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‘सरहद का साक्षी’ का प्रादुर्भाव एक साप्ताहिक के रूप में 22 जनवरी 1998 को टिहरी जनपद के मूसरी रोड़ चम्बा से हुआ। प्रारम्भ में इसे मेरे द्वारा इस समाचार पत्र को ऋषिकेश व देहरादून की प्रिंटिंग प्रेसों से छपवाया गया। इस बीच इलेक्ट्रोनिक द्विभाषी टाइपराईटर का दौर आ गया तो मैंने भी एक गोदरेज का टाईपराईटर खरीद लिया। उस पर मैं टाईप करता और फोटो स्टेट की दुकान पर जाकर शीर्षक इनलार्ज करवा कर पेपर की पेस्टिंग तैयार करता और उसे छपवाने के लिए ऑफ़सेट पर ले जाता। इन स्थानों पर छपवाने में ज्यादा खर्च आने और आमदनी शून्य होने के फलस्वरूप कई बार बीच में प्रकाशन बन्द भी हुआ। तत्पश्चात् चम्बा में अपना लेटर प्रेस स्थापित किया, मगर पूरे साप्ताहिक के छपने में लगभग चार दिन का समय लग जाता था। फिर भी समय पर प्रकाशित होता रहा है। हमारा होली का विशेषांक टिहरी जिले में सर्वाधिक लोकप्रिय रहता था, लोग होली के अंक को होली आने से पूर्व ही बुक करा देते थे, इसलिए हमें होली के अंक को सबसे ज्यादा संख्या में छापना पड़ता था। इसी बीच फिर मैंने एक श्वेत-श्याम मानीटर वाला कम्पूटर खरीदा, उस समय जमाना विन्डोज-95 का था  और सीडी रोम नहीं था, फ्लॉपी ड्राइव हुआ करती थी, एक अखबार की चार-पांच फ्लॉपी तैयार करके ले जानी पड़ती थी, कई बार फ्लॉपी क्रप्ट हो जाती थी, बमुश्किम रिकबर करवाकर छपवा पाता था। इस प्रकार कठिनाईयों के दौर के कई बसंत झेले। यहां ज्यादा विस्तृत वर्णन करना उचित नहीं समझता। इसी 19वीं सदी के दौर में मैं उत्तराखण्ड आंदोलन से पूर्व से ही पत्रकारिता के तहत राष्ट्रीय सहारा, दैनिक जागरण आदि सहित कई प्रमुख समाचार पत्रों के माध्यम से पत्रकारिता से भी जुड़ा रहा, उत्तराखण्ड आंदोलन में पत्रकारिता के तहत प्रमुख भूमिका अदा की। पत्रकारिता का व्यवसायीकरण होने के फलस्वरूप दैनिक पत्रों को छोड़ना पड़ा और ग्रामीण कस्बा नकोट में ‘अनुराग कम्प्यूटर्स’ के नाम से ‘लोक सेवा एवं जन सुविधा केन्द्र’ खोलकर जनसेवा आरम्भ कर दी। इसी बीच ‘सरहद का साक्षी’ को भी प्रकाशित करता रहा और अब मन बना कि ऑनलाइन पोर्टल आरम्भ किया जाय। जिस हेतु सरहद का साक्षी के नाम से इस कोरोना काल में पोर्टल आरम्भ कर दिया। यहां पर उल्लेख अवश्य करना चाहूंगा कि ‘‘अपने समय में हमने पीत-पत्रकारिता को नहीं पनपने दिया, यदि कोई किसी मुद्दे को छुपाना भी चाहते थे तो हम उसे अवश्य प्रकाशित कर देते थे।’’ पत्रकारिता में सौदबाजी से हमें नफरत थी और आज भी है तथा जीवन पर्यन्त रहेगी। यही हमारा उद्देश्य है। इन्हीं शब्दों के साथ… ।

केदार सिंह चौहान ‘प्रवर’, संपादक/प्रकाशक

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