घाट पर बात, जितेंद्र नेगी के साथ।

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    घाट पर बात,जितेंद्र घाट पर बात,जितेंद्र नेगी के साथ।

    श्री जितेंद्र नेगी आर्थिक रूप से संपन्न होते हुए भी एक धार्मिक विचारों के व्यक्ति हैं और उनकी धर्म परायणता जगजाहिर है। एक सच्चे और ईमानदार इंसान के रूप में उनकी छवि है। वह सिद्ध शक्तिपीठ मां सुरकंडा देवी मंदिर समिति के अध्यक्ष होने के साथ-साथ अनेकों धार्मिक गतिविधियों में सेवारत रहते हैं। मां सुरकंडा का भव्य मंदिर उन्हीं के प्रयासों का प्रमाण ह इसके अलावा रैंसाड देवता का मंदिर भी श्री जितेंद्र नेगी के अनूठे प्रयासों के कारण आज पर्वतीय क्षेत्रों की धर्म और संस्कृति का महत्व को बढ़ा रहा है। श्री जितेंद्र नेगी अपने जीवन उपयोगी कार्यों के अलावा धार्मिक कार्यों के लिए बढ़-चढ़कर समय देते हैं और निष्ठा और ईमानदारी पूर्वक अपना कार्य करते है। चंबा में उनके पिताजी के द्वारा स्थित भरत मार्केट आज भी क्षेत्र के लोगों से अनभिज्ञ नहीं है और वह खुद भी अपने दायित्वों का निर्वहन भी करते हैं।

    द्रौपदी का डंडा उत्तरकाशी में निम द्वारा प्रयोजन पर्वतारोहण कार्यक्रम के अंतर्गत प्रशिक्षणार्थी स्व.सतीश रावत के अंतिम संस्कार में सम्मिलित हुआ। कोटेश्वर घाट के सामने बनी हुई गौशाला पर नजर पड़ी तो जितेंद्र नेगी से ज्यादा अच्छी जानकारी और कौन दे सकता है, सोचा। उन्हीं से बातचीत के कुछ अंश प्रस्तुत हैं।

    “नेगी जी, यह सामने जो गौसाला बनी है, क्या यह कार्य रूप में परिणत है?”
    ” जी हां। यह गौशाला स्वामी विशुद्धानंद महाराज के प्रयासों से यहां पर स्थापित की गई जो कि अब स्वामी नारायण ट्रस्ट के द्वारा अधिकृत की जा चुकी है।”
    ” गौशाला में लगभग कितने गायें आज उपलब्ध हैं?”
    “जी 150 से ज्यादा गाएं आज भी इस गौशाला में हैं और गौशाला के नीचे जो मक्की जैसी फसल दिखाई दे रही है, वह गायों के लिए हरा चारा के रूप में प्रयुक्त होने वाली चरी घास है। गोबर का उपयोग स्थानीय कृषकों के खेती-बाड़ी के रूप में प्रयोग होने के साथ-साथ गोबर गैस प्लांट के रूप में भी काम आता है। इससे पूरे गौशाला और उसके समीपस्थ मंदिर आदि में प्रकाश व्यवस्था होती है।”
    ” बगल में जो मंदिर है, वह किस देवता का है?”
    “जी हनुमान मंदिर है और स्वामी विश्वधानंद महाराज जी इसको बनाया था।”
    ” नेगी जी, विशुद्धानंद महाराज के बारे में आपको कुछ जानकारी है?”
    ” जी हां। स्वामी विशुद्धानंद महाराज कोटेश्वर महादेव के समीपस्थ गुफा में समाधिस्थ रहते थे और अनेकों लोकोपकारी कार्य में संलग्न थे। उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा दी। उसमें उत्तीर्ण भी हुये लेकिन सांसारिक मोह -माया से विरक्त होने के कारण वह संत बन गए और कोटेश्वर महादेव की गुफा में ही अल्पायु में उनकी सर्पदंश से मृत्यु हुई।”
    ” आप इनको कितने लंबे समय से जानते थे?”
    ” मां सुरकंडा मंदिर में जब स्वामी विशुद्धानंद महाराज आए थे तो मंदिर के बांयी तरफ जो धर्मशालायों का विचार था, वह उन्ही का था और उन्हीं के सुझाव पर मैंने मंदिर समिति के अध्यक्ष होते हुए यह प्रस्ताव समिति के सम्मुख रखा और मां सुरकंडा के मंदिर के नीचे और बगल अगल बगल में जो धर्मशाला में निर्मित हैं,निर्माण करवाया। उनके विचारों का ही योगदान है।”
    ” जब सर्पदंश से स्वामी विशुद्धानंद जी की मृत्यु हुई तो उसे पूर्व क्या चिकित्सीय सुविधाएं प्रदान नहीं करवाई गई?”
    ” ऐसी बात नहीं है। सर्पदंश के बाद स्वामी जी ने महाप्रयाण का मन बना लिया था। उन्होंने कहा कि उनका समय आ चुका है। उन्हें अब किसी भी प्रकार का एंटी डोज देने की जरूरत नहीं है। संसार में आकर जो कार्य उन्होंने करने थे, वह कर चुके हैं। बस, अब उनको आगे बढ़ाने की जरूरत है। महंत होते हुए भी उन्होंने कहा कि उनका अंतिम संस्कार दाह -संस्कार के रूप में हो और उसी के अनुकूल उनका दाह -संस्कार किया गया।”
    ” आपके साथ दूसरे यह सज्जन हैं, इनसे भी बातकरते हैं।”
    ” जी आपका नाम क्या है?”
    ” सर मेरा नाम अनिल असवाल है और मैं यही निकटवर्ती मैंदार गांव का रहने वाला हूं।”
    ” आप वर्तमान में क्या कार्य करते हैं?”
    ” जी, मेरी ज्वेलर्स की दुकान है, चंबा में। इसके साथ-साथ स्वामी नारायण ट्रस्ट के द्वारा अधिकृत इस गौशाला का सदस्य हूं और जितेंद्र नेगी के की प्रेरणा से मैं वांछित सहयोग भी किया करता हूं, सेवा करता हूं।”
    “धन्यवाद असवाल जी।”
    “नेगी जी, आप हर समय धार्मिक कार्यों में मग्न रहते हैं। कृपया बताएंगे कि आपको यह प्रेरणा कहां से प्राप्त हुई?”
    ” सर, यह सब मां भगवती और शिव जी की कृपा है। संपन्न घर में पैदा हुआ। आर्थिक रूप से संपन्न होने के बावजूद भी भौतिकवाद से हमेशा ही मोहभंग रहा है और हर समय मन में विचार आता था कि अपने धर्म और संस्कृति के अलावा प्रकृति के सानिध्य में रहकर मां भगवती और शिव जी की सेवा करूं। संत तो नहीं बन सकता था, इसलिए मैंने कर्मों के द्वारा आस्था के प्रतीक स्थलों मंदिरों का जीर्णोद्धार करने का मन बनाया और मां सुरकंडासुरी ने मेरी मनोकामना पूर्ण की और आज सब उसी की कृपा का परिणाम है।”
    ” नेगी जी, आप की करनी और कथनी में मैंने कभी अंतर नहीं देखा। जो भी कार्य आप करते हैं, वह लगन और निष्ठा के द्वारा करते हैं। इसके साथ ही आप उच्च कुल के होने के कारण भगवान राम के आदर्शों पर चलने वाले व्यक्ति हैं, ‘रघुकुल रीत सदा चली आयी/ प्राण जांए बरु वचन न जाई’ इस संबंध में क्या कहना है ?”
    “जी यह सब मेरे माता- पिता जी, मेरे संस्कारों, मां भगवती की कृपा का प्रतिफल है कि जो थोड़ा- बहुत भी कर सकता हूं, वह कर रहा हूं और मेरा यह मिशन आजीवन गतिशील रहेगा। ईश्वरीय कृपा इसमें मुझे सहारा प्रदान करती रहेगी।”
    ” नेगी जी इस समय आप लगभग 60 वर्ष के हो चुके हैं, यद्यपि शरीर से दुबले- पतले होने के कारण अभी आपकी उम्र 40 से ज्यादा नहीं लगती है। आप मन- वचन और कर्म से एक तपस्वी व्यक्ति के रूप में हैं। इसे आप क्या मानते हैं?”
    ” यह सब कुछ पितरों का आशीर्वाद और मां भगवती की कृपा का परिणाम है। मुझे अच्छे कार्यों को करने के लिए जीवन दिया है, ऐसा मेरा मानना है। मैं अंतिम क्षण तक धर्म -संस्कृति और सत्य की कसौटी पर खरा उतरूं, यही मेरी कामना है।”
    “बहुत-बहुत धन्यवाद नेगी जी, आपसे साक्षात्कार के लिए।”
    ” जी सर सादर प्रणाम।”
    के साथ।

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