पुण्य तिथि पर विशेष: स्व० श्री चन्द्रमणि बहुगुणा जी जिन्होंने ज्ञानार्जन कर चतुराई के मार्ग से विरत रहने की प्रेरणा दी

 सरहद का साक्षी @ हर्षमणि बहुगुणा 

न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूय: ।
अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ।।

” प्रात: स्मरणीय पूज्य पितृचरणों में कोटि-कोटि नमन करते हुए आज आपकी पुण्य तिथि पर श्रद्धासुमन समर्पित करते हुए कुछ यादें जो मेरे लिए आदर्श की तरह हैं, सदैव स्मरण रहती हैं आज आपके श्री चरणों में अर्पित कर रहा हूं आशा है आपके आशीर्वाद से उन पर चलने का प्रयास किया व आगे चलने में समर्थ भी हो सकूंगा।

स्व० श्री चन्द्रमणि बहुगुणा जी

ज से बत्तीस वर्ष पूर्व चार जुलाई सन् १९८९ को आप हमें छोड़कर चले गए थे, आपका अचानक इस तरह जाना हमारा दुर्भाग्य था, आपके ‘उत्तर दायित्वों’ का यथा सम्भव निर्वहन किया, यद्यपि यह जन इस योग्य नहीं था पर यदा – कदा आपका कथन (प्रेरणा) याद आती और उस मार्ग पर चलने का प्रयास करने की चेष्टा करता रहा। यही कारण है कि आने वाली पीढ़ी का भविष्य भी दांव पर लगा दिया, आप यूं ही मजाक में या वास्तविक रूप से (आन्तरिक भावना से ओत-प्रोत हो कर) कहा करते थे, शिक्षा देते थे कि – मानव जीवन का कोई भरोसा नहीं है। इस संसार में जो आया है वह अवश्य जाएगा, पर समाज के दृष्टिकोण से न सही! पर वैदिक परम्पराओं व सनातन धर्म व संस्कृति की जागरूकता के लिए धर्म में निष्ठा होनी आवश्यक है। आपने ज्ञान अर्जित कर – चालाकी के मार्ग से विरत रहने की सलाह दी, कहा करते थे कि ‘बड़े भाग मानुष तन पावा’।

अतः कर्तव्य पर ध्यान केन्द्रित कर ‘कर्तव्य ही पूजा है’ । यथार्थ जीवन जीना श्रेयस्कर है । साधारण जीवन जीना चाहिए, भविष्य चाहे कितना भी सुनहरा व स्वप्न भरा क्यों न हो, अनिश्चित व अजन्मा ही है। अतः वर्तमान में जीना श्रेष्ठ है, भूत मृत है । इसलिए जीवन तो सहज व स्वाभाविक ही होना चाहिए, नैतिक मूल्यों को बरकरार रखना आवश्यक है। जीवन सम्यक् , सन्तुलित व संयमित होना चाहिए “उसके पास है, मेरे पास नहीं” की धारणा का त्याग करना होगा। एकान्त में रहना सीखो, क्योंकि भीड़ बहिर्मुखी बनाती है और व्यक्ति दूसरे की गलतियों को देखता है , जबकि अकेले में व्यक्ति अन्तर्मुखी बनता है, आत्म निरीक्षण, आत्म विश्लेषण व आत्म मूल्यांकन करता है, जो श्रेयस्कर भी है, फिर संसार में सन्मित्र मिलें या न मिलें, इस लिए अच्छी पुस्तकों का अध्ययन व सत्संगति आवश्यक है क्योंकि इस ज़हर रूपी संसार वृक्ष में दो ही फल मीठे हैं– ‘अच्छे मित्र व अच्छे लोगों की संगति’, मनुस्मृति में भी तो यही बताया है कि –

बुद्धिवृद्धिकराण्याशु धन्यानि च हितानि च । नित्यं शास्त्राण्यवेक्षेत निगमांश्चैव वैदिकान् ।।

” और जीवन सामंजस्य में भावना से अधिक विवेक की आवश्यकता है । ” ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर “। तभी तो कहा है कि —
“आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:। “
यह सम्भव है कि आज का समाज ऐसे व्यक्ति से प्रेम नहीं करता है परन्तु- प्रेम व्यक्ति का — पागलपन है, प्रेम ईश्वर के कार्य व कर्त्तव्य से विरत करता है। सत्यनिष्ठ मानव को समाज कम चाहता है या नहीं चाहता है। समाज के लोग सम्बेदनाओं में उलझकर ‘हे राम’ से केवल अपना उल्लू सीधा करते हैं , विज्ञापन के सहारे सदैव बुरी से बुरी वस्तु बिक जाती है। अच्छा कोई कहे या न कहे पर अन्तरात्मा से सदैव अच्छा कार्य करना चाहिए । ” मन के हारे हार है मन के जीते जीत ”। मनुष्य शरीर ईश्वर की उत्कृष्ट रचना है, यह मानव के लिए अनुपम व अनोखा उपहार है। प्रभु की इस भेंट को सहेज कर रखना। यथासंभव भलाई करना किसी का अहित न करना, क्योंकि हित का प्रतिफल अच्छा ही मिलेगा। यह सारी प्रेरणा मिली — कर्तव्य, वर्तमान में जीना, सहज व स्वाभाविक जीवन, संयमित जीवन, अच्छी पुस्तकों का अध्ययन व सत्संगति, एकान्त वास व जीवन का सामंजस्य, सादा जीवन, परिश्रम से अर्थोपार्जन इनका अनुपालन कर उन पर चलते चलते-चलते आज यह जीवन भार सा लग रहा है। पर क्या सत्य का मार्ग कठोर व कण्टकाकीर्ण नहीं होता है? मन में यह विचार कर जीवन यापन करते हुए — छियासठ वर्ष की इस अवस्था तक अपने पूर्वजों आप, आपके पितामह व आपकी बुआ की इच्छा के अनुसार भैरव देव भगवान को उनके एक लघु स्थान में जगह देने का नगण्य प्रयास पूरा कर एक सन्तोष तो मन में है कि “भगवान राम को पांच सौ साल बाद स्थान मिल रहा है तो गांव व इस क्षेत्र के रक्षपाल श्री भैरवनाथ को सौ वर्ष से पहले ही छोटा ही सही पर स्थान तो मिल ही गया।

सबका देवता सबकी रक्षा करेगा, भले ही इस जन की रक्षा सुरक्षा होती है या नहीं, तथा उनकी रक्षा करने की भी प्रार्थना करता हूं जो “तांत्रिक क्रियाओं” से समाज का अहित करने में मनोयोग से जुटे रहते हैं । कभी कभी लगता है कि हम कूप मण्डूक ही हैं, एक यज्ञ में कोई सज्जन यज्ञ की आहुति हेतु कुछ घी लेकर आए किन्तु स्वयं न देकर किसी दूसरे को माध्यम बनाकर कहलवाया कि यह घी कहां रखें ? शायद यह दिखलाने के लिए कि ‘ मैं ‘ कुछ लाया हूं। कौन लाया?, कौन संदेश वाहक? यह सब कार्य कर्त्ताओं की समझ से परे।

आज समाज के उत्कृष्ट मानव जो सुपुत्र कहलाते हैं वह अपने माता-पिता की कुशलता का समाचार गांव या बाहर के लोगों से पूछ कर अपने मन के मल को प्रकट करने का कुत्सित प्रयास कर वैमनस्यता को प्रकट करने या फैलाने का हल्का सा उदाहरण प्रस्तुत कर देते हैं। आप पितर हैं, अपने वंशजों की रक्षा सुरक्षा करते आ रहे हैं अतः आपसे प्रार्थना करता हूं कि इस तरह का छल – कपट मन में कभी भी न आने पाए, ऐसी कृपा बनाए रखना। “कम खाने व गम खाने से” आज तक कोई मरा नहीं, यह भी आपकी ही शिक्षा थी।
अपने जीवन में यह विचार किया व गीता की इस उक्ति को आदर्श बनाया , बड़े बुजुर्गो का सम्मान व उनके द्वारा बताए मार्ग पर चलना । –

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।

आपकी इस पुण्यतिथि पर जो चाहता था नहीं कर पाया, अतः सद्बुद्धि प्रदान करेंगे व इस क्षेत्र की रक्षा करते रहेंगे । भावभीनी विनम्र श्रद्धांजलि के साथ कोटि-कोटि नमन व श्रद्धासुमन सादर समर्पित । सादर — और हमारे पास है भी क्या ? ? ? सबके मंगलमय जीवन की शुभकामनाओं के साथ सुप्रभात शायद –

नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा: त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनं तव ।।

इस जन को पूर्ण विश्वास है कि –

यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्धुवा नीतिर्मतिर्मम।।

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