भूलकर भी न करें इस दिन चंद्रदर्शन! लग सकता है बहुत बड़ा मिथ्या कलंक, यदि अचानक हो जायं तो करें यह उपाय…!

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भूलकर भी न करें इस दिन चंद्रदर्शन! लग सकता है बहुत बड़ा मिथ्या कलंक, यदि अचानक हो जायं चंद्रदर्शन तो करें यह उपाय…!

आज भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (कलंक चतुर्थी) है, इस दिन चन्द्रमा के दर्शन (चंद्रदर्शन) होने से मिथ्या कलंक लगता है, पर यदि चतुर्थी तिथि में चन्द्र उदय होकर पंचमी तिथि में अस्त होता है तब इस सिद्धिविनायक व्रत के दिन चन्द्र दर्शन होना दोष कारक नहीं होता है। यदि चन्द्रमा अस्त होते समय चतुर्थी तिथि में है तो अशुभ व दोष कारक है।

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इस बार ऐसा ही है कि अस्त होते समय चन्द्रमा चतुर्थी तिथि में है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि को सिद्ध विनायक चतुर्थी के नाम से जाना जाता है , परन्तु इस तिथि को चन्द्र दर्शन निषेध है, अतः ऐसी सावधानी रखनी चाहिए कि इस दिन चन्द्रमा का दर्शन न हो। यदि दैववशात्  चन्द्र दर्शन हो जाए तो इस दोष के शमन के लिए इस मंत्र का पाठ करना चाहिए और स्यमन्तक मणि की कथा सुननी चाहिए या पढ़नी चाहिए।

 सिंह: प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हत:। सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तक:।।

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अतः स्वाभाविक है कि आज मन में यह विचार रहेगा कि आज चन्द्रमा का दर्शन नहीं करना है’ बार-बार’  इसका स्मरण करने से वह अवश्य देखा जाएगा।  ‘नहीं देखना है’   यदि यह बात याद ही नहीं रखी जाएगी तो चन्द्रमा नहीं दिखाई देगा, अतः इस बात को मन से हटाना ही होगा कि आज कलंक चतुर्थी है। ठीक उसी प्रकार जब तक हमारे मन में यह (मिथ्या,  अन्याय, द्वैष, क्रोध, असहिष्णुता, लोभ, बेईमानी, अशांति, भोग लालसा, विवाद की इच्छा, विषाद आदि) अशुभ विचार रहेंगे, तब तक हम पवित्र या सुखी जीवन नहीं जी सकते हैं।

अतः इनको हृदय से निकालना आवश्यक है। किसी भी तरह यदि हम इनको बार-बार स्मरण करते हैं तो ये कु-विचार मन में घर कर जाते हैं, प्रगाढ़ हो जाते हैं। फलत: हम जीवन में अच्छा कार्य नहीं कर सकते हैं। इसलिए मन से बुरी भावनाओं को हटाने की कोशिश करनी चाहिए। यदि मन में यह मिथ्या विचार आ जाएगा कि इस मकान में रात को भूत आता है तो भूत का डर लगने लगेगा व वहां रहना असम्भव ही नहीं दूभर होगा।

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इसी तरह अशुभ विचारों को मन से निकालने की दृष्टि से भी बार- बार उनका स्मरण होगा और अशुभ विचार मन से नहीं निकलेंगे। अतः शुभ विचारों का चिन्तन करने से अशुभ विचार स्वत: हट जायेंगे।

तो आइए! दृढ़ संकल्प लिया जाए कि हम आज से शुभ चिन्तन प्रारम्भ कर मन के विकारों को दूर करने का सद्प्रयास करें।

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आज गणेश चतुर्थी सिद्धविनायक व्रत है। आज से हमारे देश के अधिकांश भागों में गणेश महोत्सव प्रारम्भ होता है, आइए जानते हैं कि गणपति की पूजा अर्चना क्यों की जाती है, कुछ सामान्य जानकारी के साथ-

10  सितम्बर 2021 से 19 सितम्बर 2021 तक है श्री गणेश चतुर्थी एवं श्रीगणेश महोत्सव

सभी सनातन धर्मावलंबी प्रति वर्ष गणपति की स्थापना तो करते हैं लेकिन हममें से बहुत ही कम लोग जानते हैं कि आखिर हम गणपति क्यों बिठाते हैं ? आइये जानते हैं।

हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार, महर्षि वेद व्यास ने महाभारत की रचना की है। परन्तु लिखना उनके वश का नहीं था। अतः उन्होंने श्री गणेश जी की आराधना की और गणपति जी से महाभारत लिखने की प्रार्थना की।

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गणपति जी ने सहमति दी और दिन-रात लेखन कार्य प्रारम्भ हुआ और इस कारण गणेश जी को थकान तो होनी ही थी, लेकिन उन्हें पानी तक पीना भी वर्जित था। अतः गणपति जी के शरीर का तापमान बढ़े नहीं, इसलिए वेदव्यास ने उनके शरीर पर मिट्टी का लेप किया और “भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश जी की पूजा की”। मिट्टी का लेप सूखने पर गणेश जी के शरीर में अकड़न आ गई, इसी कारण गणेश जी का एक नाम पार्थिव गणेश भी पड़ा। महाभारत का लेखन कार्य 10 दिनों तक चला। अनंत चतुर्दशी को लेखन कार्य संपन्न हुआ।

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व्यास जी ने देखा कि, गणपति का शारीरिक तापमान फिर भी बहुत बढ़ा हुआ है और उनके शरीर पर लेप की गई मिट्टी सूखकर झड़ रही है, तो वेदव्यास ने उन्हें पानी में डाल दिया। इन दस दिनों में वेदव्यास ने गणेश जी को खाने के लिए विभिन्न पदार्थ दिए। तभी से गणपति बैठाने की प्रथा चल पड़ी। इन दस दिनों में इसीलिए गणेश जी को उनकी पसन्द के विभिन्न भोजन अर्पित किए जाते हैं।

गणेश चतुर्थी को कुछ स्थानों पर डंडा चौथ के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि गुरु शिष्य परम्परा के तहत इसी दिन से विद्याध्ययन का शुभारम्भ होता था। इस दिन बच्चे डण्डे बजाकर खेलते भी हैं। गणेश जी को ऋद्धि-सिद्धि व बुद्धि का दाता भी माना जाता है। इसी कारण कुछ क्षेत्रों में इसे डण्डा चौथ भी कहते हैं।

पार्थिव श्रीगणेश पूजन का महत्त्व “

अलग-अलग कामनाओं की पूर्ति के लिए अलग-अलग द्रव्यों से बने हुए गणपति की स्थापना की जाती हैं। यथा-

  1. श्री गणेश जी को मिट्टी के पार्थिव श्री गणेश बनाकर पूजन करने से सर्व कार्य सिद्धि होती है !
  2. हेरम्ब : गुड़ के गणेश जी बनाकर पूजन करने से लक्ष्मी प्राप्ति होती है।
  3. वाक्पति : भोजपत्र पर केसर के तिलक से श्री गणेश प्रतिमा का चित्र बनाकर पूजन करने से विद्या प्राप्ति होती है।
  4. उच्चिष्ठ गणेश : लाख के श्री गणेश बनाकर पूजन करने से स्त्री सुख और स्त्री को पतिसुख प्राप्त होता है घर में गृह क्लेश निवारण होता है।
  5. कलहप्रिय: नमक की डली या नमक के श्री गणेश बनाकर पूजन करने से शत्रुओं में क्षोभ उत्पन्न होता है वह आपस ने ही झगड़ने लगते हैं।
  6. गोबरगणेश: *गोबर के श्री गणेश बनाकर पूजन करने से पशुधन में वृद्धि होती है और पशुओं की बिमारियां नष्ट होती हैं (गोबर केवल गौ माता का ही हो)।
  7. श्वेतार्क श्री गणेश: सफेद आंक मन्दार की जड़ के श्री गणेश जी बनाकर पूजन करने से भूमि लाभ भवन लाभ होता है।
  8. शत्रुञ्जय: कडूए नीम की लकड़ी से गणेश जी बनाकर पूजन करने से शत्रुनाश होता है और युद्ध में विजय होती है।
  9. हरिद्रा गणेश: हल्दी की जड़ से या आटे में हल्दी मिलाकर श्री गणेश प्रतिमा बनाकर पूजन करने से विवाह में आने वाली हर बाधा नष्ट होती है और स्तम्भन होता है।
  10. सन्तान गणेश: मक्खन के श्री गणेश जी बनाकर पूजन करने से सन्तान प्राप्ति के योग निर्मित होते हैं।
  11. धान्यगणेश: सप्तधान्य को पीसकर उनके श्रीगणेश जी बनाकर आराधना करने से धान्य वृद्धि होती है अन्नपूर्णा माँ प्रसन्न होती है।
  12. महागणेश: लाल चन्दन की लकड़ी से दशभुजा वाले श्री गणेश जी की प्रतिमा निर्माण कर के पूजन करने से राज राजेश्वरी श्री आद्याकालिंका की शरणागति प्राप्त होती है।
गणेश चतुर्थी पूजन (पूजन मुहूर्त) :

गणपति स्वयम् ही मुहूर्त हैं। सभी प्रकार के विघ्नहर्ता हैं, इसलिए गणेशोत्सव गणपति स्थापन के दिन दिनभर कभी भी स्थापन कर सकते हैं। सकाम भाव से पूजा के लिए नियम की आवश्यकता पड़ती है इसमें प्रथम नियम मुहूर्त अनुसार कार्य करना हैं।

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मुहूर्त अनुसार गणेश चतुर्थी के दिन गणपति की पूजा दोपहर के समय करना अधिक शुभ माना जाता है,  क्योंकि मान्यता है कि भाद्रपद महीने के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को मध्याह्न के समय गणेश जी का जन्म हुआ था। मध्याह्न यानी दिन का दूसरा प्रहर जो कि सूर्योदय के लगभग 3 घंटे बाद शुरू होता है और लगभग दोपहर 12 से 12:30 तक रहता है। गणेश चतुर्थी पर मध्याह्न काल में अभिजित मुहूर्त के संयोग पर गणेश भगवान की मूर्ति की स्थापना करना अत्यन्त शुभ माना जाता है।

    ‘ पूजा की सामग्री सामान्य पूजन सामग्री जो प्राय: पूजन में जरुरत पड़ती है के अतिरिक्त — लाल फूल, जल कलश , लड्डू व दूब आवश्यक हैं।

सामान्य पूजा विधि

सकाम पूजा के लिये स्थापना से पहले संकल्प भी अत्यंत जरूरी है। गणपति भगवान को घर पर पधारने का निवेदन करें और उनका सेवाभाव से स्वागत सत्कार करने का संकल्प लें।

गणेश जी की प्रतिमा के सामने प्रतिदिन गणपति अथर्वशीर्ष व संकट नाशन गणेश स्तोत्रों का पाठ करना चाहिए।

और यह मंत्र उच्चारित करें-

  ॐ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटि समप्रभः। निर्विघ्नं कुरू मे देव, मम कार्येषु सर्वदा।।

चतुर्थी, चंद्रदर्शन और कलंक पौराणिक मान्यता:

गणेश चतुर्थी के दिन भूलकर भी चंद्रदर्शन न करें वर्ना आपके उपर बड़ा कलंक लग सकता है। इसके पीछे एक पौराणिक कथा का दृष्टांत है।

एक दिन गणपति चूहे की सवारी करते हुए गिर पड़े तो चंद्रमा ने उन्हें देख लिया और हंसने लगे। चंद्रमा को अपनी हंसी उड़ाते देख गणपति को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने चंद्रमा को श्राप दिया कि अब से तुम्हें कोई देखना पसंद नहीं करेगा। जो तुम्हें देखेगा वह कलंकित हो जाएगा। इस श्राप से चंद्रमा बहुुत दुखी हो गए। तब सभी देवताओं ने गणपति की साथ मिलकर पूजा अर्चना कर उनका आह्वान किया तो गणपति ने प्रसन्न होकर उनसे वरदान मांगने को कहा।

तब देवताओं ने विनती की कि आप गणेश को श्राप मुक्त कर दो। तब गणपति ने कहा कि मैं अपना श्राप तो वापस नहीं ले सकता लेकिन इसमें कुछ बदलाव जरूर कर सकता हूं। भगवान गणेश ने कहा कि चंद्र का ये श्राप सिर्फ एक ही दिन मान्य रहेगा।

इसलिए चतुर्थी के दिन यदि अनजाने में चंद्र के दर्शन हो भी जाएं तो इससे बचने के लिए छोटा सा कंकर या पत्थर का टुकड़ा लेकर किसी की छत पर फेंके। ऐसा करने से चंद्र दर्शन से लगने वाले कलंक से बचाव हो सकता है। इसलिए इस चतुर्थी को पत्थर चौथ भी कहते है।

भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी के चन्द्रमा के दर्शन हो जाने से कलंक लगता है। अर्थात् अपकीर्ति होती है। भगवान् श्रीकृष्ण को सत्राजित् ने स्यमन्तक मणि की चोरी लगायी थी।

स्वयं रुक्मिणीपति नेइसेमिथ्याभिशाप  – भागवत-१०/५६/३१, कहकर मिथ्या कलंक का ही संकेत दिया है। और देवर्षि नारद भी कहते हैं कि–

आपने भाद्रपद के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि के चन्द्रमा का दर्शन किया था जिसके फलस्वरूप आपको यह व्यर्थ ही कलंक लगा।

 त्वया भाद्रपदे शुक्लचतुर्थ्यां चन्द्रदर्शनम्।  कृतं येनेह भगवन् वृथा शापमवाप्तवान्।।

 तात्पर्य यह कि भाद्रपद मास की शुक्लचतुर्थी के चन्द्रदर्शन से लगे कलंक का सत्यता से सम्बन्ध ही हो–ऐसा कोई नियम नहीं है। किन्तु इसका दर्शन त्याज्य है । तभी तो पूज्यपाद गोस्वामी जी लिखते हैं—

तजउ चउथि के चंद नाई”-मानस. सुन्दरकाण्ड,३८/६,

स्कन्दमहापुराण में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि भाद्रपद के शुक्लपक्ष के चन्द्र का दर्शन मैंने गोखुर के जल में किया जिसके परिणाम स्वरूप मुझे मणि की चोरी का कलंक लगा।

 मया भाद्रपदे शुक्लचतुर्थ्याम् चन्द्रदर्शनम्।गोष्पदाम्बुनि वै राजन् कृतं दिवमपश्यता।।

यदि चतुर्थी का चंद्रमा दिख जाय तो कलंक से कैसे छूटें?

  1. यदि उसके पहले द्वितीया का चंद्र्मा आपने देख लिया है तो चतुर्थी का चन्द्र आपका बाल भी बांका नहीं कर सकता।
  2. अथवा भागवत की स्यमन्तक मणि की कथा सुन लीजिए।
  3. अथवा निम्नलिखित मन्त्र का 21 बार जप करलें –

सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः। सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः।।

  1. यदि आप इन उपायों में कोई भी नहीं कर सकते हैं तो एक सरल उपाय बता रहा हूँ उसे सब लोग कर सकते हैं । एक लड्डू किसी भी पड़ोसी के घर पर फेंक दें!

“गणपति की कृपा सभी लोगों पर बनी रहे यही शुभकामना है, उनकी पूजा अर्चना से किसी भी प्रकार का दु:ख व कष्ट नहीं होता है। बरावर श्री गणेश जी की पूजा अर्चना करते रहिए आपकी मनोकामना पूरी होगी।”  श्री गणेशाय नमः।

*ज्योतिषाचार्य हर्षमणि बहुगुणा,