कविता: नाना जी का उपवन

 सरहद का साक्षी @कवि: सोमवारी लाल सकलानी, निशांत 

मेरे नानाजी का उपवन देखो ! कितना प्यारा है !
कवि नातिन मैं भी कवित्री, उपवन यह न्यारा है।
नाना जी ने पेड़ सजाए, परनाना जी ने लगाए थे,
अभिरक्षा मे मै भी खड़ी हूं, जंगल की मैं रानी हूं।

आओ चंबा या सुरकंडा, या सकलाना वादी में,
प्रतीक्षा में सदा खड़ी हूं,आजाओ जी उपवन में।
धार खाल को पार करते, पहुंचोगे तुम जंगल में,
नाना जी संग तुम्हे मिलूंगी, अपने सुंदर जंगल में।

हरित हिमालय तुम देखोगे, पर्वत की परछाई मे,
क्रीड़ा करते भूरे बादल ,वर्षा ऋतु की बौछारों मे।
यहां न शीत तपन है भैय्या, ना गर्मी ना प्रदूषण।
यहां प्रतिपल नानाजी की कविता – गीत मनोहर।

इतना सुंदर शहर नही है, जाना मेरी मजबूरी है,
दादा दादी याद भी आती, सुंदरता मन भाती है।
हर वर्ष ग्रीष्म मे मै आऊंगी,नानाजी संग नाचूंगी,
दूर देश मे रहने वाली, मैं उपवन देखने आऊंगी।

नाना जी से खूब न कोई ,गीत खुशी का गाते हैं,
अपने घर वन उपवन में, कविताएं रच आते हैं।
मुझे किसी का मोह नहीं है, है प्यार उपवन का,
आनंदित होकर नाचती,मिलता दुलार नानी का।

* कवि कुटीर, सुमन कॉलोनी चंबा, टिहरी गढ़वाल।

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