर्तन” का प्रभाव है।

    अरे भाई, जलवायु का प्रभाव तो पड़ता ही है लेकिन क्या मानवीय प्रभाव पर भी कभी विहंगम दृष्टि डाली? मानसून की पहली ही बारिश में भूस्खलन, लैंडस्लाइडिंग, खेत- खलियान रावाड-पट्ट, घाटियों में बाढ़ की स्थिति, निचले क्षेत्रों में तबाही का दृश्य! इन सब बातों का कारण क्या है? पूर्ण रूप से मानव इसके लिए उत्तरदाई है।

    विकास की अंधी होड़ में पागल होकर, अनियोजित विकास का जो दृश्य सामने आ रहा है, उसी की है यह परिणीति। शहरों में कंक्रीट के मकान बनते थे और मानसून में प्रभावित भी लोग होते थे लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों में हमारे गांव इलाकों का परिदृश्य अनुपम था और आसानी से मानसून की भयानक बारिश को झेल लेता था। घास- फूस की छानियां होती थी। लकड़ी और सिलेट के मकान होते थे। टप-टप करके पानी की बूंदे जमीन में समा जाती थी।

    वन बहुल क्षेत्र होने के कारण पानी की बौछारें, पेड़ों की पत्तियों से टपक कर जमीन में गिरती थी और माटी में समाकर असंख्य जलस्रोत रिचार्ज होते थे। स्वच्छ सदानीरा नदियां बहती थी। पूरे वर्ष भर हमारे जल स्रोत सूखते नहीं थे और कहीं भी भारी भूस्खलन, लैड स्लाइड, अपरदन की स्थिति नहीं आती थी। घाटी के क्षेत्रों में हमारे घट चलते थे।

    धान के लहराते हुए खेतों में सोना उगलता था। सावन के पूरे मास में मंडुवा,रागी,दलहन और सांवे के क्षेत्रों की गुड़ाई होती थी। पशुधन की भरमार होने के कारण वन-जंगल से लेकर गांव-गुठ्यार तक, वनस्पतियों और कृषि उत्पादों के लिए गोबर उपलब्ध होता था। पशुओं के चुगान के लिए विस्तृत घास के मैदान थे। इसलिए एक समरस प्रकृति चक्र था जिसे हमने समाप्त कर दिया।

    मनरेगा और सुनिश्चित रोजगार की योजनाएं आने के बाद गांव- गांव में पक्के रास्तों का निर्माण हुआ। घर-गांव में आर्थिक संसाधन बढ़ जाने के कारण पक्के भवनों का निर्माण हुआ। जगह-जगह सड़क के किनारे निर्जन स्थानों में भी कस्बे और शहर फलने- फूलने लगे। लेकिन पानी की निकासी की समुचित व्यवस्था करने के बजाए अनेक अवरोध उत्पन्न किए गए, जिनका खामियाजा मानसून के समय लोगों को झेलना पड़ता है।

    मानसून की एक ही वर्षा तबाही का मंजर उत्पन्न कर देती है। कंक्रीट की छतों का पानी, पक्की नालियों का पानी, पक्के रास्तों का पानी, सड़कों का पानी, इकट्ठा होकर सैलाब उत्पन्न करता है और मचाता है तबाही! घाटियों व निचले क्षेत्रों में सर्वाधिक प्रभावित होते हैं- गरीब लोग और किसान जो रोजी- रोटी के लिए आज भी खेती-बाड़ी पर आश्रित हैं। गांव में रहते हैं और कहीं न कहीं भारतीय अर्थव्यवस्था की रीड को मजबूत करते हैं।

    भारतीय ही नहीं, संपूर्ण विश्व में मानसून के समय तबाही का दृश्य दिखाई देता है। कहीं अमेरिका में गाड़ियां डूब रही हैं, कहीं चीन में विप्लव का दृश्य है, कहीं जापान समुद्र में समाया जा रहा है, कहीं पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन के कारण सैकड़ों जानें जा रही हैं, कहीं केदारनाथ जैसी आपदाओं को न्योता दिया जा रहा है। इन सब उदाहरणों के बावजूद भी हम चेतना शून्य,कथित विकास के संसार में जी रहे हैं। हम वैज्ञानिकों के द्वारा बताए गए सिद्धांतों पर ही घोटा लगाए जा रहे हैं और संवेदनहीन होते जा रहे हैं।

    प्रत्येक व्यक्ति का नैतिक कर्तव्य है कि यदि क़यामत से धरती को बचाना है तो हकीकत में वृक्षारोपण करें, न कि आंकड़ों का खेल खेलें। एक पेड़ को लगाने के लिए 50 लोग फोटो खिंचवा कर सोशल मीडिया में डाल दें, या जंगलात विभाग भी रस्म अदायगी कर दे, या वृक्षारोपण के नाम पर करोड़ों रुपए का वारा-न्यारा हो जाए,यह चीजें कयामत से नहीं बचा सकत हैं।

    अगर जीने के लिए हमें सुंदर धरती मिली है तो सब का कर्तव्य है कि मिलकर इसे स्वस्थ बनाएं। वृक्षों को बचाइए। वृक्ष लगाएं और वृक्षों का संरक्षण करें। प्राकृतिक अधिवास की तरफ मुड़े। पक्के रास्ते या निर्माण कार्य करने हैं तो उसके लिए निकासी की समुचित व्यवस्था हो। सड़कों के किनारे जगह-जगह नारदाने या पानी की निकासी के लिए सुनिश्चित स्थान हो। पशुधन का विकास हो और परंपरागत खेती पर भी ध्यान दिया जाए। झंकड़ा जड़वाले वृक्षों का रोपण किया जाए।

    जंगलों का कटाव तभी के आ जाए जबकि यह बहुत जरूरी हो। नदियों,नाले- खालों का अतिक्रमण हटाया जाए और कमोबेश प्रकृति को उसके असली रूप में रहने दिया जाए। मानवीय कुरूप चेष्टाओं पर प्रतिबंध लगे और प्रकृति के विनाशकारी मानव तत्वों को दंडित किया जाए। इसी में हमारा मोक्ष छुपा है।

    ब्रह्मांड की घटनाओं में भी कमोबेश परिवर्तन होता रहा है। हम अपनी बुद्धि पर इतना नहीं इतरायें कि ब्रह्मांड की गतिविधियों को गुलाम बनाने की कोशिश करने लग जांए। ज्ञान के विकास के द्वारा कुछ नियंत्रण किया जा सकता है। मानव समुचित रक्षा प्रणाली उत्पन्न कर सकता है लेकिन ब्रह्मांड को अपने ढंग से चलाने की कोशिश करना मनुष्य की भूल होगी।

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