कविता: (सियासी उथल-पुथल)- धामी भर गए हामी…!

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 सरहद का साक्षी@ कवि: सोमवारी लाल सकलानी, निशांत 

धामी हामी भर गए, पड़े चित्त महाराज ,
हरक सरक भी ना सके,धन रावत लाचार।
बोध सुबोध को ना हुआ,मदन रहे हरद्वार,
त्रिवेंद्र भी थे क्या बुरे, यह कैसी सरकार !

तीरथ दर्शन कर न सके,देहरा का है मिजाज,
निशंक दिल्ली चले गए, देहरा हो गई खाज।
अभी तो मात्र ग्यारह बने, बहुमत थी सरकार,
बाईस का तो है खेल बुरा, होंगे सत्रह निजाम।

चुनाव कराते थक गए,अब मतदान नहीं है चाह,
सात माह का समय है, ढूंढो मिल कुछ समाधान।
अब पार्टीबाजी होगी नहीं,निर्दलीय बने सरकार,
बहुमत ज्यादा देख लिया,बदल दिए तीन निजाम।

नारायण याद अब आ गए,जिन्हे किया बदनाम।
विकास पुरुष वह एक थे, बाकी वोट सरकार।
धन्य धर्म का नाम है, कुछ भी शेष नहीं हैं काज,
जोर लगाकर कहो, हमें इन सरकारों पर नाज !

* कवि कुटीर, सुमन कॉलोनी चंबा टिहरी गढ़वाल।

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