आचरण: माता-पिता के साथ श्रेष्ठ, ज्येष्ठ, गुणी एवं साधु- सन्तों के आदर करने में जीवन का मंगल है 

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मानहिं मातु पिता नहिं देवा, साधुन्ह सन करवावहिं सेवा।

जिन्ह के यह आचरन भवानी, ते जानेहु निसिचर सब प्रानी।

रामचरितमानस मे निशिचरों अर्थात् असुरों की पहचान बताते हुए बाबा गोस्वामी तुलसीदास जी बताते हैं कि जो मानव अपने माता पिता को ईश्वर तुल्य नहीं मानते या समझते तथा साधुओं एवं सज्जन पुरुषों (की सेवा करना तो दूर, उल्टे उनसे) सेवा करवाते हैं, ऐसे आचरण के सब प्राणियों को राक्षस ही समझना चाहिए।

मनुष्य जीवन इस सृष्टि की सबसे श्रेष्ठ रचना है इसको इतनी अधिक सुविधाये और शक्तियॉ इसलिये दी गयी हैं, ताकि वह अपने सत्कर्मों से इस विश्व-उद्यान को सुंदर, सभ्य, सस्कारीं तथा खुशहाल बनाने में अपनी जिम्मेवारी का निर्वहन ठीक व सही प्रकार से कर सके।
लेकिन आज का अधिकांश मानव संयम-सेवा, विनम्रता सहनशीलता प्रेम-सद्भाव, सहानुभूति तथा सज्जनता को छोडकर दूसरो को पीड़ा और दु:ख-दर्द देने में लगा है और तो और जिन माता-पिता ने जन्म दिया उनकी सेवा करने के बजाय उनको अनाथ-आश्रम भेजने पर आमादा हैं, यह स्थिति किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं है और न उचित ही है।
अत: हे मानव अपनी जिन्दगी की सुख- शांति और सफलता के लिये अपनी वर्तमान स्थिति पर विचार कर इसको बाह्य आडम्बरों तथा बरबादी और सर्वनाश से बचाने का निरतंर प्रयास करे। क्योंकि-

बड़प्पन का नशा सभी व्यसनों से सबसे बुरा नशा माना जाता है।

इसलिये सादा जीवन-उच्च विचार के रास्ते पर चलते हुये अपने माता-पिता के साथ-साथ अपने से श्रेष्ठ, ज्येष्ठ, गुणी एवं साधु- सन्तों का भी आदर करने का प्रयास किया करें, इससे आपका मंगल ही होगा।

भारतीय सनातन संस्कृति की यही पहचान व खुबी है। इसलिये अपने भीतर के मनुष्यत्व के संस्कारों के अनुसार ही आचरण करने का प्रयास किया करें।

[su_highlight background=”#870e23″ color=”#f6f6f5″]ई०/पं०सुन्दर लाल उनियाल, मैथिल ब्राह्मण[/su_highlight]

नैतिक शिक्षा व आध्यात्मिक प्रेरक
दिल्ली/इन्दिरापुरम,गा०बाद/देहरादून