लघु कविता: चुंग गये चावल सात सराद्

लघु कविता: चुंग गये चावल सात सराद्

 सरहद का साक्षी @कवि: सोमवारी लाल सकलानी, निशांत। 

चावल चुंगने चली गौरैया, मित्र फाख्ते साथ।
टुक-टुक करके लगे चबाने, चले सराद्या सात।
एक गौरैया फाख्ता फर्श पर, एक रेलिंग पास,
बुलबुल पानी पीने आयी, समझ न आयी बात।

निहार रहा है षुरुष फाख्ता, सुमन श्री संस्थान,
लख हरीतिमा खुश बैठा है, ज्यों सम्राट महान।
एक-एक पेड़ों को गिनकर, कर सूचित जंगलात,
गुटुर-गू कर संदेश दे रहा, यह मेरी नजर पैमास।

मशगूल सराद् या खाने में, फुर्सत किसे है आज,
कल जाने वक्त क्या होगा, भर लो झोली-भात।
गौरैया का दल नहीं आया, क्या हुई होगी बात ?
चुंग गये दाना सात सराद् या, और आ गई रात।

* कवि कुटीर, सुमन कालोनी चम्बा, टिहरी गढ़वाल।

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