कविता/कहानी Archives - सरहद का साक्षी
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सरहद का साक्षी के लिए उत्तराखंड के सभी जनपदों व तहसीलों में पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य करने के इच्छुक युवकों की आवश्कता है: संपर्क करें: sarhadkasakshi@gmail.com

एक व्यंग हैं : पसंद आये तो एक स्माइल दीजियेगा

प्रस्तुति : हर्षमणि बहुगुणा, जिसने भी लिखा है, बहुत शानदार 👌लिखा👍 है।* *यह नदियों का मुल्क है,* *पानी भी भरपूर है।* *बोतल में बिकता है,* *बीस रू शुल्क है।* *यह गरीबों का मुल्क है,* *जनसंख्या भी भरपूर है।* *परिवार नियोजन मानते नहीं,* *जबकि नसबन्दी नि:शुल्क है।* *यह अजीब मुल्क है,* *निर्बलों पर हर शुल्क है।* *अगर आप हों बाहुबली,* *हर सुविधा नि:शुल्क है।* *यह अपना ही मुल्क है,* *कर कुछ सकते नहीं।* *कह कुछ सकते नहीं,* *जबकि बोलना नि:शुल्क…

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खौफ से बाहर कैसे निकलें

*निशिकांत ठाकुर पिछले दिनों मेरे सहयोगी रहे एक संपादक का फोन आया कि सुभाष चन्द्र बोस की जयंती है, आप यदि उनसे संबंधित लेख भेज दें तो अच्छा रहेगा। मुझे अच्छा लगा कि मुझसे जुड़ा हुआ मेरा कोई सहयोगी आज इस ऊँचाई पर पहुँच गया है और मेरा लेख प्रकाशित करना चाहता है। मैंने उसका अनुरोध स्वीकार तो कर लिया, लेकिन किसी के लिए जानना और उनके संबंध में तथ्यों के आधार पर व्यवस्थित लेखन अलग-अलग बातें है। चूँकि…

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आखिर में यह भी  नहीं रहेगा
आखिर में यह भी  नहीं रहेगा

प्रस्तुति: हर्षमणि बहुगुणा, एक साधु देश में यात्रा के लिए पैदल निकला हुआ था। एक बार रात हो जाने पर वह एक गाँव में आनंद नाम के व्यक्ति के दरवाजे पर रुका। आनंद ने साधु  की खूब सेवा की। दूसरे दिन आनंद ने बहुत सारे उपहार देकर साधु को विदा किया। साधु ने आनंद के लिए प्रार्थना की  – “भगवान करे तू दिनों दिन बढ़ता ही रहे।।         साधु की बात सुनकर आनंद हँस पड़ा और बोला – “अरे,…

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कश्मीर में ताकत दिखाते

डॉ दलीपसिंह बिष्ट लाल किले की प्राचीर पर, तलवारें घुमाते तब क्यों चुप थे। जब कश्मीर में आतंकी, पण्डितों का नरसंहार कर रहे थे।। लाल किले पर झंडा फहराने वालों, कभी ऐसी हिम्मत तो दिखाते। लाल चौक कश्मीर में तिरंगा फहराने का, कभी साहस तो जुटाते।। गणतन्त्र पर शेर बनकर, जो अपनो को धमकाते हैं। कश्मीर के पत्थरबाजों को तो, कभी आँख दिखाते।। भुजाओं में इतना दम था तो, कभी सीमाओं पर जाकर दिखाते। जवानों के खून से लाल…

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बेटी का सम्मान करें

“बालिका दिवस पर विशेष “  डॉ दलीपसिंह बिष्ट बेटा-बेटी में न फर्क करें, दोनों का पूरा सम्मान करें। सिक्के के दो पहलू है, दोनों को बराबर प्यार करेें।। बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ, यह नारा नही सम्मान है। यह बात हम सबको मिलकर, समाज को समझाना है।। बेटी होगी तो बचेगा समाज, उसके बिना न करें आस। बेटा-बेटी दोनों है समान, इसी से बनेगा देश महान।। बेटी के प्रति बदलें मिजाज, भूर्ण हत्या से आये बाज। सृष्टि की वह रचयिता…

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विश्वगुरू की ओर अग्रसर भारत

पराक्रम दिवस पर विशेष डा. दलीपसिंह  विश्वगुरू की ओर, अग्रसर होता बिष्टभारत। विश्व शक्ति के रूप में, उभरता भारत।। सब जगह मोदी ने, देश का गौरव बढाया। दुनिया में सब जगह, परचम फहराया।। आत्मनिर्भरता की ओर, बढ़ता भारत। देश दुनिया में, साख बढ़ाता भारत।। नभ, जल, थल में, बढ़ती ताकत। अंतरिक्ष में धाक, जमाता भारत।। दुनिया में देश का, सम्मान बढाया। अपनी ताकत का, एहसास कराया।। अमेरीका बोले मोदी-मोदी, रुस कहे मोदी-मोदी। फ्रांस, ब्रिटेन दुनिया में, सब कहें मोदी-मोदी।।…

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ये ज़िन्दगी है यहां दर्द छुपा कर भी मुस्कुराना पड़ता है

प्रस्तुति: हर्षमणि बहुगुणा, ये ज़िन्दगी है, यहां दर्द छुपा कर भी मुस्कुराना पड़ता है । यहां शरीफ़ लोगों को जीने कहां देते हैं । कभी – कभी बुरा भी बन जाना पड़ता है ।  झूठ भी बोलना पड़ता है , सच भी छुपाना पड़ता है , जिन्दगी जीने के लिए, हर रास्ता अपनाना पड़ता है , खामोशियां बेवजह नहीं होती – कुछ दर्द, आवाज छीन लिया करती हैं –  दिल तो रोज कहता है कि, मुझे कोई सहारा चाहिए…

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पुराने अखबार की एक कतरन: व्यंग्यबाण हैं या साधारण
chaunkaane vaalee hai “tvamev maata ch pita tvamev” shlok kee gambheerata

प्रस्तुति: हर्षमणि बहुगुणा पुराने अखबार की एक कतरन मिली जिसमें ललित शौर्य की यह रचना छपी थी । व्यंग्यबाण हैं या साधारण आप स्वयं तय कीजिए।  ” *हमने सुबह-सुबह नेता जी को* *टहलते हुए देखा* *उनके माथे में उभरी थी* *चिन्ता की रेखा ।* *हमसे रहा नहीं गया* *यह दृश्य देखकर सहा नहीं गया* *हमने नेता जी से पूछा* *माथे पर चिंता की लकीरें क्यों ?* *खींच ली हैं* *चलते हुए अचानक ये आंखें क्यों ?* *मीच ली हैं*…

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बुढ्यों की दशा

  डा. दलीप सिंह बिष्ट गौं ह्वेगी खंडवार, पूड़ी बजरताल। सब्बी चलगी उद्दा, तब ह्वेन इना हाल।। बुढया ब्वे-बाबा गौंमा, यखुली रैगी। उंकी सुणदारु, क्वी नी रैगी।। बूढ-बुढ्या अफुमा, छ्वी लगांदा। एक-दूसरै की, व्यथा सुणादा।।  सब्बी भीतरु लग्या, नौनौ का ताळा।  ब्वे-बाबा याक, कोणा पर स्याणा।। जू अफूक खाणू, नी बणै सकदा प्येणू। द्वार खौन्नै की, हिम्मत कखान ह्वाण। दादा-दादी, बढा-बड़ी, चाचा-चाची युथौ घरवार।  हम द्वी, हमारा द्वी, अब ऐकैं छन बुन्ना परिवार।। देशू बीटि घौर, डाळी-बुटळोंकैं औणा। घास खल्याकू,…

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गुरु के स्थान का महत्व
आखिर में यह भी  नहीं रहेगा

प्रस्तुति : हर्षमणि बहुगुणा  एक राजा को पढ़ने- लिखने का बहुत शौक था । इसलिए उसने एक शिक्षक की व्यवस्था की व पढ़ना शुरू किया । गुरु जी अत्यधिक प्रखर, ज्ञानी, कर्मठ व सुयोग्य शिक्षक थे किन्तु बहुत दिनों की शिक्षा के बाद भी राजा को कुछ भी ज्ञान अर्जित नहीं हो सका । इससे राजा को बहुत पीड़ा हुई परन्तु अपनी व्यथा किससे कहता , जब इस बात की चर्चा रानी से की तो रानी ने सुझाया कि…

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