साम्यवादी विचारधारा का उज्जवल नक्षत्र हुआ अस्त, नहीं देख पाया रूस-यूक्रेन के बीच जंग की त्रासदी

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शिक्षक से शिक्षक नेता और साम्यवादी विचारक बच्ची राम कंसवाल के देहावसान से एक युग का अंत

तीन दिन पूर्व कॉमरेड बच्चीराम कंसवाल जी का निधन हो गया था। सोशल मीडिया पर उनके जानने वालों ने हजारों पोस्ट शेयर की। अनेक विचार उनके बारे में पढ़ने को मिले। यदि अपना कोई चिर परिचित व्यक्ति आंखों से ओझल हो जाए तो उस पीड़ा की तस्वीर मस्तिष्क मे ज्वार भाटे की भांति उमड़ती रहती हैं।

[su_highlight background=”#880e09″ color=”#ffffff”]सरहद का साक्षी @कवि:सोमवारी लाल सकलानी, निशांत[/su_highlight]

स्वर्गीय श्री बच्चीराम कंसवाल हमारे क्षेत्र सकलाना समय-समय पर आते रहे। कॉमरेड अमर शहीद नागेंद्र सकलानी जी की पुण्यतिथि 11 जनवरी को अक्सर वे स्वर्गीय विद्यासागर नौटियाल आदि लोगों के साथ श्रद्धांजलि देने स्मृति वन में आते थे और फिर होती थी एक वैचारिक गोष्टी। पढ़े जाते थे कॉमरेड नागेंद्र की स्मृति में अनेकों आख्यान। अपने क्षेत्र से अनेकों विचारक और बुद्धिजीवी बिना किसी दलगत भावना के नागेंद्र सकलानी राजकीय इंटर कॉलेज पुजार गांव (सकलाना) में एकत्रित होकर संगोष्ठी में शिरकत करते थे। क्षेत्रवासियों को उस क्रांति के इतिहास से रू-ब-रू कराते थे, जिनके बलिदान से आज भी सकलाना का मान और सम्मान बढ़ जाता है।
स्वर्गीय बच्चीराम कंसवाल जी उन्हीं में से एक थे। प्रखर विचारक, स्वाभिमानी, शिक्षक से शिक्षक नेता और साम्यवादी विचारधारा से ओतप्रोत एक ऐसे व्यक्तित्व थे, जो मरने के बाद भी अमर हो गए।
मुझसे उम्र में 30 वर्ष बड़े होने के कारण लगभग 40 वर्षों से ही उनके साथ परिचय रहा। देहरादून में कभी किसी पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में या सेवाकाल में जब कभी उनके गांव मरोड़ा अपने मित्र श्री प्रभुलाल डोभाल जी के यहां जाना होता था तो स्वर्गीय कंसवाल जी से भेंट करना लाजमी था।
यूं तो साम्यवादी विचारधारा के लोग अक्सर विचारक, बुद्धिमान, विलक्षण, जिद्धी और जीवट देखे हैं। हमेशा धारा के विपरीत चलने वाले होते हैं। तुष्टीकरण उनसे बहुत दूर होता है। चाहे वह स्वर्गीय जगतराम सेमवाल हों या विद्यासागर नौटियाल। गोविंद सिंह नेगी हो या फिर स्वर्गीय बच्चीराम कंसवाल।
स्वर्गीय बच्चीराम कंसवाल के बारे में बचपन से ही चर्चाएं होती थी। जब शिक्षक के रूप में वह राजकीय सेवा में कार्यरत थे तो उस समय तीन नाम बहुत चर्चित थे। मेरे गांव के और नाते के दादाजी स्वर्गीय चेतन प्रसाद सकलानी, स्वर्गीय कृष्ण सिंह नेगी और (अब स्वर्गीय) बच्चीराम कंसवाल। शिक्षकों के स्वाभिमान की रक्षा के लिए उन्होंने कभी समझौता नहीं किया और शिक्षक होते हुए भी शिक्षकों के स्वाभिमान की रक्षा के लिए पद के प्रलोभन को त्याग कर सेवा की। शिक्षकों के हितों की लड़ाई में स्वर्गीय बच्ची राम कंसवाल मील के पत्थर हैं।
तत्कालीन सरकारों ने उनका उत्पीड़न भी किया और जब आवागमन के साधनों का अभाव था तो दूरस्थ क्षेत्र झांसी तक उनका स्थानांतरण कर दिया। बाद मे उन्होंने सरकारी नौकरी ही छोड़ दी थी। उनके कई सहयोगियों के साथ मैंने शिक्षण कार्य किया।
लगभग 90 वर्ष की उम्र में शरीर त्यागना भी एक उपलब्धि है। स्वर्गीय बच्ची राम कंसवाल महाभारत के भीष्म की तरह तिल- तिलकार दिए की लौ की भांति जलते रहे। वह कभी परिस्थितियों के गुलाम नहीं रहे। बल्कि उन्होंने परिस्थितियों को अपने अनुकूल ढा़ला। यह अलग बात है कि भले ही उन्हें राजनीति में वह स्थान नहीं मिल पाया जो मिलना चाहिए था।
ओजस्वी, प्रखर वक्ता और व्यक्तित्व के धनी स्वर्गीय बच्ची राम कंसवाल आम व्यक्ति के साथ अत्यंत सरल और निश्चल भाव से प्रेम करने वाले थे। प्रख्यात साहित्यकार आदरणीय सोमवारी लाल उनियाल ‘प्रदीप’ जी के साथ उनकी मित्रता होने के कारण, वह भी समय-समय पर बच्चीराम कंसवाल जी को अपने द्वारा आयोजित कार्यक्रमों, चाहे वह पुस्तक विमोचन हो या शहीदों को श्रद्धांजलि।कवि सम्मेलन या कोई अन्य सामाजिक कार्य,उन्हें अवश्य आमंत्रित थे। समय अभाव के बावजूद भी स्वर्गीय कंसवाल शिरकत करते थे।
अब जब स्वर्गीय कंसवाल दुनिया से चले गए हैं, उनके विचार आज भी आने वाली पीढ़ी के लिए स्वाभिमान का प्रतीक होंगे। विचारधाराएं भिन्न हो सकती हैं लेकिन असली व्यक्तित्व ही होता है जो विचारधाराओं से घालमेल न करते हुए भी समूह में अपने आप में अलग दिखे।और समूह के साथ मे भी रहे। इन्हीं शब्दों के साथ एक बार पुनः स्वर्गीय बच्ची राम कंसवाल को विनम्र श्रद्धांजलि।