सियासी हलचल: यह दक्खण पंथ भी देख लिया जी! जब तीरथ भी डोल उठे!

हरेला लोकपर्व की सार्थकता: एक सामूहिक उत्तरदायित्व

 सरहद का साक्षी @कवि: सोमवारी लाल सकलानी, निशांत 

न चुनाव हुए – न राजा हारे,
बिना जंग ‘सूबे’ दार हैं मारे!
दस वर्ष में इक्कीस हो गए,
आजीवन के विष्णु बन गए !

बिना गोल किए प्रतिद्वंदी जीते,
गनीमत मानो,फीफा नहीं खेले।
लघु प्रदेश – क्या सोच सूक्ष्म है ?
या क्या कुर्सी ही महा – मोह है ?

तीर्थ – स्नान ‘सूबे’ दार गए हैं,
त्रिदेव इंद्र तक वंचित कुंभ रहें हैं!
दक्खन पंथ भी देख लिया जी,
देवभूमि को क्या वरदान मिला जी!

क्या इसी लिए उत्तराखंड बना है ?
सत्ता सुख ठेका-नेता बदल दिया है!
अब चैन से आसान बैठे रहना जी,
तख्त उतर – पेंशन खाते रहना जी।

धन्य नारायण ! पांच साल बिताए,
पर देवताओं ने ,तुम बहुत संताये!
सुनो ! कभी ‘सूबे’ दार नही बनना।
सदा लोक सिफाई बन सेवा करना।

राजनीति का चढ़ता – गिरता पारा ,
आम आदमी – सदा मुसीबत मारा।
राज कुलीन -तंत्र- लोक तो है नारा,
यहां बिना युद्ध के भी मरता राजा !

तीरथ भी अब डोल उठे!

केवल टीका लगवाने को,
तीर्थ मुख्य दरबार लगे !
पंडित चंद्र भुवन जी द्वारा,
तीर्थ आशीर्वाद लिए !

समझे ना कलयुग महिमा
,क्यों नतमस्तक नहीं हुए ?
पापी कल जुग महा आपदा,
तीरथ भी अब डोल गए।

महा ईश अब यहां आएंगे,
रमा ईश या कोई धन दीश !
एक वर्ष की बात और है,
आ जायेंगे फिर हरि ईश ।

कुछ दिन देव सुबोध भी देखो !
या अनिल विजय महाराज ।
देवभूमि है यहां देव हैं रहते ,
मिल सकते हैं यतीश्वर नाथ !

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