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अर्जित ज्ञान- विज्ञान और आत्म निरीक्षण के द्वारा ही पूर्णता प्राप्त नहीं होती, इसके लिए है बाह्य अनुश्रवण भी जरूरी है

अर्जित ज्ञान- विज्ञान और आत्म निरीक्षण के द्वारा ही पूर्णता प्राप्त नहीं होती, इसके लिए है बाह्य अनुश्रवण भी जरूरी है

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[su_dropcap size=”2″]हि[/su_dropcap]मालय मेरे और प्रत्येक के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है। यह किसी रहस्य से कम नहीं है। मध्य हिमाचल के आंचल को लगभग घूमा है, देखा है, लेकिन हिमाद्री मेरे लिए किसी परी कथा के समान है। यदा-कदा कभी केदारनाथ जी की शैर करते समय अवश्य ऐसा लगा जैसे कि हाथ से ही स्पर्श कर सकता हूं।

संसार के भूगोल को खूब पड़ा है और अपने छात्र जीवन में भूगोल का छात्र भी रहा हूं। लगभग प्रत्येक स्थलाकृति याब यूं कहो कि भौतिक भूगोल के बारे में अच्छी जानकारी भी रखता हूं यद्यपि स्नातक कक्षाओं तक की भूगोल पढी है। पढी हुई बातों में गुरु जी के मुख से, सुनी हुई बातों में, तथा देखी हुई बातों में काफी अंतर होता है।

[su_highlight background=”#091688″ color=”#ffffff”]सरहद का साक्षी @कवि : सोमवारी लाल सकलानी, निशांत[/su_highlight]

अभी महाअष्टमी के दिन एक ऐसी शख्सियत से भेंट हुई, जिन्होंने मेरे अंदर छिपी हुई उत्सुकता को उजागर कर दिया है और मुझे और अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए बाध्य कर दिया है। भाषा और साहित्य का जीवन भर नाता रहा है। अंग्रेजी और हिंदी में परास्नातक होने के कारण कमोबेश भारतीय और पाश्चात्य साहित्य को खूब पढा है। लेकिन संसार को जानने की उत्सुकता जीवन भर बनी रही। जब अपने जल -जंगल, जमीन,पर्वत,स्थल आकृतियों, भूमिगत जल और जल स्रोतों को निहारता हूं, सैर करता हूं, या यूं कहें कि अपने परिवेश में आने वाली प्रत्येक चीज का सूक्ष्म अवलोकन करता हूं तो लगता है कि वास्तव में मैं देवभूमि में रहता हूं, जिसका के आदिकाल से ही मनीषियों ने गुणगान किया है लेकिन इन तमाम जानकारियां, बातों को हम पढ़ते हैं, सुनते हैं लेकिन जब कोई व्यक्ति अपने हुए किए हुए कार्यों का उदाहरण के तौर पर सम्यक जानकारी उपलब्ध कराता है तो पता चलता है कि हम कितने जानकार हैं। सही और गलत हैं।

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जी हां! सेना का एक जवान पूर्व सैनिक। उम्र 61 साल। मेरे वर्तमान निवास के नजदीक सटे हुए विक्टोरिया क्रॉस गबर सिंह नेगी के गांव के व्यक्ति। सेना मेडल प्राप्त। विजेंद्र सिंह नेगी।एक ऐसा नाम जो कि साइलेंट वर्कर हैं। कार्य में विश्वास करते हैं, बातों में नहीं।
सन 2011 को ब्रिगेडियर किशन सिंह साहब के साथ एवरेस्ट अभियान का हिस्सा बने और शिखर तक जाने में सफलता प्राप्त की। साथ में तत्कालीन मेजर और सेवानिवृत्त कर्नल अजय कोठियाल साथ टीम का हिस्सा रहे।

29 साल की शानदार सेना की सेवाड के साथ-साथ नौ वर्ष नेहरू माउंटेनियरिंग संस्थान, उत्तरकाशी में कार्यरत रहे। सेवानिवृत्ति के बाद भी एक जुनून उनके सिर पर सवार है- ट्रैकिंग और माउंटेनियरिंग का। अपनी पिछली पोस्ट में मैंने उनके बारे में लगभग सभी बातें बता दी थी लेकिन एक दिन उनके साथ रहने पर जब उन्होंने हिमालय की प्रत्येक चोंटियों का जो कि मेरे उच्च पर्वत शिखर सुरकंडा से दिखाई दे रही थी, एक-एक करके गिन-गिन कर उनके नाम सहित मुझे बताया। जिन चोटियों पर उन्होंने पर्वतारोहण किया और समय-समय पर अपनी टीम के साथ उन चोंटियों को चूमा भी है। तब मुझे पता लगा कि मेरा पढ़ा हुआ भूगोल और किया गया प्रयोगात्मक कार्य कितना सटीक है!

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जीवन की प्रयोगशाला में अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिनको हम नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। सीखने की कोई उम्र नहीं होती भले ही उत्तीर्ण होने के लिए, ज्ञानार्जन के लिए, स्वान्तःसुखाय भावना के लिए, मनोरंजन के लिए और रोजगार पाने के लिए हम बेहतर ढंग से स्कूली शिक्षा पूर्ण करते हैं। लेकिन जब सार्वजनिक जीवन में आते हैं और वह उस ज्ञान और विज्ञान का हम क्रियान्वयन करते हैं, तब पता लगता है के छात्र जीवन में पढा हुआ ज्ञान किस प्रकार से परिष्कृतहो रहा है।

सेवानिवृत्ति के बाद भी अच्छे लोगों के संपर्क में हूं। छात्र जीवन में काफी कुछ पढ़ा। 37 साल अध्यापक के रूप में काफी कुछ पढ़ाया और फिर से कुछ सीखने और पढ़ने की ललक मन में सवार हो गई है। ईश्वर की कृपा है कि विजेंद्र सिंह नेगी जी जैसी महान विभूतियों से साक्षात्कार हो जाता है। जिन के व्यक्तित्व और कृतित्व से काफी कुछ सीखने को मिल जाता है। कहने का आशय है कि हिमालय के भीतर पर्वत के पीछे पर्वत छुपे हुए हैं। प्रत्येक पर्वत शिखर का अपना एक मूल्य है। उन मूल्यों को सीखने और समझने की क्षमता हमारे अंदर होनी चाहिए। अपने पर्यावरण, पारिस्थितिकी, वहां की स्वच्छता और शुद्धता को बनाए रखना हमारा कर्तव्य है और यह तभी संभव है जब हमें सम्यक ज्ञान या विग्यान की पुख्ता जानकारी प्राप्त हो।

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मैं सेना मैडल प्राप्त पूर्व सैनिक और पर्वतारोही श्री विजेंद्र सिंह नेगी की जीवठता को नमन करता हूं कि जिस अदम्य साहस, शौर्य और पराक्रम से उन्होंने अपने जीवन में अनेक उपलब्धियां हासिल की हैं, जनहित, समाज हित, छात्र और युवा हित में वह उपयोगी बनें। उनकी महान उपलब्धियों का लाभ हमारी नई पीढ़ी ले। अनुकरण करें। श्री विजेंद्र सिंह नेगी की तरह ही मान-सम्मान, समृद्धि आदि अर्जित कर सकें। पूर्व सैनिक संगठन के संरक्षक श्री इंद्र सिंह नेगी जी का भी आभार व्यक्त करता हूं कि उन्होंने इस शख्सियत से मेरा परिचय करवाया। विजयदशमी के पावन- पर्व पर मैं इन वीर पूर्व सैनिकों सेल्यूट करता हूं।

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