आयुर्वेदिक अस्पताल चंबा: हजारों खर्च करने के बाद भी जो रोगी ठीक नहीं हो पाते, ₹2 के पर्चे की दवा खाकर हो जाते हैं स्वस्थ
play icon Listen to this article

परहेज भी है रोग निदान

सुबह अस्पताल में भीड़ कम थी। डॉ. रावत अपने चेंबर में बैठे अपने उच्चाधिकारियों से पंचकर्म व्यवस्था पर बात कर रहे थे। अपने अस्पताल के पंचकर्म विभाग में कर्मचारियों की वैकल्पिक व्यवस्था के लिए वह आग्रह कर रहे थे ताकि रोगियों को स्वास्थ्य लाभ मिल सके।

सरहद का साक्षी, सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’ @चम्बा

नगर क्षेत्र चंबा के कोने पर स्थित यह अस्पताल क्षेत्रीय गौरव का प्रतीक है। सात-आठ दशक से भी ज्यादा समय से सेवाएं प्रदान कर रहा है। चंबा क्षेत्र का सबसे पुराना अस्पताल होने के नाते यह स्वास्थ्य केंद्र रहा है। चंबा प्रखंड के अलावा पट्टी सकलाना, कुजंणी, जुवा, मनियार आदि ग्रामीण क्षेत्रों से भी यहां इलाज कराने के लोग आते हैं। आधा शताब्दी से मुझे भी इस अस्पताल का ज्ञान है।

विद्यालय शिक्षा का छात्र होने के दौरान कागजातों को अटेस्ट कराने के लिए चंबा में श्री देव सुमन इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य और आयुर्वेदिक अस्पताल चंबा के डॉक्टर साहब चिर परिचित नाम थे जो छात्रों की सदैव सहायता करते थे। छात्र होने के कारण प्रधानाचार्य जी के सम्मुख काम के लिए भी जाना, उस समय ऐसा था जैसे शेर की गुफा में प्रवेश करना। उस समय छात्रों के अंदर डर और दहशत का माहौल था। इसलिए आयुर्वेदिक अस्पताल के डॉक्टर के पास अधिकांश छात्र कागजात अरेस्ट करवाने जाते थे।

डॉ. भट्ट, डॉ. पाठक, डॉ. शुक्ला, डॉ. नरेंद्र रावत, डॉ. जोशी आदि का नाम सदैव लोगों की जुबान में रहता है। इसे अनुक्रम में वर्तमान चिकित्साधिकारी डॉक्टर सत्यवीर रावत का नाम भी जुड़ा है।

डॉ रावत अपने रोगियों के प्रति अत्यंत संवेदनशील रहते हैं और यथासंभव उन्हें प्राकृतिक सिद्धांतों के अनुरूप स्वास्थ्य लाभ देते हैं। अस्पताल में बेशकीमती दवाइयां हैं जो कि लाइलाज रोगों का निदान करने में सक्षम हैं। जल्दबाजी के चक्कर में पड़कर लोग आयुर्वेदिक अस्पताल में जाना और आयुर्वेदिक दवाइयों को खाना कष्ट कारक मानते हैं। लंबे समय तक इलाज चलने के कारण कुछ रोगी बीच में ही इलाज छोड़ देते हैं जिससे कि रोग पुनर्जीवित हो जाता है। इस अस्पताल में व्यक्ति तब आता है जब रोग अत्यंत जीर्ण हो जाता है या एलोपैथिक दवाइयां खाते-खाते साइड इफेक्ट के कारण अन्य रोगों से ग्रसित हो जाता है।

🚀 यह भी पढ़ें :  सुविधाजनक राशन कार्ड एवं उज्जवला योजना:  कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य ने 09 गैस कनेक्शसन तथा तहत 25 राशन कार्डधारकों को सुविधाजनक राशन कार्ड वितरित किये 

मेरे निवास स्थल के नजदीक होने के कारण अक्सर अस्पताल में जाना होता है। अनेक प्रसिद्ध व्यक्ति जब डॉक्टर्स के बारे में पूछते हैं तो अपनी जानकारी के कारण मैं उन्हें आयुर्वेदिक दवाइयां लेने के लिए प्रेरित करता हूं और अधिकांश रोगियों का रोग पूर्णतः कटते देखा है। यह बात में अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूं न कि किसी वैज्ञानिक या तकनीकी ज्ञान के आधार पर बयां कर रहा हूं।

आज काफी देर तक डॉ. साहब की कार्यशैली को देखता रहा और उनकी कार्यकुशलता और व्यवहार से अत्यंत अभिभूत हुआ। मेरे ही पूर्व कर्म क्षेत्र के वयोवृद्ध बबू दीदी अपनी बेटी (49 साल) को लेकर अस्पताल आई थी जो कि आर्थराइटिस के पेशेंट है और बमुश्किल चल पा रही थी। इसके साथ ही स्थानीय गांव से गठिया, शुगर, गैस्टिक, साइटिका, वात पित्त और कफ जन्य रोगों के पेशेंट्स से भी बातचीत हुई और जानकर प्रसन्नता हुई कि जो देहरादून, हरिद्वार और दिल्ली में ठीक नहीं हुए हैं, वे तल्ला चंबा स्थित आयुर्वेदिक अस्पताल और वहां कार्यरत डॉ सत्यवीर रावत की दवाई खा कर ठीक स्वस्थ हो गए। मैं इसे किसी उपलब्धि से कम नहीं मानता।

अभी कुछ दिन पूर्व में मेडिकल स्टोर से ₹107 की एक दवा की शीशी खरीद कर लाया। जब यह मालूम हुआ कि अस्पताल में यह दवा विद्यमान है तो कई महीनों से कई शीशी दवा खाने के बाद बिल्कुल स्वस्थ हो गया। बात यह है कि आयुर्वेदिक दवाइयों का इलाज लंबा चलने के कारण हमारे अंदर धैर्य की कमी है और हम तत्काल ठीक हो जाने के चक्कर में एलोपैथिक ईलाज की तरफ भागते हैं। छोटे से दर्द के लिए भी इंजेक्शन लगवाना उचित मानते हैं जबकि आयुर्वेद में हफ्ते- 15 दिन में आंशिक सुधार होता है लेकिन 2 महीने या 6 माह में रोक पूर्ण रूप से कट जाता है। आयुर्वेदिक दवाइयां बीमारी को दबा नहीं देती हैं बल्कि समूल खत्म कर देती हैं और व्यक्ति स्वस्थ होकर जीवन के महत्व को समझता है।

🚀 यह भी पढ़ें :  टिहरी पुलिस व स्टेटिक सर्विलांस टीम की संयुक्त कार्यवाही में जब्त किये गए ₹ 1,30,000/-

आज डॉ. सत्यवीर रावत को अपने अद्दतन प्रकाशित पुस्तक “धरा के गीत” की प्रति भी भेंट की जो कि उन्होंने सम्मान सहित प्राप्त की और फुर्सत के क्षणों में संपूर्ण पुस्तक पढ़ने की बात कही। डॉक्टर सत्यवीर रावत ऐसे क्षेत्र से बिलॉन्ग करते हैं जिसका उत्तराखंड में अपना स्थान है। ‘बूढ़ा केदार क्षेत्र’ के अंतर्गत कोटी गांव के हुए मूल निवासी हैं और उन्हीं के समीपवर्ती गांव थाती से अनेकों बड़े लोग हुए हैं। पूर्व मंत्री श्री बलवीर सिंह नेगी, उनके भाई डॉक्टर नेगी, भतीजे डॉ. विजय नेगी, शिक्षाविद श्री बी एल बहुगुणा, श्री एम एल कंसवाल आदि अनेकों लोग मेरे परिचित हैं।

रोगियों के चले जाने के बाद मैंने डॉ. साहब से कुछ क्षेत्रीय जानकारी भी लेनी चाही। अत्यंत खुशी हुई कि अवकाश के दिनों में डॉक्टर साहब अपने घर- गांव जाकर के कृषि कार्यों में भी रुचि लेते हैं। टिहरी जिले के दूरस्थ गांव पिन्स्वाड के समीप उनकी पैतृक संपत्ति है। पहले वहां उनकी छानी थी। सड़क आ जाने के कारण उनके द्वारा उसका डेवलपमेंट किया गया है और यथा समय कोशिश होती है कि वे अपनी पैतृक जमीन को बंजर ना होने दें।

🚀 यह भी पढ़ें :  मासिक अपराध गोष्ठी: एसएसपी टिहरी द्वारा की गई अपराधों की समीक्षा, दिए गए आवश्यक दिशा निर्देश

डॉ. सत्यवीर रावत नियत समय पर अपने अस्पताल में आकर 2:00 बजे तक अस्पताल में रहते हैं। मरीजों की संख्या बढ़ जाने के कारण कभी-कभी 3:00 या 3:30 के बज जाती हैं। सौम्य, विनम्र और दृढ़संकल्प व्यक्तित्व के धनी डॉ रावत अपने पेशेंट्स के प्रति बहुत ही उदारता पूर्वक व्यवहार करते हैं। यथासंभव उनकी कोशिश होती है कि उनका रोगी पूर्ण रूप से स्वस्थ हो और जीवन का आनंद ले।

लकवा, पेट की बीमारियों, अर्थराइटिस, गठिया, वात रोग, गैस की समस्या, एसिडिटी, शुगर या महिला जनित रोगों के लिए आयुर्वेदिक दवाइयां रामबाण हैं। शरीर पर बिना किसी दुष्प्रभाव को डाले रोग मुक्त करती हैं। हजारों रुपए की धनराशि देकर जो लोग स्वस्थ नहीं हो पाते हैं, ₹2 के सरकारी पर्चा की दवा खा कर स्वस्थ हो जाते हैं। डॉ. सत्यवीर रावत की कार्यकुशलता, नियमितता और पेशेंट के प्रति सद्भावना के साथ ही चंबा की पुरानी विरासत आयुर्वेदिक चिकित्सालय( तल्ला चंबा) को मैं नमन करता हूं।

Print Friendly, PDF & Email

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.