कविता: कंक्रीट का महल भले हो! फिर भी गुरुकुल है।

 सरहद का साक्षी @कवि: सोमवारी लाल सकलानी, निशांत 

कहते हो तुम, हुआ विकास नहीं इतने वर्षों में !
फिर दृश्य दिखाई जो देता है,क्या विकास नहीं ?
यह अर्ध सदी मे एक गांव के एक वार्ड का दृश्य है,
नौ वार्डों का आज नगर वन चुका यह गढ़ चंबा है।

एक दुकान एक आटा चक्की कभी यहां केवल थी,
आज केंद्र का विश्वविद्यालय परिसर यहां खड़ा है।
बादशाही थौल के नाम पर स्थल यह- रमणीक है।
शुद्ध आवो -हवा, प्रकृति का रम्य रूप नैसर्गिक है।

केमू शहतूत वृक्ष के नाम से -यह जाना जाता था ,
मेला लगता था ,आज भी सभी को यह भाता है।
हिमा पुत्र हेमवती नन्दन बहुगुणा विश्व विद्यालय है,
स्वामी रामतीर्थ मुनी जी के नाम पर यह परिसर है।

यहां ज्ञान के साथ सदा हिमालय का सुख आनंद है,
सब सुविधाओं से युक्त बड़ा यह -विश्व विद्यालय है।
आओ पढ़ने यहां साथियों, बच्चों प्रकृति संस्कृति है,
कंक्रीट का महल भले हो ! फिर भी यह गुरुकुल है।

*कवि कुटीर,  सुमन कॉलोनी चंबा,टिहरी गढ़वाल।

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