कविता/कहानी Archives - सरहद का साक्षी
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कविता: दुर्बा का आंगन भी चांदनी चौक होगा !
कविता: दुर्बा का आंगन भी चांदनी चौक होगा !

कुहासा छंटेगा-विद्यालय  खुलेगा ! नया सबेरा-जगत मे फिर से होगा। हम मिल ना सकेंगे-शिक्षक रहेगा। बच्चों तुम्हारे उर निशांत सदैव होगा।                       कुहासा छंटेगा —– कुहासा छंटेगा-सूरज  फिर  उगेगा, प्राची क्षितिज पर किरण राज होगा। निखरेगी लालिमा-चहकेगी चिड़िया, आंगन में फिर से -भ्रमर राग भरेगा।                             कुहासा छंटेगा —— निशा जब खुलेगी, क्रीड़ायें बहुत होंगी, मुसाफिर जगेगा, नई राह पर चलेगा। बच्चों की आहट से वृद्ध जन जगेगा, शिशु किलकारियों से निकेतन फबेगा।                             कुहासा छंटेगा —— सूरज जब…

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कविता: देखो ! मेरा शिव सामने विराजमान…!

दे रहे हो नया जीवन, लक्ष-कोटि पर जीव को, स्याह तन पर बिठाए हरित प्रकृति प्राणियों को ! सड़ चुके हो वेदना से,चीर कल से तुम खड़े हो, जीवनदान देने के लिए,आज भी सबसे बड़े हो। प्रकृति ने तुमको बुलाया, साथ पाने के लिए था, पहाड़ पर्वत घाटियों ने तुम्हे अंक में भर दिया था। सैकड़ों वर्षों तलक , निस्वार्थ सेवा भाव भर कर, शुद्ध पानी पवन पत्ती, काष्ट मिट्टी दी दरख़्त तुमने। सूख कर सिमटे हो वन मे,…

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अमर शहीद श्रीदेव सुमन के बलिदान दिवस पर एक कविता: उठो सुमन तुम आंखें खोलो…!

उठो सुमन तुम आंखें खोलो, देखो , कौन जगाने आए हैं! हे त्रिहरि के महा बलिदानी, देखो! त्रिहरि से जननायक आए हैं। नीरस पतझड़ बीत चुका है,नव पल्लव मुस्कान भरी। भ्रमर राग मधु बयार संग ,धरती माता हरीत हुई। उठो! सुमन तुम आंखें खोलो, देखो ! कौन तुम्हें जगाने आए हैं। उत्तरपथ व्योम क्षितिज से, भानु ताप भर लाया है । घर बाग चमन आंगन में, अब हरियाली का आलम है। उठो मित्र ! इस चिर समाधि से, निशांत…

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कविता: मेरी जन्नत बच्चों की फुलवारी है…!

सरहद का साक्षी @कवि: सोमवारी लाल सकलानी, निशांत। मूर्ख की तरह चुप रहना ही अच्छा है। मुंह खोलूंगा तो लोग कहेंगे बूढ़ा सठिया गया! हृदय वेदना का ज्वार बढ़ता जा रहा है, लोग हंसेंगे कि दकियानूसी बूढ़ा बौराय गया ! लोग कुछ भी कहें लेकिन कवि बेचैन है। जिस घर में बूढ़े बच्चें न हों वह घर नहीं मकान है। ऐसे भवन में मैं कभी नहीं रहना चाहता हूं, जहां बूढ़े ,बच्चें,पुष्प,पशु ,खेत -खलियान आदि न हों! मैं धन…

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कविता: श्रावण मास है-सोमवार है, सोम सोम का संगम है…! बरस रहें हैं मेघ झमा-झम, बाहर निकलना दूभर है।

बरस रहें हैं मेघ झमा-झम, बाहर निकलना दूभर है, प्रकृति का लॉकडाउन यह, यह सावन का महीना है। काले भूरे नूतन बदरा, क्षितिज – नभ मंडल छाए थे, धरती माता सूखे आंचल में, अमृत रस भरने वाले थे। आस लगाए बैठा कृषक, नित निहार रहा था अंबर को, भावलोक में खोया प्राणी, तरस तड़फ रहा था पानी को। कृषक पुकार सुनी जलज ने, उड़ेल दिया अमृत पानी, ज्यों कवि हृदय की शुद्ध भावना, उत्पन्न राग ने है जानी। श्रावण…

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Posted in उत्तराखंड, कविता/कहानी Tagged Comments Off on कविता: श्रावण मास है-सोमवार है, सोम सोम का संगम है…! बरस रहें हैं मेघ झमा-झम, बाहर निकलना दूभर है।
घंटाकर्ण धाम श्री घंडियाल दर्शन कविता के रूप में…!

आज क्वीली पट्टी के डांडा घंडियाल देवता के मंदिर में दर्शन किए। सूबे के कृषि मंत्री श्री सुबोध उनियाल जी पूजा अर्चना कार्यक्रम में शामिल हुए। देवप्रयाग क्षेत्र के विधायक श्री विनोद कंडारी जी भी वहां मौजूद थे। 42 साल बाद अपने एक पूर्व मित्र श्री लाखी राम बिजलवाण जी से भी भेंट हुई। सपरिवार डांडा घंडियाल देवता के दर्शन करके मन अभिभूत हूँ और इसी पर चंद पंक्तियां प्रस्तुत कर रहा हूं। आशा है अच्छी लगेंगी। जय घंडियाल…

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कविता हरेला: लोक पर्व उत्तरांचल तरु मेला …!

सब चले ! मनाने आज हरेला, लोक पर्व उत्तरांचल तरु मेला। श्रावण मास -संक्रांति तिथि से , चले एक पखवाड़ा यह मेला। आज वृक्ष लगाने वालों का रेला। लगे ज्यों दीपावली के गढ़ भैला। वृक्षारोपण कार्य है बहुत जरूरी , है कोई नहीं यह चिंता – मजबूरी। एक पेड़ तुम भी अवश्य लगाओ, फिर जीवन भर पावन सुख पाओ। शुद्ध समीर ,जल छाया सुख पाओ, प्राणवायु संग मीठे कंद फल खाओ। विद्यालयों में भी आज पर्व हरेला , वृक्षारोपण…

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भू-कानून: कान खोलकर सुन लो दिल्ली, नींद से जागो देहरादून…!

अधिवक्ता श्री महावीर प्रसाद उनियाल, नई टिहरी कान खोलकर सुन लो दिल्ली, नींद से जागो देहरादून। देवभूमि की जनता अब के, मांग रही है “भू-कानून”।। ये देवभूमि तुमने बतलाओ, किसके हवाले छोड़ी है। कोई भी आकर बस जाए, ये “धर्मशाला” थोड़ी है।। देवभूमि का नौजवान, मुम्बई दिल्ली में भटक रहा। और यहां की सुख सुविधाएं, कोई और ही गटक रहा।। उत्तराखंड के लोगों को, ना शिक्षा ना रोजगार मिला। 20 साल से हम सबको क्यों, धोखा ही हर बार…

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